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मुसीबत की खेती

किसानों के लगभग हर समय संकट में फंसे होने का मूल कारण यही है कि खेती घाटे का धंधा बनती गई है। किसानों को अक्सर अपनी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है।

मुसीबत की खेती
छिटपुट आत्महत्याएं तो पहले भी होती थीं, लेकिन 1990 के बाद से इसमें तेजी आ गई। (फाइल फोटो)

डिजिटल कृषि विपणन मंच की पहल और फसल बीमा को नई शक्ल देकर प्रधानमंत्री ने इस आलोचना को निराधार ठहराने की कोशिश की है कि उनकी सरकार केवल शहरी विकास तथा औद्योगिक हितों को तवज्जो दे रही है। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में गुरुवार को एक किसान रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आगामी चौदह अप्रैल से डिजिटल कृषि विपणन प्लेटफार्म शुरू किया जा रहा है। इस आॅनलाइन प्लेटफार्म के जरिए किसान अपने मोबाइल फोन के जरिए अपनी उपज को देश में कहीं भी उस स्थान पर बेच सकेंगे जहां उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त होगा। अगर प्रस्तावित उपाय का ऐसा नतीजा आ सके, तो इससे अच्छी बात और क्या होगी! किसानों के लगभग हर समय संकट में फंसे होने का मूल कारण यही है कि खेती घाटे का धंधा बनती गई है। किसानों को अक्सर अपनी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। जब मौसम की प्रतिकूलता या कीट-प्रकोप आदि के कारण फसल चौपट होती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, उपज ठीकठाक होने पर भी, उचित दाम न मिल पाने से, वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। डिजिटल कृषि विपणन मंच किसानों को उनकी पैदावार का उचित मूल्य दिलाने में कहां तक सहायक हो पाएगा? इस तकनीक के जरिए संभावित ग्राहकों का दायरा दूर-दूर तक फैल जाएगा। पर यह तकनीकी आयाम ही अधिक है। खरीदार आपूर्ति या ढुलाई का खर्च ध्यान में रख कर ही कीमत लगाएंगे। फिर ज्यादा दूर के ग्राहक क्यों आएंगे? अलबत्ता ऐसी उपज जो आमतौर पर उपलब्ध न हो, उसके बारे में सूचना बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।

एक अप्रैल से नई फसल बीमा योजना लागू करने की घोषणा सरकार पहले ही कर चुकी थी। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने एक उसका भी जिक्र किया। फसल बीमा कोई नई चीज नहीं है। बरसों से यह जब-तब छोटे-मोटे हेरफेर के साथ चली आ रही है। मोदी सरकार का दावा है कि फसल बीमा की नई योजना लीक से हट कर है और यह किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला रोकने तथा कृषि को संकट से उबारने में एक निर्णायक कदम साबित होगी। इसमें दो राय नहीं कि नई फसल बीमा योजना में कई बातें अच्छी हैं। मसलन, प्रीमियम की दरें अपेक्षया कम होना तथा उसकी समान दरें होना। मगर यह कोई रामबाण नहीं है। नुकसान को साबित करने तथा अपने दावों का भुगतान पाने के लिए किसानों को दर-दर भटकना पड़ता है। यही कारण है कि कोई भी फसल बीमा योजना उनमें उत्साह नहीं जगा पाती। नई योजना में सबसिडी के तौर पर केंद्र और राज्य सरकारों पर पड़ने वाला बोझ जरूर बढ़ जाएगा, पर इसका लाभ किसानों को नहीं, कंपनियों को होगा। केंद्र सरकार किसानों के हितों को लेकर बहुत संवेदनशील है तो अपने एक अहम चुनावी वादे को पूरा क्यों नहीं करती? गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था कि अगर उसे केंद्र की सत्ता में आने का मौका मिला तो वह जल्दी ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी, यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी पैदावार का लागत से डेढ़ गुना दाम मिले। भाजपा को केंद्र में आए इक्कीस महीने हो चुके हैं। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें कब लागू होंगी?

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First published on: 20-02-2016 at 12:06:59 am
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