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फौरी मदद

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए फौरन कुछ करना जरूरी है। कोरोना की दूसरी लहर ने झकझोर दिया है। संक्रमितों और मरने वालों का आंकड़ा होश उड़ा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए फौरन कुछ करना जरूरी है। कोरोना की दूसरी लहर ने झकझोर दिया है। संक्रमितों और मरने वालों का आंकड़ा होश उड़ा रहा है। इसने अर्थव्यवस्था के हालात और गंभीर कर डाले। छोटे-बड़े उद्योगों को भारी मदद की दरकार है। ऐसे में रास्ता यही रह जाता है कि केंद्रीय और व्यावसायिक बैंक मदद के दूत बनें। जैसा कि देखा जा रहा है, सबसे ज्यादा दबाव स्वास्थ्य क्षेत्र पर है। अस्पताल संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। आॅक्सीजन, दवाइयों, चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति बता रही है कि हालात को देखते हुए कुछ भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में जब तक कंपनियां उत्पादन नहीं बढ़ाएंगी, नई इकाइयां नहीं लगेंगी, तब तक चिकित्सा क्षेत्र को जरूरी सामान की आपूर्ति मुश्किल ही है।

इसलिए सबसे पहले उन इकाइयों के लिए कर्ज का रास्ता और आसान किया गया है जो स्वास्थ्य क्षेत्र की जरूरतों से जुड़ी हैं। रिजर्व बैंक ने पचास हजार करोड़ रुपए देने की बात कही है। इस पैसे से चिकित्सा उपकरण बनाने वाले उद्योगों को कर्ज मिलेगा। टीका बनाने वाली कंपनियां भी कर्ज लेकर उत्पादन बढ़ा सकेंगी। दवा कंपनियों को भी आसानी से कर्ज मिल सकेगा। जीवन रक्षक प्रणाली जैसा सामान आयात करने वाले भी कर्ज का फायदा उठा सकेंगे। हालांकि इसे स्थायी राहत नहीं कहा जा सकता। फिर भी फौरी जरूरतों के हिसाब से यह अच्छी शुरुआत है। इस काम को प्राथमिकता मिलनी भी चाहिए।

हालात के मद्देनजर स्वास्थ्य क्षेत्र में भारी निवेश की दरकार है। अगर बैंकों की मदद से चिकित्सा उपकरण और टीके बनाने वाली नई कंपनियां खड़ी हो जाती हैं तो ये कंपनियां आगे के लिए धरोहर भी बन जाएंगी। मौजूदा संकट ने यह अहसास करा दिया है कि ऐसी किसी भी आपदा से निपटने के लिए हमें क्या और कितना चाहिए। इसलिए यह वक्त वर्तमान चुनौतियों से निपटने के साथ भविष्य की तैयारियों का भी है। गौरतलब है कि देश में टीकाकरण का काम जोरों पर है। लेकिन पिछले कुछ दिनों में पर्याप्त मात्रा में टीके नहीं बन पाने से इस मुहिम को धक्का लगा है। इसका उपाय टीका उत्पादन बढ़ाना ही है। सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक जैसी कंपनियां तो सरकार से मदद भी ले चुकी हैं।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि छोटे और मझौले सभी उद्योग संकट में हैं। कामधंधा नहीं हो पाने की वजह से इकाइयां पिछले साल जैसी ही मुश्किलों में घिर गई हैं। महामारी से निपटने के लिए कई राज्यों को जिस तरह से सख्त प्रतिबंध लगाने पड़े हैं, उससे काम-धंधे ठप पड़ गए हैं। रोजाना हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा है। ऐसे में कारोबारियों और उत्पादकों के सामने बैंक कर्ज की किस्तें चुकाने का संकट है।

लेकिन सवाल यह भी है कि पैसा आए तो कहां से। अगर मदद नहीं मिली तो ज्यादातर कारोबारी सड़क पर होंगे। इसके लिए केंद्रीय बैंक ने पच्चीस करोड़ रुपए तक के कर्ज वाली कंपनियों को कर्ज पुनर्गठन की सुविधा देने का एलान किया है। नए कर्ज भी दिए जाएंगे। दस लाख रुपए तक की सहायता को प्राथमिकता क्षेत्र के लिए कर्ज माना जाएगा। ज्यादा कुछ हो या न हो, इससे कम से कम इतना तो होगा कि कारोबार कुछ समय के लिए ठप होने से बच जाएंगे। लगता है कि आरबीआइ ने पिछली घटनाओं से सबक लेकर इस बार पहले ही कुछ कदम उठा लिए हैं। केंद्रीय बैंक इस हकीकत से तो अनजान नहीं ही होगा कि आने वाला दौर अनिश्चितताओं से भरा हो सकता है। हर स्तर पर जोखिम बरकरार हैं। ऐसे में पहला मकसद जीवन और आजीविका बचाने का ही होना चाहिए।

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