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संपादकीयः किसान का दुख

पिछले साढ़े तीन साल में छह बार देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली में दस्तक दे चुके हैं। इस साल मार्च में किसानों की मांगों को लेकर ही अण्णा हजारे ने अनशन किया था।

Author October 3, 2018 2:54 AM
किसान दिल्ली में नहीं घुस पाएं, इसलिए राजधानी के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाले इलाके सील कर दिए गए और किसानों का रेला गाजियाबाद-दिल्ली की सीमा यूपी गेट पर ठहर गया।

सरकार की नीतियों और वादाखिलाफी से नाराज किसानों को एक बार फिर दिल्ली की ओर कूच करने को मजबूर होना पड़ा।इस साल में यह तीसरा मौका है जब किसानों को अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए राजधानी का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया जो किसानों की दशा सुधार सके। भारतीय किसान यूनियन की अगुआई में किसान क्रांति यात्रा हरिद्वार से शुरू हुई थी और इसे दो अक्तूबर को राजघाट पर पहुंचना था। लेकिन किसान दिल्ली में नहीं घुस पाएं, इसलिए राजधानी के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाले इलाके सील कर दिए गए और किसानों का रेला गाजियाबाद-दिल्ली की सीमा यूपी गेट पर ठहर गया। यहां पुलिस के साथ टकराव हुआ, किसानों को दिल्ली में प्रवेश से रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसूगैस, पानी की बौछार जैसे तरीके अपनाए, जिससे कुछ किसान और पुलिस के जवान जख्मी हुए। अगर सरकार समय रहते किसानों की जायज मांगों पर विचार करती तो शायद कोई तार्किक और सर्वमान्य समाधान निकल सकता था और किसानों के इस मार्च को रोका जा सकता था। लेकिन बातचीत का औपचारिक सिलसिला हजारों किसानों के गाजियाबाद पहुंचने के बाद शुरू हुआ, जो किसी समाधान तक नहीं पहुंच सका और नतीजा किसानों और पुलिस के टकराव के रूप में सामने आया।

पिछले साढ़े तीन साल में छह बार देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली में दस्तक दे चुके हैं। इस साल मार्च में किसानों की मांगों को लेकर ही अण्णा हजारे ने अनशन किया था। सितंबर में अखिल भारतीय किसान सभा ने मार्च निकाला। पिछले साल किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसान मुक्ति संसद की थी। तमिलनाडु के किसानों ने कई दिनों तक धरना दिया था। सवाल है कि आखिर किसानों को बार-बार गुहार लगाने को क्यों मजबूर होना पड़ रहा है। सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से ऐसे कोई प्रयास क्यों नहीं होते जो किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान निकालें। बजाय इसके ऐसे कदम उठाए जाते हैं जो फौरी राहत से ज्यादा कुछ नहीं होते। हालांकि इस साल कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया गया है, किसानों के कल्याण के लिए योजनाएं भी बनी हैं। लेकिन इनमें स्थायी समाधान की झलक नहीं मिलती। कर्ज माफी, बिजली के पुराने बकाए की माफी जैसे कदम लुभावनी घोषणाओं का झुनझना ही साबित होते हैं।

उत्तर प्रदेश के किसान इस समय इसलिए बौखलाए हुए हैं कि सत्ता में आने से पहले जो कर्ज माफी का वादा किया गया था, उस पर सरकार अब चुप है। बड़ी संख्या में गन्ना किसानों को बकाए का पैसा नहीं मिला है। चुनावों के पहले जिस तरह वादों की झड़ी लगा दी जाती है, उससे किसानों को लगता है कि अब अच्छे दिन आ जाएंगे। लेकिन हकीकत सामने आते देर नहीं लगती। आजादी के सात दशक बाद भी देश के सत्रह राज्यों में एक किसान परिवार की औसत सालाना आय मात्र बीस हजार रुपए है। जाहिर है, किसानों की आमद कैसे बढ़ाई जाए, इसकी फिक्र किसी सरकार ने नहीं की। देश के नब्बे फीसद से ज्यादा किसानों की सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि उन्हें फसलों का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता और ऐसे में खेती घाटे का सौदा साबित हो जाती है। जो किसान कर्ज लेकर खेती करते हैं, वे फंस जाते हैं और कर्ज नहीं चुका पाने की वजह से खुदकुशी जैसा कदम उठा लेते हैं। यह विडंबना ही है कि कृषि प्रधान देश का किसान ही सबसे बुरी हालत में है। किसानों की जायज मांगों और समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर उनके स्थायी समाधान निकालने की दिशा में काम होना चाहिए। नाम के लिए फौरी मदद से कुछ ठोस हासिल नहीं होगा।

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