दाखिले की राह

यह अपने आप में एक विडंबना है कि कड़ी मेहनत करने वाला कोई विद्यार्थी सिर्फ इसलिए किसी पाठ्यक्रम में दाखिला लेने से वंचित रह जाए कि वहां नियमों को ताक पर रख कर कुछ अन्य विद्यार्थियों को जगह दे दी गई।

सांकेतिक फोटो।

यह अपने आप में एक विडंबना है कि कड़ी मेहनत करने वाला कोई विद्यार्थी सिर्फ इसलिए किसी पाठ्यक्रम में दाखिला लेने से वंचित रह जाए कि वहां नियमों को ताक पर रख कर कुछ अन्य विद्यार्थियों को जगह दे दी गई। ऐसे में न सिर्फ दाखिले से वंचित हो जाने वाले विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन होता है, बल्कि प्रतिभाओं की उपेक्षा एक व्यापक समस्या के रूप में भी जड़ें जमाती है। इसके अलावा, दाखिले की निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार कर अगर कुछ विद्यार्थियों को गलत तरीके से जगह दी जाती है, तो चुपचाप बनने वाली यह व्यवस्था देश और समाज के लिए दूरगामी स्तर पर नुकसानदेह साबित होगी।

शायद यही वजह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने साफ लहजे में कहा है कि लाखों विद्यार्थी योग्यता के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि ऐसे संस्थानों में पिछले दरवाजे से दाखिले का चलन बंद हो। अदालत ने इस संदर्भ में पांच छात्रों की एक अपील को खारिज कर दिया, जिन्हें चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित केंद्रीकृत काउंसलिंग में शामिल हुए बिना ही भोपाल के एलएन मेडिकल कॉलेज अस्पताल और अनुसंधान केंद्र ने प्रवेश दे दिया गया था।

यों देश के सभी सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में नीट परीक्षा परिणाम के आधार पर केंद्रीकृत काउंसलिंग व्यवस्था के जरिए ही दाखिले की व्यवस्था है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय भी निर्देश जारी कर चुका है। इस आधार पर भारतीय चिकित्सा परिषद ने अप्रैल, 2017 में ही संबंधित पांचों छात्रों के प्रवेश को निरस्त करने से संबंधित पत्र जारी किए थे। उसके बाद भी कई बार ध्यान दिलाया गया। लेकिन हैरानी की बात है कि न तो उन छात्रों ने और न ही मेडिकल कॉलेज ने उन पर गौर करने की जरूरत समझी।

कॉलेज ने इन छात्रों को परीक्षाओं में भी शामिल होने की अनुमति दी और आगे बढ़ने दिया। सवाल है कि कॉलेज का जो प्रबंधन निर्धारित प्रक्रिया में एक भी बिंदु में चूक की वजह से किसी विद्यार्थी को दाखिले से वंचित कर दे सकता है, उसने इतने अहम मामले में नियमों की अनदेखी कर छात्रों को पिछले दरवाजे से संस्थान में प्रवेश कैसे दिया! यही नहीं, न सिर्फ छात्रों ने अपने दाखिले को निरस्त करने के भारतीय चिकित्सा परिषद के पत्र को महत्त्व नहीं दिया, बल्कि बार-बार ध्यान दिलाए जाने के बावजूद संस्थान को इस संबंध में कोई कार्रवाई करना जरूरी नहीं लगा! नतीजतन, उन छात्रों ने अपने जीवन के अहम चार साल गंवा दिए।

दरअसल, मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए देश भर में निजी और सरकारी संस्थानों की एक शृंखला खड़ी हो चुकी है। इनमें दाखिलों के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया है और इसी के तहत हर साल विद्यार्थियों को जगह मिलती है। लेकिन इसके समांतर ऐसे सवाल भी उठते रहे हैं कि कुछ संस्थानों में फीस या डोनेशन के नाम पर भारी रकम के बदले नियम और प्रक्रिया को धता बता कर भी दाखिला दे दिया जाता है।

इसका खमियाजा उन विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है, जिन्होंने बहुत मेहनत से तैयारी की होती है और प्रतिभा की कसौटी पर वे बेहतरीन होते हैं। पिछले दरवाजे से किसी भी संस्थान में प्रवेश या नौकरी का सीधा नुकसान मेधा को तो उठाना ही पड़ता है, यह कानून के भी खिलाफ है। अफसोसनाक यह है कि अदालतों के स्पष्ट निर्देशों और निर्धारित प्रक्रिया के बावजूद कुछ संस्थानों के प्रबंधन अपने स्तर पर इस तरह की गड़बड़ी करते हैं, जिसकी कीमत मेधावी विद्यार्थियों को चुकानी पड़ती है।

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