कला जगत में ऐसे कम लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन में लगभग हर स्तर पर प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद न केवल मजबूत उपस्थिति दर्ज की, बल्कि अपनी चुनी हुई विधा को एक नया आयाम दिया।
तीजन बाई और पंडवानी आज एक-दूसरे के मजबूत पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं, तो इसकी एक ठोस पृष्ठभूमि भी है। महज नौ साल की उम्र में जब तीजन बाई ने अपने चचेरे नाना से पंडवानी का प्रशिक्षण लेना शुरू किया, तो उस उम्र में भी उन्हें समाज से लेकर अपने परिवार तक का काफी विरोध झेलना पड़ा।
दरअसल, पंडवानी विधा में गायन को आमतौर पर पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। आगे उनका निजी जीवन भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ और उनकी शादी भी टूटी। मगर पंडवानी और तीजन बाई ने शायद एक-दूसरे को चुन लिया था और यही वजह थी कि कमजोर सामाजिक तबके से आने और तमाम विपरीत हालात के बावजूद उन्होंने अपनी कला को नहीं छोड़ा और उसके तहत वे महाभारत कथा की अलग-अलग बारीकियों के साथ उसके अभिनय पक्ष पर काम करती रहीं।
अपनी प्रतिबद्धता की वजह से ही वे न केवल अपने आसपास के गांवों में एक कामयाब पंडवानी गायिका के रूप में जानी गईं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने भी उन्हें अपनी प्रस्तुति देने का अवसर मिला।
उनकी प्रतिभा के लिए उन्हें पद्म पुरस्कारों सहित कई अन्य सम्मान से नवाजा गया, लेकिन उनकी अहमियत उनके व्यक्तित्व में मौजूद उन खासियतों से कायम रही, जिन्हें उन्होंने काफी मेहनत और संघर्ष से अर्जित किया था।
उनकी प्रस्तुतियों में उत्साह, ऊर्जा, आक्रामकता, कठोरता से लेकर कोमलता और वात्सल्य के भाव दर्शकों के भीतर उतर जाते थे और इससे पता चलता है कि उन्हें इसके लिए किस स्तर की साधना से गुजरना पड़ा होगा।
औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर होने के बावजूद अपनी चुनी हुई कला में उन्होंने जिस स्तर की बारीकियां हासिल कीं, वैसा विरले दिखता है।
मौजूदा दौर में मंचीय प्रस्तुतियां महज चकाचौंध और आधुनिक तकनीक की गूंज में दबी लगती हैं, लेकिन कला और उसकी अहमियत को समझने वालों को तीजन बाई की प्रस्तुतियों के बीच ठहराव के साथ मौन की संवेदना के मायने भीतर तक उतर जाना ज्यादा याद रह जाता है।
