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संपादकीय: परदेस में नुमाइंदगी

सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस ने अपने एक अध्ययन में यह बताया है कि इस साल के चुनाव में बीस लाख से ज्यादा भारतीय-अमेरिकियों ने अपने वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल किया है। अमेरिका में चुनाव और वहां के मतदाताओं की संख्या के मुताबिक जिस तरह के आकलन सामने आते रहे हैं, उसमें भारतीय-अमेरिकियों की इतनी बड़ी तादाद काफी महत्त्व रखती है।

अमेरिका के राष्ट्रपुति चुनाव में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों ने वोट डाले तथा हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव के लिए जीत हासिल की है

अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव पर शुरू से ही समूचे विश्व की नजर है और अंतिम नतीजों को लेकर सबकी उत्सुकता बनी हुई है। हालांकि नतीजों को लेकर जिस तरह की जद्दोजहद दिख रही है, विभिन्न पक्षों के जैसे बयान आए हैं, वह अप्रत्याशित है और यह देखने की बात होगी कि अमेरिकी व्यवस्था उससे कैसे निपटती है। नई बनने वाली सरकार भारत के लिए भी राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी खासा महत्त्व रखेगी। लेकिन इस बीच अमेरिकी चुनावों में भारत से जुड़ी भावनाओं के लिहाज से कई अहम बातें उभर कर सामने आई हैं। नतीजों के आने के साथ ही एक खास बात यह रही कि इसमें भारतवंशियों ने जैसी उपस्थिति दर्ज की है, वह इस पैमाने पर पहले नहीं देखा गया था और चर्चा का विषय नहीं बना था।

गौरतलब है कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद के साथ-साथ कई राज्यों में भी चुनाव हुए हैं। उनमें अलग-अलग जगहों पर पांच महिलाओं सहित एक दर्जन से ज्यादा भारतवंशियों ने जीत का परचम लहराया है। अमेरिकी में भारतीय मूल के लोगों की जीवन-स्थितियों के लिहाज से इसे एक अहम उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

अमेरिका में भारत से जाकर बसने वालों के जोर का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि भारतीय मूल के चार उम्मीदवार एमी बेरा, प्रमिला जयपाल, रो खन्ना और राजा कृष्णमूर्ति अमेरिकी कांग्रेस के निम्न सदन यानी हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव के लिए दोबारा निर्वाचित हुए हैं। इसके अलावा, कम से कम तीन प्रत्याशी और हैं, जो कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। फिर भारतीय-अफ्रीकी मूल की पहली महिला कमला हैरिस उप-राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं। स्वाभाविक ही लोगों भीतर यह जिज्ञासा पैदा हुई है कि इस बार अमेरिका के चुनावों में भारतीय मूल के लोगों की ऐसी धमक की वजह क्या हो सकती है।

सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस ने अपने एक अध्ययन में यह बताया है कि इस साल के चुनाव में बीस लाख से ज्यादा भारतीय-अमेरिकियों ने अपने वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल किया है। अमेरिका में चुनाव और वहां के मतदाताओं की संख्या के मुताबिक जिस तरह के आकलन सामने आते रहे हैं, उसमें भारतीय-अमेरिकियों की इतनी बड़ी तादाद काफी महत्त्व रखती है।

अमेरिका में भारतीय मूल के करीब पैंतालीस लाख लोग रहते हैं। इस लिहाज से देखें तो जब मतदान में भाग लेने वाले भारतीय मूल के लोगों की संख्या इतनी बड़ी है तो इसका असर नुमाइंदगी की दावेदारी में दिखना स्वाभाविक है।

हालांकि चुनावों के दौरान और उससे पहले भी अमेरिका में सरकारें संख्या बल की वजह से भारतीय अमेरिकियों की आमतौर पर खयाल रखती हैं और चुनावों में उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश करती हैं। मगर इस बार भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के प्रति दोनों राजनीतिक पक्षों में जैसा आकर्षण देखा गया, उन्हें अपने पक्ष में करने की जैसी कोशिशें की गईं, वह महत्त्वपूर्ण है।

खासतौर पर रिपब्लिकन पार्टी और खुद डोनाल्ड ट्रंप ने बाकायदा भव्य कार्यक्रमों का आयोजन करके भारतीय-अमेरिकियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की। हालांकि परंपरागत रूप से भारतीय-अमेरिकी आमतौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी को अपना समर्थन देते रहे हैं। लेकिन इस बार चुनावों के पहले अमेरिका की मौजूदा रिपब्लिकन पार्टी की सरकार ने एच-1 बी वीजा को लेकर जैसा रवैया दिखाया और जिसकी जद में भारतीय आप्रवासी भी आए, उसका असर निश्चित रूप से मतदान और समर्थन पर पड़ा होगा। जो हो, अमेरिका के चुनावों में भारतीय-अमेरिकियों का मतदान और प्रतिनिधित्व के स्तर पर ऐसी उपस्थिति दर्ज करना काफी महत्त्वपूर्ण है।

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