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हार और हताशा

राहुल गांधी ने इस हार को सहज ढंग से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का नाम लेकर कह दिया कि उन्हें अपने बेटों की चिंता अधिक थी, पार्टी की नहीं। इससे स्वाभाविक ही पार्टी में खलबली है।

Author May 27, 2019 1:29 AM
कांग्रेस अध्यक्ष ने पार्टी कार्यसमिति की बैठक बुलाई है। (फोटोः पीटीआई)

चुनाव नतीजों के बाद हारे हुए दल अपनी कमजोरियों की समीक्षा करते ही हैं। जिन दलों को उम्मीद से कम सीटें मिलती हैं, वे भी अपनी रणनीति पर मंथन करते हैं। फिर वे अगले चुनावों के लिए नए ढंग से मैदान में उतरने का साहस भरते हैं। पर इस लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद जैसी हताशा विपक्षी दलों में नजर आ रही है, वह उनके साहस खो देने का संकेत देती है। राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस हार से इस कदर निराश हुए कि उन्होंने पद छोड़ने की पेशकश कर दी। पार्टी कार्यकर्ता उन्हें मनाने में जुटे हैं, पर वे अपने फैसले पर अड़े हुए हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कह दिया कि वे अब अपने पद पर नहीं रहना चाहतीं। दूसरे दलों में भी इसी तरह की निराशा नजर आ रही है। दरअसल, इस लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि वे भाजपा और उसके सहयोगी दलों को सत्ता तक पहुंचने से रोकने में सफल होंगे। वे भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए काफी समय से एकजुटता दिखा रहे थे, चुनाव में कई राज्यों में गठबंधन करके मैदान में उतरे थे, पर भाजपा ने अपनी पहली पारी से भी अधिक सीटें हासिल की और विपक्ष को बुरी तरह धूल चटा दी।

हालांकि ऐसी हार-जीत पहली बार नहीं हुई है। मगर इस बार भाजपा की जीत विपक्षी दलों को इसलिए नहीं पच पा रही कि उन्हें अंदाजा था कि लोग पिछली सरकार के कामकाज के तरीके और उसके अनेक फैसलों से नाराज थे। उन्हें भाजपा को ऐसे समर्थन की उम्मीद नहीं थी। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली कामयाबी से भी ऐसे ही संकेत मिले थे। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष और उनके कार्यकर्ताओं में उत्साह था और उन्होंने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। उनकी सभाओं में भीड़ भी नजर आती थी। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस ने कड़ी घेरेबंदी कर रखी थी, पर उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। ऐसे में पार्टी का मुखिया हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता है, तो उसका बड़प्पन माना जाता है। मगर राहुल गांधी ने इस हार को सहज ढंग से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का नाम लेकर कह दिया कि उन्हें अपने बेटों की चिंता अधिक थी, पार्टी की नहीं। इससे स्वाभाविक ही पार्टी में खलबली है।

कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता रहा है। इससे पार पाने के मकसद से ही करीब पंद्रह साल पहले पार्टी के बुराड़ी अधिवेशन में राहुल गांधी ने महासचिव बनने के बाद अपना प्रस्ताव रखा था कि चुनावों में टिकट प्रत्याशी के कामकाज और जमीनी पकड़ को देखते हुए दिया जाना चाहिए, न कि परिवार के आधार पर। मगर वह प्रस्ताव पार्टी के भीतर चुपके से दफन कर दिया गया। यहां तक कि जब राहुल गांधी खुद अध्यक्ष बने तब भी वे अपने प्रस्ताव को याद नहीं रख पाए, अपने वरिष्ठ नेताओं को उसके लिए मना नहीं पाए। अब उनके पद छोड़ने से पार्टी की स्थिति सुधर जाएगी, दावा नहीं किया जा सकता। इससे भाजपा को और लाभ मिलेगा, जैसा कि प्रियंका गांधी ने कहा भी। इसलिए अगर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों में इसी तरह हार से उपजी हताशा बनी रही, तो वह उन्हीं के लिए नुकसानदेह साबित होगा।

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