अपने भरोसे की राह

जो काम करने से हम बोझिल होने लगते हैं या नीरसता हमें घेरने लगती है, ऐसे कामों से खुद का बचाव करना ही बेहतर है।

सांकेतिक फोटो।

स्वरांगी साने

जो काम करने से हम बोझिल होने लगते हैं या नीरसता हमें घेरने लगती है, ऐसे कामों से खुद का बचाव करना ही बेहतर है। संस्कृत का एक शब्द है- क्षेत्र। हिंदी भाषा में इसका प्रयोग ‘काम के क्षेत्र’ के संदर्भ में भी होता है, जबकि संस्कृत में इसका तात्पर्य खेत और मन से भी है। खेत-खलिहान की रक्षा के लिए जैसे मेड़ बनाई जाती है, वैसे ही अपने मन की रक्षा के लिए भी बाड़ खड़ी कर लें जो हमारी उन लोगों और स्थितियों से रक्षा करेगी, जिनसे हम परेशान हो जाते हैं, जिनके साथ व्यवहार के बाद हम खुद को एकदम खाली-खाली पाते हैं।

इसी तरह अंग्रेजी भाषा में ‘बिग बी’ मतलब बड़ा भाई होता है। वहां बड़े भाई से बहुत उम्मीदें होती हैं। अपना बड़े भाई हम खुद बन सकते है। हमारी पीठ पीछे क्या हो रहा है, उसे लेकर सतर्क रहें। मसलन, वहां बिग बी का मतलब अंततोगत्वा रक्षक होता है, वैसे ही रक्षक बनें। भारतीय संस्कृति में भाई को बहन की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है। हरेक अपनी रक्षा का दायित्व खुद ही क्यों न उठा ले!

तो उन स्थितियों को टटोलने की जरूरत है, जिनमें रहते हुए हम खुद को लुटा-पिटा पाते हैं। कौन-सी स्थितियां हैं जो हमें क्षण भर में थका देती हैं, हमारी सारी ऊर्जा का दोहन कर लेती हैं। अपनी रक्षा के लिए हम खुद को ही पुकारें। अगर हम डर या भय पैदा करने वाली स्थितियों में होते हैं, उसका असर हमारेपूरे जीवन पर पड़ने लगता है। ऐसे कुछ स्थान, लोग और चीजें हो सकती हैं, जिनसे हमें निजात पाने की जरूरत है। जो हमारेलिए बेहतर नहीं, उन्हें अपने पाले में न रखें। या उनसे पाला ही न पड़े, ऐसी व्यवस्था करें। हमेशा संघर्षरत रहने की जरूरत नहीं है। ‘ये बेचारा काम के बोझ का मारा’, यह वाक्प्रचार हमारे हिस्से में आता हो तो यह सोचने की जरूरत है कि जो हम कर रहे हैं, उससे वास्तव में क्या हासिल होता है!

कई बार जब हमें दिशा परिवर्तन करने की आवश्यकता होती है, जिससे हमारी दशा परिवर्तित हो सकती है तो ऐसे कुछ गीत, संवाद, कहावत-मुहावरे हमें सुनाई देने लगते हैं। हम अपने आसपास कुछ ऐसा पढ़-देख लेते हैं, जिससे हमें लगता है कि यह संदेश हमारे लिए ही है। कभी कोई फिल्म, वीडियो या धारावाहिक या सीरीज देखते हुए उसका कोई एक संवाद या एक दृश्य हमारे मन-मस्तिष्क में कौंध जाता है। उसे अपने लिए प्रकृति की ओर से मिलने वाला संकेत समझ कर उस पर मनन कर सकते हैं।

अगर हम उस आवाज को सुन लेंगे और उस पर गौर कर पाएं तो काफी सुकून मिल सकता है। हो सकता है हम लगातार परेशानी झेलते हुए उस परेशानी को अपनी आदत बना चुके हों। कई बार हमारे जीवन में कुछ नया आता है तो हम उसका स्वागत करने से डरते हैं। यह अनजाने के प्रति भय होता है। इसका सरल उदाहरण देखना चाहें तो ऐसे समझ सकते हैं कि कोई कीड़ा है और उससे कहा जा रहा है कि मृत्यु के बाद तुम्हारा अगला जीवन राजा का है, तब भी वह मरना नहीं चाहेगा।

वह गंदगी, कीचड़-बदबू में पड़े-पड़े सड़ता रहेगा और उसे वही सबसे अच्छा भी लगेगा, क्योंकि भविष्य के प्रति वह आशंकित है। हालांकि ‘अगले जन्म’ का आश्वासन एक धारणा से संचालित होता है और वह बेमानी है, लेकिन क्या व्यवहार में हम ऐसा ही कुछ नहीं कर रहे होते? हम बदलाव से डरते हैं और हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा हमारे इस भय को और हवा देती हैं। वे हमें और डराती हैं कि पता नहीं आगे क्या होगा, उससे तो जो है, जैसा है, वही भला है।

इस डर से छुटकारा पाने की कोशिश करना चाहिए। हो सकता है हमारी प्रतिष्ठा भी दांव पर लग जाए, लेकिन अपने भविष्य और जड़ता को विश्लेषित करना चाहिए। उन स्थितियों से नाता तोड़ लेना चाहिए जो हमें हैरान-परेशान कर देती हैं। अपने लिए स्वस्थ सीमा रेखा बना सकते हैं और व्यर्थ के मोह-प्रमाद को खुद से दूर कर दे सकते हैं। हो सकता है जब हम एक स्वस्थ सीमा रेखा खींच दें तो वे परिस्थितियां और लोग खुद ही हमसे दूर हो जाएं। कुछ समय के लिए हमको खालीपन लग सकता है। उस खालीपन को भी महसूस करना चाहिए। रीते पोखर ही वर्षा के जल से भरा करते हैं, जो पहले से भरे हों, उन पहाड़ों पर पानी नहीं टिकता है।

हम नकारात्मकता और परेशानियों के बीच जीने के लिए नहीं बने हैं। खुद की मदद करना चाहिए। उसके बाद हमारे भविष्य या करिअर, रिश्ते और सोच पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ‘महाभारत’ के युद्ध के समय ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था कि जहां-जहां अर्जुन है, वहां-वहां कृष्ण है, मतलब जब-जब आप खुद को उलझनों में पाएं, अपने भीतर के कृष्ण को जगाने की जरूरत है। हमें उत्तर अवश्य मिलेंगे। अपने जीवन को ईर्ष्या-द्वेष, मत्सर-अहंकार से नहीं, प्यार से सराबोर कर लेना चाहिए।

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