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संपादकीयः आतंक के खिलाफ

करीब महीने भर पहले अमेरिकी खुफिया स्रोतों यह जानकारी सामने आई थी कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में अमेरिका के एक आतंकरोधी कार्रवाई के दौरान अल कायदा के सरगना रह चुके उसामा बिन लादेन के बेटे हमजा बिन लादेन की मौत हो गई। इसके साथ ही यह भी माना गया कि अब तालिबान का वह दौर खत्म हुआ, जिसमें वह खुद को सांकेतिक रूप से उसामा बिन लादेन के साथ जुड़ा हुआ मानता था।

Author Published on: October 10, 2019 1:14 AM
उसामा बिन लादेन को मार कर अमेरिका ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की थी और अलकायदा के चीफ को मार गिराया।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सुरक्षा बलों के साथ लंबे समय से जारी अभियान में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में कोई कसर नहीं छोड़ी गई, लेकिन सच यह है कि आज भी वहां तालिबान को इतना कमजोर नहीं किया जा सका है कि आश्वस्त हुआ जा सके। हालांकि बड़े कद के आतंकवादियों के मारे जाने की खबरें आने के बाद आतंकी समूहों के प्रभाव में थोड़ी कमी जरूर देखी जाती है। इस लिहाज से देखें तो वहां एक संयुक्त अभियान में अल कायदा के एक बड़े सरगना आसिम उमर को मार गिराए जाने को बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जाएगा। दरअसल, पिछले महीने की तेईस तारीख को हेलमंद प्रांत के मूसा कला में अमेरिकी सुरक्षा बलों ने तालिबान के परिसर पर छापा मारा था। उसी अभियान के दौरान उमर मारा गया। वह अफगानिस्तान में भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख था। यों अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय का कहना है कि वह पाकिस्तानी नागरिक था, लेकिन ऐसे दावे भी सामने आए हैं कि वह भारत में पैदा हुआ है। पर इतना तय है कि उसकी उपयोगिता को देखते हुए ही उसे इस समूचे इलाके का प्रमुख का दायित्व सौंपा गया होगा और निश्चित रूप से भारत में हुईं आतंकी हमलों में भी उसकी बड़ी भूमिका रही होगी।

करीब महीने भर पहले अमेरिकी खुफिया स्रोतों यह जानकारी सामने आई थी कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में अमेरिका के एक आतंकरोधी कार्रवाई के दौरान अल कायदा के सरगना रह चुके उसामा बिन लादेन के बेटे हमजा बिन लादेन की मौत हो गई। इसके साथ ही यह भी माना गया कि अब तालिबान का वह दौर खत्म हुआ, जिसमें वह खुद को सांकेतिक रूप से उसामा बिन लादेन के साथ जुड़ा हुआ मानता था। हमजा बिन लादेन के बाद अब आसिम उमर के मारे जाने की खबर के बाद न केवल तालिबान का बचा हुआ नेतृत्व कमजोर होगा, बल्कि उसकी गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ेगा। लेकिन यह मान कर निश्चिंत हो जाना शायद तालिबान को फिर से तैयार होने का मौका मुहैया कराने की तरह होगा। इसलिए आतंक विरोधी कार्रवाई में एक निरंतरता की जरूरत होगी। सही है कि उसामा बिन लादेन को मार कर अमेरिका ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की थी। तब माना गया था कि अब इस समूचे उपमहाद्वीप पर तालिबान का वर्चस्व और असर खत्म हो जाएगा और इसका समूची दुनिया पर असर पड़ेगा। लेकिन हकीकत यह है कि अब भी वहां तालिबान के कई ऐसे बड़े कद के आतंकी मौजूद हैं, जो उसकी कमान संभाल रहे हैं और अफगानिस्तान और वहां से इतर आतंकी हमलों को अंजाम दे रहे हैं।

यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनावों के पहले तालिबान ने अफगानिस्तान में किस पैमाने का आतंक मचाया। अमूमन हर रोज दर्जनों लोगों के मारे जाने की खबरें आती रहीं। इससे यही जाहिर होता है कि तालिबान या दूसरे आतंकवादी समूहों से लड़ाई के नाम पर अफगास्तिान में अमेरिकी सुरक्षा बलों के लंबे अभियान के बावजूद वहां आतंकवाद की जड़ों को बहुत कमजोर नहीं किया जा सका है। हाल में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनावों के दौरान जितनी कम संख्या में लोग बाहर निकले, उससे साफ था कि आज भी वहां तालिबान का खौफ किस कदर हावी है। दरअसल, तालिबान ने इस बार फिर चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा की थी और लोगों को वोट न देने की हिदायत दी थी। सवाल है कि अफगानिस्तान में ‘सब कुछ ठीक कर देने’ के दावे के साथ अमेरिका और दूसरे देशों की ओर से सालों से चल रहा बहुस्तरीय अभियान आज भी वहां के आम लोगों के बीच सुरक्षा का भाव नहीं भर सका है तो इसमें किसकी जिम्मेदारी बनती है?

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