ताज़ा खबर
 

कुपोषित विकास

यह विडंबना ही है कि एक ओर हम मंगल मिशन जैसे अंतरिक्ष अभियानों पर गर्व कर रहे हैं, दूसरी ओर दुनिया भर में कुपोषित बच्चों भारत की हिस्सेदारी अड़तीस फीसद है। हालांकि बच्चों के बीच कुपोषण की व्यापकता ये तथ्य नए नहीं हैं, लेकिन बुधवार को बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जैव-तकनीकी विभाग, अंतरराष्ट्रीय विकास […]

Author November 22, 2014 10:03 am

यह विडंबना ही है कि एक ओर हम मंगल मिशन जैसे अंतरिक्ष अभियानों पर गर्व कर रहे हैं, दूसरी ओर दुनिया भर में कुपोषित बच्चों भारत की हिस्सेदारी अड़तीस फीसद है। हालांकि बच्चों के बीच कुपोषण की व्यापकता ये तथ्य नए नहीं हैं, लेकिन बुधवार को बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जैव-तकनीकी विभाग, अंतरराष्ट्रीय विकास संबंधी संयुक्त राष्ट्र की एंजेसी और कुछ अन्य संगठनों की ओर से आयोजित एक कार्यशाला में फिर से इन पर चिंता सामने आई। गौरतलब है कि विश्व भर में कम से कम साठ लाख बच्चों की मौत पांच साल से कम उम्र में ही हो जाती है और लगभग साढ़े सोलह करोड़ बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध होता है। भारत में बड़े पैमाने पर बच्चे जिन वजहों से कुपोषण के शिकार होते हैं, अगर गंभीरता से कोशिश की जाए तो उनसे पार पाया जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि दिखने वाले कुछ मुद््दों को चुन कर विकास के दावे किए जाते हैं और कुपोषण से निपटना जरूरी नहीं समझा जाता।

कई अध्ययनों में ये तथ्य आ चुके हैं कि देश के चालीस से पैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और हर साल लाखों बच्चे इस वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं। जाहिर है, कुपोषित बच्चों के भीतर रोग प्रतिरोेधक क्षमता ठीक से विकसित नहीं हो पाती और वे तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। फिर, उनमें से बहुत-से उन बीमारियों की भी भेंट चढ़ जाते हैं जिनका आसानी से इलाज हो सकता है। इसके अलावा, गरीब परिवारों की महिलाओं को गर्भावस्था में पोषणयुक्त आहार नहीं मिल पाने से कैसे बच्चों का जन्म होगा और उनके लिए जीवन की संभावना और स्थितियां क्या होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। कहने को कुपोषण से निपटने के लिए एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम से लेकर मिड-डे मील जैसी महत्त्वाकांक्षी योजनाएं लागू हैं। लेकिन अपर्याप्त आबंटन से लेकर बदइंतजामी और भ्रष्टाचार ने इन कार्यक्रमों को कारगर नहीं बनने दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय कलंक कहा था। वे दस साल प्रधानमंत्री रहे, लेकिन यह कलंक कितना मिटा? जबकि उनके कार्यकाल के अधिकतर वर्षों में देश ने ऊंची विकास दर दर्ज की थी। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्य के विकास मॉडल का बढ़-चढ़ कर प्रचार भी करते रहे हैं। लेकिन कुपोषण के मामले में गुजरात की स्थिति आज भी किसी पिछड़े राज्य से अलग नहीं है। कुपोषण से संबंधित एक नया आयाम यह कि अब इसके दायरे में खाते-पीते परिवारों के बच्चे भी आने लगे हैं। लेकिन वहां समस्या दूसरी है। आधुनिक जीवन-शैली के चलते जिस तरह ‘फास्ट फूड’ का चलन बढ़ा है, उसमें शायद ही कभी इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि जो चीजें बच्चे खा रहे हैं उनसे उन्हें पोषण कितना मिल पाता है। लेकिन छोटे-से संपन्न तबके को छोड़ दें तो देश की ज्यादातर आबादी में कुपोषण की समस्या जीवन शैली की नहीं, अभाव की उपज है। अगर इतनी बड़ी आबादी को ठीक से खाना नहीं मिल पाता है तो हम किस विकास का दम भरते हैं!

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App