आशियाने बेरौनक

अब त्योहारी मौसम शुरू हो चुका है। आमतौर पर नवरात्रि और दिवाली के समय लोग घर खरीदते हैं।

सांकेतिक फोटो।

अब त्योहारी मौसम शुरू हो चुका है। आमतौर पर नवरात्रि और दिवाली के समय लोग घर खरीदते हैं। मगर ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े निराश करने वाले हैं। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में घर खरीदने को लेकर लोगों का उत्साह नहीं बन पा रहा। दिल्ली और इसके सटे शहरों में मकानों की बिक्री ग्यारह फीसद घटी है, जबकि भवन निर्माण में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। हालांकि देश के कुछ महानगरों में घर खरीदने की दर में कुछ बढ़ोतरी दर्ज हुई है, मगर कोलकाता और दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह घटी है।

कोलकाता में सबसे अधिक- बाईस फीसद- कमी दर्ज हुई है। पिछले कुछ सालों में भवन निर्माण के क्षेत्र में शिथिलता दर्ज हुई, तो उसकी कुछ वजहें साफ हैं। केंद्र सरकार ने काला धन छिपाने के लिए अवैध रूप से की जाने वाली मकानों की खरीद पर अंकुश लगाने के लिए कुछ नियम-कायदों में कड़ाई कर दी थी। उसका भवन निर्माण क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा। इस बीच कोरोना संकट के चलते पूर्णबंदी ने भी इस कारोबार की कमर तोड़ दी थी। मगर फिर लड़खड़ा चुके भवन निर्माण क्षेत्र को उबारने के लिए सरकार ने नियम-कायदों को लचीला बनाया और बड़े पैमाने पर राहत पैकेज दिया। इससे इस क्षेत्र में कुछ रौनक तो लौटनी शुरू हो गई, मगर खरीदार न मिल पाने की वजह से लाखों आशियाने अब भी बेरौनक पड़े हुए हैं।

भवन निर्माण का क्षेत्र अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें रोजगार सृजन की क्षमता भी अधिक होती है। मगर इस क्षेत्र में गति न आ पाने की वजह से अर्थव्यवस्था में इसका अपेक्षित योगदान नहीं मिल पा रहा। मकानों की बिक्री न हो पाने की एक बड़ी वजह तो यह है कि कोरोना के चलते ज्यादातर कारोबार ठप पड़ गए हैं, बहुत सारे लोगों की कमाई कम हो गई है, तो लाखों लोगों की नियमित आय बंद हो गई है। नए रोजगार की संभावनाएं सिकुड़ गई हैं। बाजार की चमक फीकी पड़ी हुई है। इस तरह जिन लोगों के पास कुछ जमा पूंजी है भी, वे अपना हाथ रोके हुए हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं हो पा रहा कि अर्थव्यवस्था कब तक पटरी पर लौटेगी। फिर जिन लोगों को वास्तव में मकान की जरूरत है और वे खरीदना भी चाहते हैं, उनमें से बहुत सारे लोगों के मन में भवन निर्माताओं पर भरोसा नहीं बन पा रहा। पिछले दिनों जिस तरह अदालतों ने कुछ भवन निर्माताओं के खिलाफ अनियमितता के मामलों में कड़ी कार्रवाई करने, तैयार अट्टालिकाओं को ढहा देने के आदेश दिए, उससे ग्राहकों का विश्वास काफी डगमगाया है।

जिन लोगों ने विवादित अट्टालिकाओं में भवन खरीदे थे, उन्हें समय पर मकान मिलना तो दूर, उनकी जमा-पूंजी भी फंस गई। इस तरह अनेक सोसाइटियों के लगभग तैयार भवन कानूनी अड़चनों की वजह से वीरान पड़े हैं। हालांकि भवन निर्माताओं और निवेशकों ने बार-बार सरकार से गुहार लगाई कि उन भवनों को किसी तरह विवाद से बाहर निकालें, मगर सरकार कोई रास्ता नहीं निकाल सकी। यह कहीं न कहीं सरकार की विफलता ही कही जाएगी कि भवन निर्माता नियम-कायदों की अनदेखी करके या उसकी आंखों में धूल झोंक कर अनियमितता की कोशिश करते हैं। इस तरह अगर दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्राहकों का विश्वास डोला हुआ है और वे जरूरत होने के बावजूद मकान खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे, तो विश्वास बहाली के लिए व्यावहारिक उपाय सरकार को ही तलाश करने पड़ेंगे।

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