आतंक के खिलाफ

आतंकवाद से निपटने के लिए भारत और फ्रांस का संकल्प दोनों देशों की चिंताओं को रेखांकित करता है।

प्रतीकात्‍म फोटो।

आतंकवाद से निपटने के लिए भारत और फ्रांस का संकल्प दोनों देशों की चिंताओं को रेखांकित करता है। पेरिस में हुई दोनों देशों के संयुक्त कार्य समूह की सालाना बैठक में आतंकी संगठनों के खिलाफ मिल कर कार्रवाई करने पर सहमति बनी है। भारत और फ्रांस लंबे समय से आतंकवाद का सामना कर रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में जब तक सभी देश एक दूसरे का सहयोग नहीं करेंगे, तब तक आतंकवाद से निपट पाना संभव नहीं है। पिछले तीन दशकों में वैश्विक आतंकवाद तेजी से बढ़ा है। खासतौर से यूरोप और अमेरिका के लिए यह संकट और गंभीर हो गया है।

फ्रांस में भी आतंकवादी हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। मध्यपूर्व के देशों सहित पाकिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठन ईशनिंदा के विरोध में फ्रांस में आतंकी हमले करते रहे हैं। भारत भी लंबे समय से सीमापार आतंकवाद झेल रहा है। दुनिया ने देखा है कि पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठनों ने भारत की संसद से लेकर मुंबई तक पर कैसे हमले किए और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इसलिए पश्चिमी देश भारत के साथ मिल कर आतंकवाद फैलाने वाले मुल्कों पर दबाव बनाने में लगे हैं। संयुक्त कार्य दल की सालाना बैठक में दोनों देश आतंकवाद से जुड़ी सूचनाओं को साझा करते हैं और आतंकवाद से निपटने की साझा रणनीति बनाते हैं।

भारत और फ्रांस दोनों ही इस बात से चिंतित हैं कि पाकिस्तान के बाद अब अफगानिस्तान भी दूसरा बड़ा आतंकी ठिकाना न बन जाए। दोनों देशों की यह चिंता बेवजह नहीं है। तालिबान ने अलकायदा और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी संगठनों की मदद से ही सत्ता हासिल की है। तालिबान को भी दुनिया में एक आतंकी संगठन के तौर पर ही देखा जाता है। ऐसे में अफगानिस्तान आतंकियों का एक और गढ़ कैसे नहीं बनेगा? बैठक में प्रतिनिधियों से साफ कहा कि अब लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ जोरदार मुहिम की जरूरत है।

वैसे पश्चिमी देश वित्तीय कार्रवाई बल (एफएटीएफ) के माध्यम से लगाम कसने में लगे हैं। पाकिस्तान पर कड़े प्रतिबंध लगा कर आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उसे आतंकी देशों की निगरानी सूची में भी डाल रखा है। पर देखने में तो यही आ रहा है कि पाकिस्तान इन संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा और आतंकी नेता बेखौफ अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।

भारत लंबे समय से यह आशंका व्यक्त करता रहा है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान उसका इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में करेगा। भारत की चिंता कश्मीर को लेकर है। पाकिस्तान पहले भी भाड़े के अफगान लड़ाकों को कश्मीर भेजता रहा है। भारत ने तालिबान को न पहले मान्यता दी थी, न ही अब दी है। इसलिए भी तालिबान शासक भारत के प्रति उदार रुख रखने वाले नहीं हैं।

पिछले हफ्ते ही दिल्ली में रूस, ईरान सहित अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों की बैठक हुई थी। उसमें भी सभी देशों ने एक स्वर में यही तय किया था कि अफगानिस्तान को आतंकवाद का नया ठिकाना बनने से रोकना होगा। सिर्फ भारत ही नहीं, दूसरे देश भी समझ रहे हैं कि अफगानिस्तान से निकली आतंकवाद की लपटें उन्हें भी जीने नहीं देंगी। सवाल यह है कि जिस देश की सत्ता ही आतंकवाद फैलाने वाले देश के समर्थन और आतंकवादी संगठनों के बल पर चल रही हो, वह आतंकवाद का ठिकाना बने बिना कैसे रह सकता है?

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