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दुनिया मेरे आगे: मजाक की चोट

दरअसल, मजाक हम मनोरंजन के लिए करते हैं। लेकिन मजाक का तरीका जब परेशान या अपमानित करने जैसा होने लगे तो यह बुरा माना जाएगा।

Author Published on: May 24, 2018 3:59 AM
प्रतीकात्मक चित्र

चंदन कुमार चौधरी

आमतौर पर हम मौज-मस्ती और खुशी के मकसद से दोस्तों या अपने कुछ परिजनों के साथ मजाक करते हैं और खुशी के दो-चार पलों में हंसते हैं, ताजगी और आनंद का अनुभव करते हैं। इस शैली में न तो किसी का दिल दुखाया जाता है और न कोई ऐसी बात कही जाती है, जिससे किसी का मन सचमुच आहत हो। लेकिन मजाक करने की शैली में जब हम एक सीमा रेखा को पार करते हैं और व्यक्तिगत रूप से टीका-टिप्पणी करने लगते हैं तो यह शोभनीय नहीं होता है और कई बार तो इसके परिणाम भी काफी खतरनाक सामने आते हैं।

हमारे पड़ोस में एक बच्चा दूसरे आम बच्चों की तरह ही था। लेकिन जब वह पांच साल का था, तभी उसके पिता का निधन हो गया और उसके साथ उसकी मां और छोटी बहन बच गई। लेकिन कुछ समय बाद पता नहीं किस ईर्ष्या-द्वेष में उसके परिवार के कुछ अन्य सदस्यों ने मजाक के नाम पर उसका उपहास उड़ाना शुरू कर दिया। फिर आसपास के दूसरे लोगों को भी उस बच्चे में खोट नजर में आने लगा। वह कुछ भी करता या बोलता तो लोगों को उसमें कमी ही नजर आती थी। देखते-देखते प्रदीप दबाव में जीने वाला और एक दब्बू लड़का बन गया। वह अपने घर के आंगन से भी नहीं निकलना चाहता था। पता नहीं किस दुनिया में गुम और चुप रहता। उसकी मां-बहन को हमेशा उसकी चिंता सताती रहती, लेकिन वे लोग विवश थे। कुछ मजाक और तंज ऐसे भी हो सकते हैं जिससे परेशान होकर कोई बच्चा खुदकुशी कर ले। इस तरह की कई घटनाएं हम आए दिन अपने आसपास घटित होते देखते हैं। भले ही ऐसी घटना एक व्यक्ति के साथ घटित होती हो, लेकिन इसका प्रभाव उसके परिवार, दोस्त और रिश्तेदारों के मनो-मस्तिष्क पर लंबे समय तक रहता है।

दरअसल, मजाक हम मनोरंजन के लिए करते हैं। लेकिन मजाक का तरीका जब परेशान या अपमानित करने जैसा होने लगे तो यह बुरा माना जाएगा। अच्छा मजाकिया व्यक्ति खुद पर भी मजाक करने से नहीं हिचकता और वह अपनी हरकतों से बिना किसी को दुख पहुंचाए दूसरों का मनोरंजन करता है और हंसाता है। हंसी के ऐसे तरीकों का स्वागत होना चाहिए। लेकिन जब हम किसी की जाति, धर्म, लिंग, भाषा, बोलने के तरीके, रंग और लंबाई जैसे विषयों को लेकर मजाक करते हैं तो यकीन मानिए, यह मजाक नहीं होता है, बल्कि इससे दूसरे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। भले ही हम बाद में कहें कि यह मजाक था, लेकिन इससे व्यक्ति का आत्मसम्मान लहूलुहान होता है। जब हम दलितों-गरीबों के नाम पर मजाक करते हैं तो कहीं न कहीं वह व्यक्ति दुखी होता है और ऐसे मजाक को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

अगर हम किसी बच्चे के साथ हंसी-खेल करते हैं तो यह बुरा नहीं है। लेकिन अगर लगातार उसका मजाक उड़ाया जाए तो नतीजा क्या होगा! ऐसा बच्चा एक समय के बाद कुंठित हो जाएगा या प्रतिशोध से भर उठेगा। यानी एक खास तरह के व्यवहार और बातचीत के नतीजे में एक बच्चे का व्यक्तित्व नकारात्मक हो जाता है। हमें शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं हो कि इस तरह हम एक बच्चे को कुंठित नहीं बनाते, बल्कि अगर बड़े पैमाने पर ऐसा होता है तो हम अपने देश के भविष्य को भी बाधित करते हैं।

कई बार तो आत्मसम्मान को लगने वाले ठेस से आहत होकर कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी को हर संभव नुकसान पहुंचाने का भी प्रयास करता है या फिर खुद को बड़ा नुकसान पहुंचा देता है। ऐसी खबरें भी सामने आती हैं कि कहीं किसी ने किसी पर तेजाब फेंक दिया या चाकू मार कर जान ले ली। अगर हम ऐसी घटनाओं से बचना चाहते हैं और एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो हमें इन विषयों पर गंभीरता से विचार करना होगा और किसी के भी आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाले मजाक को रोकना होगा।

ऐसे मजाक के लिए चैनलों और इस पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। दरअसल, ऐसे माध्यमों का प्रभाव बहुत व्यापक होता है। ये अपने शब्दों और भाव-भंगिमाओं से एक बहुत बड़े दर्शक वर्ग को संबोधित कर रहे होते हैं। मजाक के नाम पर कई बार इन जगहों पर भी अनाप-शनाप दिखाया और परोसा जाता है। ऐसे माध्यम नियमों की सख्ती और उसका कड़ाई से पालन नहीं हो पाने का बेजा लाभ उठाते हैं और दर्शक इसे देख अपनी एक खास धारणा बना लेते हैं। एक जागरूक नागरिक होने के कारण हमें कम से कम अपने आसपास होने वाले ऐसे मजाक पर रोक लगाने के लिए अवश्य पहल करनी चाहिए। किसी का मजाक उड़ाने के बरक्स मजाक की सभ्यता निबाहना एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण होगा, जिसमें लोग एक बेहतर मनोरंजन कर सकेंगे।

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