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संपादकीय: अमेरिका को झटका

अमेरिका ईरान के खिलाफ जो कदम उठाना चाहे और उसमें उसे वैश्विक निकाय व अन्य देशों का समर्थन न मिले तो ऐसे में उसकी बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक ही है। इसे एक तरह से अमेरिकी तानाशाही को खुली चुनौती के रूप में भी देखा जा सकता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।

ईरान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका एक बार फिर जिस तरह की दादागीरी पर उतर आया है, उससे यह स्पष्ट रूप से झलक रहा है कि अब वह नया संकट खड़ा करने की तैयारी में है। अमेरिका ने ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को फिर से थोपने का एकतरफा एलान कर दिया है। ईरान पर आरोप यह है कि वह 2015 के परमाणु समझौते का पालन नहीं कर रहा है। अमेरिका की खिसियाहट इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि सुरक्षा परिषद ने ईरान पर हथियारों की पांबदी को विस्तार नहीं दिया है।

अमेरिका ईरान के खिलाफ जो कदम उठाना चाहे और उसमें उसे वैश्विक निकाय व अन्य देशों का समर्थन न मिले तो ऐसे में उसकी बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक ही है। इसे एक तरह से अमेरिकी तानाशाही को खुली चुनौती के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि अमेरिका इस तरह की एकतरफा कार्रवाइयां कर ईरान को उकसाता रहा है। ऐसे में अमेरिका मध्यपूर्व में शांति स्थापित करने में क्या और कैसी भूमिका निभा रहा है, यह सबके सामने है।

पर इस बार अमेरिका को झटका लगा है। भले उसने ईरान पर फिर से शिकंजा कसने के लिए पाबंदियां बहाल करने का एलान कर दिया हो, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने हाथ खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने साफ कह दिया है कि जब तक सुरक्षा परिषद हरी झंडी नहीं देगी, तब तक ईरान पर फिर से पाबंदियां नहीं लगाई जा सकती। सुरक्षा परिषद में चीन और रूस तो ईरान पर पाबंदियों के अमेरिकी प्रस्ताव के खुल कर विरोध में हैं। ईरान के मुद्दे पर फ्रांस भी अमेरिका के साथ नहीं है। ऐसे में सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव को पास कराने में अमेरिका को मुंह की खानी पड़ जाएगी।

ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए 2015 में अमेरिका और यूरोपीय संघ के कुछ प्रमुख देशों ने ईरान के साथ जो बहुपक्षीय करार किया था, अमेरिका तो उससे पहले ही हट चुका है। ऐसे में उसे क्या अधिकार रह जाता है कि ईरान की घेरेबंदी के लिए वह सुरक्षा परिषद और दूसरे देशों पर दबाव डाले। ईरान पर फिर से पाबंदी के एकतरफा फैसले के विरोध में उसी के मित्र राष्ट्र- ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी खड़े हो गए हैं। जाहिर है, ईरान सही है या अमेरिका, पश्चिमी देश अब इस बात को बखूबी समझ रहे हैं।

अमेरिका में दो महीने बाद राष्ट्रपति चुनाव हैं। डोनाल्ड ट्रंप इस वक्त जिस सियासी संकट का सामना कर रहे हैं, उसमें उनके सामने चीन और ईरान दो ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें चुनावी हथियार बनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल में संयुक्त अरब अमीरात और इजराइल के बीच राजनयिक रिश्तों की बहाली करके अरब दुनिया में नया पांसा भी खेला है। इस कवायद के मूल में भी असल निशाना ईरान है। इस साल जनवरी में ईरान के शीर्ष कमांडर कासेम सुलेमानी की हत्या करवा कर अमेरिका ने मध्यपूर्व में युद्ध जैसे हालात बना दिए थे।

इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि परमाणु हथियारों को लेकर अमेरिका आज जिस तरह के हाथ धोकर ईरान के पीछे पड़ा है, एक समय इराक को भी उसने ऐसे ही घेरा था। और नतीजा क्या निकला, सारी दुनिया ने देखा। इराक के पास कहीं कोई परमाणु, जैविक या रासायनिक हथियार नहीं मिले। इसकी आड़ में उसने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटवा कर इराक को गृह युद्ध की आग में झोंक दिया। अमेरिका यही कहानी ईरान के साथ दोहराना चाह रहा है। ऐसे में पश्चिमी समुदाय और संयुक्त राष्ट्र की यह जिम्मेदारी बनती है कि बेकाबू अमेरिका पर भी लगाम लगाएं और मध्यपूर्व को युद्ध के खतरे से बचाएं।

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