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तालिबान की जड़ें

तालिबान पर शिकंजा कसने या फिर उसे नेस्तनाबूद करने के पीछे अमेरिकी मंशा छिपी नहीं है। उसका मकसद अफगानिस्तान से सस्ता तेल और गैस प्राप्त करना है। इसी मकसद से उसने शुरू में तालिबान की खूब मदद की थी।

Author नई दिल्ली | May 23, 2016 04:34 am
अमेरिकी ड्रोन हमले में तालिबान लीडर मुल्लाह मंसूर मारा गया था। (File Photo)

अफगानिस्तान में तालिबान के मुखिया मुल्ला मंसूर को अमेरिकी सेना ने मार गिराया। माना जा रहा है कि इसके बाद अफगानिस्तान में तालिबान की गतिविधियां मंद पड़ जाएंगी। मुल्ला मंसूर ने पिछले साल ही तालिबान की कमान संभाली थी। इसके पहले मुल्ला उमर ने इसका नेतृत्व संभाल रखा था। मुल्ला उमर की मौत के बाद जब मुल्ला मंसूर को तालिबान की कमान सौंपी गई तो इसका काफी विरोध हुआ। तालिबान के कुछ नेता और सदस्य इससे अलग हो गए। उन्हीं में से कुछ ने इस्लामिक स्टेट समूह की स्थापना की। इस्लामिक स्टेट तालिबान के लिए बड़ी चुनौती साबित हुआ।

मगर अमेरिका ने अफगानिस्तान में आइएस पर हमले शुरू किए तो तालिबान ने जैसे राहत की सांस ली। मगर अमेरिका के लिए तालिबान से परेशानी कम नहीं हुई। उसने अनेक मौकों पर प्रयास किया कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच सुलह हो जाए। मगर तालिबान अपनी मांग पर अड़ा रहा कि जब तक अफगानिस्तान सरकार विदेशी सैनिकों को देश से बाहर नहीं निकालती, वह बातचीत के लिए आगे नहीं बढ़ेगा। मगर अफगानिस्तान और अमेरिका सरकार के बीच दो साल पहले समझौता हुआ था कि शांति और सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में बने रहेंगे। तालिबान को अमेरिकी सैनिकों का वहां टिके रहना मंजूर नहीं। इसलिए मुल्ला मंसूर के मारे जाने के बाद तालिबान अमेरिकी मंशा के अनुरूप अफगानिस्तान सरकार से समझौता कर लेगा, दावा करना मुश्किल है।

दरअसल, तालिबान पर शिकंजा कसने या फिर उसे नेस्तनाबूद करने के पीछे अमेरिकी मंशा छिपी नहीं है। उसका मकसद अफगानिस्तान से सस्ता तेल और गैस प्राप्त करना है। इसी मकसद से उसने शुरू में तालिबान की खूब मदद की थी। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनवाने में भी उसने अहम भूमिका निभाई थी। मगर जैसे ही उसे लगने लगा कि तालिबान के सिर पर हाथ रख कर उसने बड़ी गलती कर दी, वह उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं चल रहा तो नौ-ग्यारह के हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। तालिबान की सत्ता समाप्त कर वहां लोकतंत्र की स्थापना का यश लूटने की कोशिश करने लगा। अमेरिका से पहले वहां रूस ने अपनी दोस्ती का परचम लहरा रखा था। मगर सोवियत संघ के बिखरते ही अमेरिका को मौका मिल गया और उसने वहां अपनी ताकत झोंक दी।

जाहिर है, महाशक्तियों का इरादा शुरू से अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और खुशहाली का माहौल बनाने के बजाय अपना कारोबारी हित साधना रहा है। इसीलिए अमेरिका पाकिस्तान पर भी उतना ही दबाव डालता रहा है, जितने से उसका मकसद सधता हो। वह पाकिस्तान से लगी सीमा पर तालिबानी सक्रियता को रोकने का दबाव तो डालता रहा है, पर दूसरे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ वैसी ही सख्ती के लिए कभी जोर नहीं डाला। अमेरिका के इस दोहरे रवैए के चलते भारत को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। भारत ने तालिबान का कभी समर्थन नहीं किया। ये चरमपंथी संगठन इस्लाम के नाम पर यहां के युवाओं को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका लाभ उठाता है। ऐसा नहीं कि अमेरिका इस बात से अनजान है कि पाकिस्तान में तालिबान के अलावा भी दूसरे चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं, जो जब-तब बड़ी वारदात को अंजाम देते रहे हैं। अगर अमेरिका सचमुच दहशतगर्दी पर नकेल कसने का हिमायती है, तो उसे अपने कारोबारी हितों के हिसाब से चुनिंदा संगठनों के खिलाफ कदम उठाने के बजाय समग्र कार्रवाई करनी चाहिए।

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