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संपादकीयः गतिरोध के बाद

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक दल की नेता चुने जाने के बाद महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की संभावना अब मूर्त रूप लेती दिख रही है।

Author March 26, 2016 03:36 am
शाह के साथ महबूबा मुफ्ती

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक दल की नेता चुने जाने के बाद महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की संभावना अब मूर्त रूप लेती दिख रही है। यों पार्टी के विधायक दल की नेता के तौर पर उनका चुनाव कभी भी हो सकता था। पर दो महीने से ज्यादा समय से यह टलता रहा, तो इसके पीछे मुख्य वजह भाजपा से गठबंधन को लेकर उनकी दुविधा ही रही होगी। जनवरी में मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन से मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली हो गई। यह रिक्तता पीडीपी को भरनी थी और पार्टी में इसके लिए सबसे प्रबल दावेदार महबूबा मुफ्ती ही थीं, जो कि अब उनके सर्वसम्मत चुनाव से भी जाहिर है। लेकिन पहले तो वे यह कह कर अनिच्छा दिखाती रहीं कि अपने पिता की मौत से वे गम में डूबी हैं, और ऐसे में सरकार के गठन की पहल नहीं करना चाहतीं।

फिर उन्होंने यह जताना भी शुरू कर दिया कि सरकार बने इसकी गरज उन्हें नहीं, भाजपा को ज्यादा है। मगर धीरे-धीरे यह साफ होता गया कि उनकी हिचकिचाहट के पीछे बड़ी वजह कुछ और थी। दरअसल, उन्हें लग रहा था कि भाजपा से गठबंधन के कारण घाटी में पीडीपी का जनाधार कम हो रहा है। वैसे भी यह गठबंधन विरोधाभासों का सामंजस्य ही कहा जाएगा, जो त्रिशंकु विधानसभा से उपजी सियासी मजबूरियों की देन है। खुद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसे दो ध्रुवों का मिलन कहा था। पर अब क्या हो गया कि महबूबा सरकार बनाने के लिए राजी हो गर्इं। ऐसा लगता है कि गतिरोध बने रहने की सूरत में पीडीपी के भीतर असंतोष पनप रहा था। यह तक अटकल लगाई जा रही थी कि मुख्यमंत्री पद के फेर में पीडीपी का कोई नेता कुछ विधायकों के साथ अलग हो सकता है।

बहरहाल, अब ऐसी अटकलों और करीब ढाई महीने से चली आ रही अनिश्चितता पर विराम लग गया है। पर महबूबा मुफ्ती अगर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेती हैं तो उनके पास इस बात का क्या जवाब होगा कि सरकार कागठन और पहले क्यों नहीं हो सकता था? मंगलवार को प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि वे संतुष्ट हैं। पर उनकी संतुष्टि का क्या आधार है? जहां तक ‘गठबंधन के एजेंडे’ का सवाल है, मुफ्ती मोहम्मद सईद के कार्यकाल में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे पीडीपी अपनी उपलब्धि बता सके। न तो कश्मीर मसले पर सभी आंतरिक पक्षों से किसी स्तर पर बातचीत की शुरुआत हुई, न विश्वास बहाली के तौर पर सरहद के दोनों तरफ जनता के स्तर पर संपर्क बढ़ाने की कवायद हुई, न अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम पर पुनर्विचार शुरू हुआ।

उलटे मोदी सरकार के दौरान पाकिस्तान से होने वाली बातचीत दो बार अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई। एक बार संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन की घटनाओं के कारण, और दूसरी बार, पठानकोट के हवाई ठिकाने पर हुए आतंकी हमले की वजह से। इसलिए कहना मुश्किल है कि गठबंधन के एजेंडे को लेकर कोई नई उम्मीद महबूबा में जगी होगी और उसी से उनका मन बदला होगा। गठबंधन का दूसरा दौर शुरू होने जा रहा है तो इसका कारण यही है कि दोनों पार्टियों के पास इसके सिवा दूसरा चारा नहीं है। पर वे चाहें तो इस गठजोड़ को मजबूरी के मिलन के बजाय ऐतिहासिक अवसर में भी बदल सकती हैं, जम्मू और कश्मीर के बीच की खाई को पाट कर।

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