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साझेदारी का सफर

अफगानिस्तान के साथ धीरे-धीरे एक कूटनीतिक आयाम भी विकसित हो रहा है। भारत की ही जोरदार पैरवी से उसे सार्क में प्रवेश मिला था। अब भारत चाहता है कि ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में अफगानिस्तान भी साझेदार बने

Author नई दिल्ली | September 16, 2016 4:54 AM
नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए। (REUTERS/Cathal McNaughton/14 Sep, 2016)

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी की ताजा भारत यात्रा दोनों देशों के रिश्तों का एक अहम पड़ाव साबित हुई है। यों गनी पिछले साल अप्रैल में भी दिल्ली आए थे, पर तब और अब का फर्क साफ रेखांकित किया जा सकता है। पिछली बार के मुकाबले इस बार भारत ने कहीं अधिक गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। वजह समझी जा सकती है। पिछली बार जब गनी दिल्ली आए, तो उन दिनों वे पाकिस्तान से पींगें बढ़ा रहे थे, इस उम्मीद में कि इससे सुरक्षा की दृष्टि से अफगानिस्तान में हालात बेहतर हो जाएंगे। पर उन्हें नाउम्मीदी हाथ लगी। फिर, कई और मामलों में भी अफगानिस्तान को कटु अनुभव हुए। मसलन, भारत के साथ सड़क मार्ग से व्यापार की सहूलियत देने से पाकिस्तान कतराता रहा है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि आतंकवाद के मसले पर भारत के सुर में सुर मिलाने में अफगानिस्तान को कतई संकोच नहीं हुआ। दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों की वार्ता के बाद गनी और मेजबान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साझा बयान में आतंकवाद के इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत और अफगानिस्तान ने आतंकवाद के सभी प्रायोजकों और ठिकानों को नेस्तनाबूद करने का आह्वान किया है। कहना न होगा कि भले पाकिस्तान का नाम न लिया गया हो, पर इशारा उसी की तरफ है। पाकिस्तान की जमीन से अपनी गतिविधियां चलाने वाले आतंकवादी संगठनों ने भारत के बाद सबसे ज्यादा वारदातें अफगानिस्तान में ही की हैं। लिहाजा, आतंकवाद के स्रोत और रास्ते को चिह्नित करने के साथ ही भारत और अफगानिस्तान ने सुरक्षा व रक्षा सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है। अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा देने का निर्णय दोनों देश पहले ही कर चुके थे। पर फिलहाल इस बात का कोई संकेत नहीं है कि अफगानिस्तान को भारत किसी तरह की हथियारी मदद भी देगा। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास में ही भारत हाथ बंटाता आया है; वहां का संसद भवन और भारत-अफगानिस्तान मैत्री बांध इस नीति के दो बड़े प्रतीक हैं।

इस सिलसिले को जारी रखते हुए भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, कौशल विकास, महिला सशक्तीकरण, ऊर्जा, आधारभूत संरचना और लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे क्षेत्रों में अफगानिस्तान के क्षमता-निर्माण के लिए एक अरब डॉलर की सहायता राशि देने की घोषणा की है। इस मौके पर दोनों पक्षों के बीच तीन समझौते भी हुए, जिनमें सबसे अहम है प्रत्यर्पण समझौता, जिस पर बरसों से बातचीत चल रही थी। बाकी दो समझौतों में बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग और नागरिक तथा व्यावसायिक मामलों में सहयोग पर सहमति शामिल है। पर अफगानिस्तान के साथ धीरे-धीरे एक कूटनीतिक आयाम भी विकसित हो रहा है। भारत की ही जोरदार पैरवी से उसे सार्क में प्रवेश मिला था। अब भारत चाहता है कि ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में अफगानिस्तान भी साझेदार बने, जिसमें भारत मुख्य भूमिका निभा रहा है। इस तरह मई में हुए त्रिपक्षीय समझौते के कुछ ठोस रूप लेने की संभावना दिख रही है। चाबहार के जरिए ईरान और भारत के साथ अफगानिस्तान का जुड़ाव जहां उसकी व्यापारिक क्षमता और संभावना को बढ़ाएगा, वहीं इसके लिए पाकिस्तान पर रही आई उसकी निर्भरता काफी कम हो जाएगी। पाकिस्तान की अड़ंगेबाजी के चलते ही अफगानिस्तान के साथ भारत का मोटरवाहन समझौता नहीं हो पाया था। पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में भारत की पैठ बढ़े। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अशरफ गनी की इस बार की भारत यात्रा ने पाकिस्तान को मायूस ही किया होगा।

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