संपादकीयः आतंक के विरुद्ध - Jansatta
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संपादकीयः आतंक के विरुद्ध

आज जब पूरी दुनिया आतंक के खतरे की जद में आ रही है तो उसके खिलाफ मिलजुल कर लड़ने की जरूरत भी तेजी से महसूस की जा रही है।

Author April 1, 2016 3:02 AM
यूपी में आतंकी हमले के लिए आतंकियों को मिली हिंदू रीति रिवाज की ट्रेनिंग। (Representative Image)

आज जब पूरी दुनिया आतंक के खतरे की जद में आ रही है तो उसके खिलाफ मिलजुल कर लड़ने की जरूरत भी तेजी से महसूस की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एकदिवसीय बेल्जियम यात्रा के दौरान आतंकवाद से एकजुट होकर लड़ने का संकल्प इसी तकाजे का इजहार है। तकरीबन हफ्ता भर पहले ब्रसेल्स के हवाई अड््डे और एक मेट्रो स्टेशन पर हुए आतंकी हमले में बत्तीस लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए थे। इस हमले ने यूरोपीय संघ के अगुआ रहे बेल्जियम को तो दहलाया ही, समूचे विश्व समुदाय को आतंकवाद से निपटने की रणनीति पर पुनर्विचार के लिए भी विवश कर दिया है।

बेल्जियम के प्रधानमंत्री चार्ल्स मिशेल से मोदी की मुलाकात के बाद जारी साझा बयान के मुताबिक कोई भी मुद््दा या मकसद निर्दोष लोगों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियों को उचित नहीं ठहरा सकता। इसलिए आतंकी नेटवर्क और उसके वित्तीय माध्यमों को बाधित करने, आतंकी पनाहों, प्रशिक्षण ढांचे और उनकी सीमापार आवाजाही को खत्म करने की तत्काल जरूरत है। उन्होंने इस बात पर भी सहमति जताई कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि आतंकवाद कभी भी सीमाएं नहीं देखता और इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर निपटना चाहिए। लेकिन यहां अहम सवाल है कि ऐसे सुवचन या सुभाषित दोहराने भर से क्या आतंकवाद की वैश्विक चुनौती से निपटा जा सकता है?

यह अफसोसनाक है कि हर बड़े आतंकी हमले के बाद वैश्विक मंचों पर दहशतगर्दी के खात्मे के संकल्प तो दोहराए जाते हैं लेकिन फिर किसी बड़ी वारदात तक उन संकल्पों पर विस्मृति की गर्द जमने दी जाती है। अमेरिका ने अपने यहां नौ-ग्यारह के हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ विश्व-स्तर पर लड़ाई छेड़ दी थी लेकिन इस लड़ाई ने रक्तबीज ज्यादा बोए हैं जिनकी खूनी फसल हर तरफ लहलहा रही है। अफगानिस्तान और इराक को उसने इस युद्ध की मुख्य रणभूमि बनाया था लेकिन आज ये दोनों मुल्क आतंकवादियों की सबसे बड़ी शरणस्थली बन गए हैं। पेरिस और ब्रसेल्स हमलों की जिम्मेदारी लेने वाले विश्व के सबसे खूंखार आतंकी संगठन आईएस के विरुद्ध पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद नाटो सेनाएं उसे घुटने टेकने पर मजबूर नहीं कर पाई हैं।

क्या यह आतंक के विरुद्ध विश्व समुदाय के युद्ध की गंभीर रणनीतिक खामियों की तरफ इशारा नहीं है? अपने फायदे के लिए शत्रु देश के खिलाफ आतंकवाद को हथियार बना कर छद््म युद्ध छेड़ने, भौगोलिक विस्तार की कुटिल मंशा से पड़ोसी मुल्क में अलगाववादी या सांप्रदायिक लपटों को हवा देने का खेल अनेक छोटे-बड़े देश खूब खेलते रहे हैं। इनमें आतंक के विरुद्ध लड़ाई के पुरोधा तक शामिल पाए गए हैं। कड़वा सच यह भी है कि नौ-ग्यारह के हमले से पहले अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देश आतंकवाद को तीसरी दुनिया के मुल्कों की गरीबी, पिछड़ेपन और जहालत से उपजी बीमारी मान कर नाक-भौं सिकोड़ते और तरस खाने के अंदाज में चिंता जताते पाए जाते थे। मगर जब आतंक की आंच से वे खुद झुलसने लगे तब उन्हें समझ आ रहा है कि इससे निपटना कितना जरूरी है। अगर यह देर आयद दुरुस्त आयद समझ आतंक के खिलाफ युद्ध में अब तक रही खामियों को दूर कर उसे सकारात्मक अंजाम कर पहुंचा सके तो यह मानवता के पक्ष में एक बड़ी उपलब्धि होगी।

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