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संपादकीयः मनमानी की रेल

संसद में बहस के दौरान ज्यादातर मुद््दों के राजनीतिक शक्ल अख्तियार कर लेने की वजह से आम नागरिकों की रोजमर्रा की असुविधाओं पर चर्चा कम ही हो पाती है।

Author January 6, 2018 2:45 AM
(PHOTO-PTI)

संसद में बहस के दौरान ज्यादातर मुद्दों के राजनीतिक शक्ल अख्तियार कर लेने की वजह से आम नागरिकों की रोजमर्रा की असुविधाओं पर चर्चा कम ही हो पाती है। लेकिन गुरुवार को ट्रेनों की लेटलतीफी और उसके चलते यात्रियों को होने वाली दिक्कतों पर राज्यसभा में सवाल उठे। दो महीने पहले रेलवे ने अड़तालीस नई ट्रेनों को सुपरफास्ट का दर्जा देकर ज्यादा किराया वसूलने की घोषणा की थी। जबकि हालत यह है कि हाल के दिनों में कोई भी ट्रेन अपनी गति और निर्धारित समय के मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है। लगभग सभी गाड़ियां कई-कई घंटे की देरी से चल रही हैं। इसी के मद््देनजर राज्यसभा में कांग्रेस के पीएल पुनिया ने सवाल उठाया कि रेलवे ने कई ट्रेनों को सुपरफास्ट का दर्जा देकर करोड़ों रुपए यात्रियों से वसूले हैं, लेकिन कोई भी ऐसी ट्रेन समय से नहीं पहुंच पा रही है; ऐसी स्थिति में यात्रियों से वसूला जाने वाला सुपरफास्ट शुल्क लौटाया जाए या फिर यह लिया ही न जाए।

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करीब छह महीने पहले कैग यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस मसले पर जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यात्री सुपरफास्ट का किराया चुकाते हैं, लेकिन ट्रेन अगर उस गति से नहीं चले तो लोगों को उनका किराया लौटा दिया जाए। मगर इस पर गौर करने के बजाय राज्यसभा में रेलमंत्री पीयूष गोयल ने इस मसले पर सफाई देते हुए बरसों से कायम आधारभूत ढांचे को जवाबदेह बताया। निश्चय ही ट्रेनों के सुव्यवस्थित संचालन के लिए बुनियादी ढांचे का दुरुस्त होना जरूरी है, मगर इसी स्थिति में पहले हालत इतनी बुरी नहीं थी। ट्रेनों के मौजूदा परिचालन के मद््देनजर कोई भी यह कह सकने की स्थिति में नहीं है कि उसे अपने गंतव्य तक जाने के लिए आसानी से टिकट मिल जाएगा या वह वहां समय से पहुंच जाएगा। लेकिन इस बीच रेल महकमे ने सुविधाएं और सुरक्षा बढ़ाने के दावे के साथ फ्लैक्सी और प्रीमियम ढांचे के तहत किराया-वृद्धि से लेकर दूसरे मदों में यात्रियों से वास्तविक किराए के मुकाबले कई गुना ज्यादा पैसा वसूलना शुरू कर दिया है।

सवाल है कि इसके बावजूद क्या यात्रियों को वे सुविधाएं मिल पा रही हैं? कई ट्रेनों को करीब ढाई महीने तक के लिए पूरी तरह रद्द करने के बाद भी लगभग सभी ट्रेनों का अपने निर्धारित वक्त से कई-कई घंटे की देरी से पहुंचना आम बात हो चुकी है। फिलहाल जाड़े के मौसम में कोहरे की वजह से गाड़ियों के देरी से चलने का हवाला दिया जा रहा है। मगर सच यह है कि साफ मौसम में भी ट्रेन से कहीं निर्धारित समय पर पहुंचना दुष्कर होता गया है। लंबे समय से ट्रेनों को कोहरे का सामना करने वाली तकनीक से लैस करने की बातें कही जाती रही हैं, मगर इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। रेलवे में लाखों खाली पदों पर नियुक्ति की जरूरत सरकार को क्यों महसूस नहीं होती? इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक तरफ बुलेट ट्रेन के लिए तमाम इंतजाम किए जा रहे हैं, दूसरी ओर सामान्य गाड़ियों के परिचालन की व्यवस्था बुरी तरह बाधित है। क्या इसी तरह भारतीय रेलवे को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जाएगा!

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