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संपादकीयः खुलासे के बाद

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम इन दिनों दोहरी परेशानी से गुजर रहे हैं। एक है कि उनके बेटे कार्ति चिदंबरम पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं।

Author March 4, 2016 3:11 AM
पी चिंदबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम इन दिनों दोहरी परेशानी से गुजर रहे हैं। एक है कि उनके बेटे कार्ति चिदंबरम पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे हैं। और कार्ति के जरिए उन्हें भी घेरा जा रहा है। चूंकि तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव के मद््देनजर कांग्रेस का द्रमुक से गठजोड़ हो चुका है, इसलिए कार्ति के मामले को जोर-शोर से उठाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी अन्नाद्रमुक की दिख रही है, जिसने इस मुद््दे पर कई बार संसद की कार्यवाही बाधित की। दूसरी परेशानी खुद चिदंबरम पर लगा आरोप है।

उनके गृहमंत्री रहते मंत्रालय के सचिव रहे गोपाल पिल्लई ने खुलासा किया है कि इशरत जहां मामले में सरकार का हलफनामा खुद चिदंबरम ने बदलवाया था। गौरतलब है कि जून 2004 में अमदाबाद में इशरत जहां और उसके तीन साथी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। आरोप लगा कि यह मुठभेड़ फर्जी थी। जांच हुई और अभियोजन भी शुरू हुआ। गुजरात पुलिस के सात अधिकारियों को जेल जाना पड़ा। वर्ष 2009 में केंद्र सरकार ने अदालत में जो पहला हलफनामा दिया था उसमें इशरत को आतंकी बताया गया था। पर बाद में एक दूसरा हलफनामा दिया गया जिसमें इशरत के लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े होने के सारे उल्लेख हटा लिये गए।

पिल्लई का कहना है कि दूसरा हलफनामा खुद चिदंबरम ने लिखवाया। इसी समय गृह मंत्रालय के एक और पूर्व अफसर आरवीएस मणि ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार के दौरान इशरत को आतंकी नहीं बताने को लेकर उन पर दबाव डाला गया था, हलफनामा बदलने का भी निर्देश दिया गया। मणि ने यहां तक कहा है कि इस सब के लिए एसआईटी के मुखिया ने उन्हें सिगरेट से दागा और सीबीआई उनका पीछा करती थी। सरकारी गवाह बन चुके डेविड हेडली की गवाही में भी इशरत के लश्कर से संबंधित होने की बात सामने आ चुकी है। जाहिर है, इन खुलासों ने चिदंबरम को तो सांसत में डाला ही है, कांग्रेस को भी बचाव की मुद्रा में ला दिया है।

चिंदबरम ने माना है कि हलफनामा बदले जाने के पीछे उनका हाथ था, पर उनका कहना है कि दूसरा हलफनामा देने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि तब तक और भी तथ्य या सबूत सीबीआई के हाथ लग गए थे, जो कि पहले हलफनामे के समय हासिल नहीं थे। अगर मान लें कि यह सफाई पर्याप्त नहीं है और चिदंबरम की भूमिका संदेह के घेरे में है, तब भी कुछ सवाल उठते हैं। पिल्लई और मणि इतने लंबे समय तक क्यों खामोश थे? कांग्रेस ने पिल्लई पर पलटवार करते हुए पूछा है कि अडाणी की कंपनी से जुड़ने के साढ़े छह साल बाद ही उन्हें अपने ऊपर दबाव डाले जाने का खुलासा करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? यह अनुमान किया जा सकता है कि सीबीआई गृह मंत्रालय के मातहत होने के कारण तत्कालीन गृहमंत्री के दबाव में रही होगी।

पर इशरत मामले की जांच अमदाबाद के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने भी की थी और हाईकोर्ट की पहल पर गठित एसआईटी यानी विशेष जांच दल ने भी। क्या उन जांच निष्कर्षों को एकदम गलत और पिल्लई व मणि के अब जाकर आए खुलासों को ही पूरी तरह सही मान लिया जाए? ताजा खुलासों के मद््देनजर इस पूरे मामले की फिर से जांच के सुझाव आए हैं। लेकिन तब सीबीआई सरकार के दबाव में आ गई होगी, तो क्या गारंटी कि अब नहीं आएगी? इस विवाद ने एक बार फिर सीबीआई को स्वायत्त किए जाने की मांग को औचित्य प्रदान किया है।

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