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संपादकीयः बेजा दखल

अभी तक भारत के आंतरिक मामलों में बेवजह दखल देने के लिए कश्मीर का राग गाना पाकिस्तान अपनी ड्यूटी मानता रहा है। पाकिस्तान की इस आदत की वजह से विश्व के ज्यादातर देशों ने उसकी बातों को महत्त्व देना बंद कर दिया है।

मौजूदा दौर में बदलते विश्व के मुताबिक इस संस्था की भूमिका नए सिरे से तय करने पर बात हो।

संयुक्त राष्ट्र की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर होना यह चाहिए था कि मौजूदा दौर में बदलते विश्व के मुताबिक इस संस्था की भूमिका नए सिरे से तय करने पर बात हो, जरूरत होने पर उसके ढांचे और नीतियों में भी सुधार का सवाल उठाया जाए। लेकिन विडंबना यह है कि दुनिया के कुछ देश अंतरराष्ट्रीय जमावड़े के ज्यादातर मौके पर अपनी मौजूदगी को ऐसे मुद्दों को भुनाने का जरिया बना लेते हैं, जो न केवल बेमानी होता है, बल्कि दूसरे देशों की संप्रभुता तक में दखल होता है। भारत का पड़ोसी पाकिस्तान दुनिया भर में अब इसीलिए अपनी एक पहचान बना चुका है और उसकी बातों को बहुत सारे देश गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन अफसोस यह है कि पाकिस्तान की इस छवि का उदाहरण सामने होने के बावजूद दूसरे कुछ देश इससे सबक लेने के बजाय उसी की तरह बनने में नहीं हिचक रहे हैं। मसलन, पिछले कुछ समय से तुर्की के नेताओं की ओर से ऐसे बयान सामने आ रहे हैं, जो यही दर्शाते हैं कि उन्हें अपनी बातों से भारत के साथ अपने संबंधों या फिर वैश्विक कूटनीतिक माहौल पर पड़ने वाले असर की फिक्र नहीं हो रही है!

गौरतलब है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन को बिना किसी संदर्भ के भारत के आंतरिक मामले पर बेमानी टिप्पणी का मौका बना लिया। उन्होंने कहा कि कश्मीर विवाद, जो दक्षिण एशिया की स्थिरता और शांति के लिए महत्त्वपूर्ण है, अभी एक ज्वलंत मुद्दा है। सवाल है कि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए फिक्र जताने वाले एर्दोगान को क्या इसका अंदाजा है कि किसी स्वतंत्र देश की संप्रभुता में बेजा दखल देने से कैसी जटिलताएं खड़ी हो सकती हैं और इसका इस समूचे इलाके की स्थिरता और शांति पर क्या असर पड़ सकता है? स्वाभाविक ही भारत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और साफ शब्दों में कहा है कि जम्मू-कश्मीर पर राष्ट्रपति एर्दोगान की टिप्पणी भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है और यह पूरी तरह अस्वीकार्य है; तुर्की को दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करना सीखना चाहिए और उसे अपनी नीतियों में गहराई से प्रतिबिंबित करना चाहिए।

दरअसल, अभी तक भारत के आंतरिक मामलों में बेवजह दखल देने के लिए कश्मीर का राग गाना पाकिस्तान अपनी ड्यूटी मानता रहा है। पाकिस्तान की इस आदत की वजह से विश्व के ज्यादातर देशों ने उसकी बातों को महत्त्व देना बंद कर दिया है। हालत यह है कि अतीत में ऐसे कई मौके आए जब पाकिस्तान ने कश्मीर का मुद्दा छेड़ा तो ईरान जैसे कई इस्लामी देशों ने भी उसे ऐसा करने के लिए फटकार लगाई। लेकिन दिनोंदिन पाकिस्तान के साथ करीबी बढ़ने के क्रम में तुर्की खुद भी उसी की भूमिका में उतरता दिख रहा है। बीते कुछ समय में तुर्की की ओर से कश्मीर को लेकर कई मौकों पर बेमानी बयानबाजियां की गई हैं। दरअसल, पिछले कुछ सालों से एर्दोगान तुर्की को वैश्विक स्तर पर इस्लामी जगत की राजनीति का केंद्र बनाने की कोशिश में हैं। लेकिन इसी दौरान एर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की ने जिस तरह अपनी पुरानी उदार और प्रभावी छवि को गंवाया है और धार्मिक पहचान की राजनीति के दायरे में सिमटता गया है, उसका नुकसान किसे हो रहा है? इसमें पाकिस्तान एर्दोगान का मुखर सहयोगी साबित हो रहा है। शायद यही वजह है कि वे पाकिस्तान के सुर में बोल कर भारत के लिए मुश्किलें पैदा करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। तुर्की को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और इससे यह खुद सुलझा लेगा। इसमें किसी बाहरी देश को दिलचस्पी लेने की जरूरत नहीं है।

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