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दाल के दाम

सरकार भले थोक मुद्रास्फीति में गिरावट का दावा कर रही हो, पर हकीकत यह है कि खाद्य पदार्थों, खासकर दाल और सब्जियों की खुदरा कीमतें आसमान छू रही हैं। इन दिनों शायद ही कोई दाल हो, जिसकी कीमत सवा सौ रुपए से अधिक न हो।

Author October 16, 2015 10:16 AM

सरकार भले थोक मुद्रास्फीति में गिरावट का दावा कर रही हो, पर हकीकत यह है कि खाद्य पदार्थों, खासकर दाल और सब्जियों की खुदरा कीमतें आसमान छू रही हैं। इन दिनों शायद ही कोई दाल हो, जिसकी कीमत सवा सौ रुपए से अधिक न हो। अरहर और उड़द दालों की कीमत तो करीब दो सौ रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। इसे लेकर स्वाभाविक ही सरकार के माथे पर बल पड़ गए हैं। उसने दाल का आयात बढ़ा दिया है और भरोसा दिलाया है कि जल्दी ही दालों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकेगा।

कहा जा रहा है कि पिछले साल बेमौसम बारिश होने की वजह से दलहनी फसलों को काफी नुकसान पहुंचा था, जिसके चलते दाल की पैदावार कम हुई। इस साल भी कई बड़े राज्यों में सूखे के कारण अरहर की पैदावार में कमी का अनुमान है। लेकिन दाल की महंगाई को इस साल पैदावार में कमी से जोड़ कर देखना तस्वीर के एक ही पहलू को देखना होगा। दूसरा पहलू यह है कि दलहन की खेती को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। रही-सही कसर कालाबाजारी और जमाखोर पूरी कर देते हैं। हर साल दालों का आयात करना पड़ता है। इस साल उत्पादन गिरने से जमाखोरों की बन आई और उन्होंने कीमतों में बढ़ोतरी का खेल शुरू कर दिया। हालांकि सरकार जल्दी ही दालों के आयात के जरिए इस समस्या पर काबू पाने की कोशिश कर रही है, मगर तब तक उपभोक्ता की जेबें काफी कुछ ढीली हो जाएंगी। फिर, यह समझने की जरूरत है कि आयात इस समस्या का टिकाऊ समाधान नहीं है।

भारत में दालों की खपत दुनिया में सबसे अधिक है। शाकाहारी लोगों के लिए यह प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। मगर दलहन की खेती को पर्याप्त प्रोत्साहन न मिल पाने से जरूरत के बरक्स पैदावार कम हो रही है। दाल का उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने अब तक जो कुछ किया है वह निहायत नाकाफी साबित हुआ है। विचित्र है कि सरकार दाल के आयात पर करीब पांच हजार करोड़ रुपए खर्च कर देती है, मगर दलहनी फसलों को प्रोत्साहन देने के मद में महज पांच सौ करोड़ रुपए मंजूर करती है। दलहनी फसलों के लिए खाद और पानी की वैसी जरूरत नहीं पड़ती जैसी नगदी फसलों को। फिर भी किसान दलहन को लेकर उत्साहित नहीं होते, इसलिए कि न तो इनका न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाता है और न कीट प्रतिरोधक क्षमता वाले बीज विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

कुछ ही देश हैं, जहां दालों का उत्पादन होता है, इसलिए इस मामले में बाहरी देशों पर उस तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता, जिस तरह गेहूं, चावल, चीनी आदि की बाबत। लिहाजा यह बहुत जरूरी है कि दलहनी फसलों पर शोध, उन्नत बीजों के विकास आदि को बढ़ावा दिया जाए। यह काम देसी कृषि अनुसंधान को प्रोत्साहन देकर ही किया जा सकता है। दाल को लेकर पैदा हुई मौजूदा स्थिति का तकाजा सिर्फ फौरी राहत का नहीं, बल्कि टिकाऊ समाधान के उपायों पर ध्यान देने का भी है।

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