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दोस्तों के सहारे अपनी खुशी

मनुष्य जीवन में दोस्ती का रिश्ता बड़ा प्यारा रिश्ता होता है।

एकता कानूनगो बक्षी

मनुष्य जीवन में दोस्ती का रिश्ता बड़ा प्यारा रिश्ता होता है। दोस्त होते ही कुछ ऐसे हैं, जिनके साथ बिताए चंद लम्हे हमें तरोताजा कर देते हैं। कई बार तो सुख और दुख के क्षणों में उनकी मौन उपस्थिति भी बहुत प्रभावी हो जाती है। उनका होना ही हमें बहुत हिम्मत दे देता है। अच्छे मित्रों का जीवन में होना हमारी अनमोल निधि होती है। जैसे मोती मिल गए हों किसी खजाने से। यह रिश्ता दिल से दिल के तार को जोड़ता है। आपसी समझ की मिसाल कायम करता है। एक ओर इसमें दूसरे की संवेदनाओं से गुजरकर निस्वार्थ समर्पण भाव की खुशबू होती है, वहीं एक दूसरे को संबल देकर जीवन को सहज और खूबसूरत बनाने के बेहतरीन रंग भी खिले होते हैं।

अगर ‘दोस्ती’ के संदर्भ में थोड़ा व्यापकता से विचार करें तो बड़े दिलचस्प तथ्य निकल आते हैं। दोस्त हमउम्र भी हो सकते हैं और उम्रदराज भी। हमसे उम्र में बहुत छोटे भी हो सकते हैं, यहां तक कि पेड़-पौधे भी हमारे दोस्त हो सकते हैं तो पशु पक्षी भी। निर्जीव वस्तुओं से भी हमारी पक्की दोस्ती बन जाती है। किताबों को तो इंसान की सच्ची दोस्त होने का गौरव पहले से हासिल हो चुका है। बचपन में हमारे खिलौने हमारे दोस्त ही थे और बाद में हमारी पहली गाड़ी या हमारी कोई खास चीज उससे हमारा लगाव, जो उन बेजान वस्तुओं में भी जान फूंक देता है, वह भी दोस्ती का ही एक खास रूप है। इस धरती के सभी जीवों का प्रकृति से भी एक तरह से दोस्ती का ही रिश्ता होता है।

जीवन की सुंदरता में मित्रता के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। मां और बेटे, पिता और पुत्री या पालक संतान, सास बहू, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि जैसे पारंपरिक आत्मीय रिश्तों के भीतर जब दोस्ती की सुहावनी हवा बहने लगती है तो यह और अधिक खूबसूरत और हर कसौटी पर खरा उतरने में सक्षम हो उठता है। दोस्तों का साथ हो तो सारी उलझनें मानो हंसते-मुस्कुराते हुए ही मिट जाती है। समय मानो पंखों पर उड़ान भरता हुआ गुजरता जाता है।

एक और अनूठी दोस्ती होती है जो हमेशा हमारे साथ बनी रहती है। वह है हमारी खुद से खुद की दोस्ती। यह वह सबसे अहम रिश्ता है जो निर्धारित करता है कि जीवन में हमारे अन्य रिश्ते और दोस्तियां सहज रहेंगी या नहीं। हमारे भीतर छिपे हुए दोस्त हमें मजबूत बनाते हैं। बाहरी दुनिया में कदम रखने से पहले ही सारा होमवर्क या यों कहें कि अभ्यास कराते रहते हैं।

ये हमें बहुत करीब से जानते और समझते हैं। हमारे दुखी होने से पहले ही इन्हें पता चल जाता है कि उदासी के बादल छाने लगे हैं। खुशियों का इंद्रधनुष खिलाने की युक्ति भी इन्हें ही पता होती है। दूसरों से अनावश्यक उम्मीद लगा कर हताश होने के बजाय हमें अपने भीतर के दोस्त से हर दिन खुल कर बात करनी चाहिए। उसका हाल-चाल पूछते रहना चाहिए।

अपनी परेशानियों को दूसरों से साझा करने से पहले भीतर बैठे हमारे मित्र से उसका परीक्षण करवाना चाहिए। इसके लिए हम डायरी लेखन का उपयोग भी कर सकते हैं। ऐसा करते समय हम खुद को बाहरी व्यक्ति समझ सकते हैं। चिंतन, मनन करने से हम अपने स्तर पर ही काफी परेशानियों का हल निकाल पाने में सफल हो सकते हैं। हमारे मन-मस्तिष्क में पहले से ही अधिकांश परेशानियों से जुड़े हर दस्तावेज और उपाय मौजूद होते हैं। सच तो यह है कि हमारी कई गुत्थियों और समस्याओं की चाबी भी हमारे भीतर ही मौजूद होती है।

खुद को खुश और स्वस्थ रखने की सब से पहली जिम्मेदारी हमारी अपनी ही होती है। उसके लिए खुद को ठीक तरह से समझ कर खुशियों के अवसर जुटाना, खुद को ऐसी गतिविधियों से जोड़ना, जिससे हम स्वस्थ और प्रसन्न बने रहें, यह बाहरी नहीं, हमारे भीतर के प्रबंधन पर ही खासा निर्भर करता है। गौर करें तो हम पाएंगे जब हम व्यस्तताओं के चलते खुद को एकांत समय नहीं दे पाते, विचार नहीं कर पा रहे होते हैं, तब अक्सर हम खुद को असंतुलित, व्याकुल और दिशाहीन महसूस करने लगते हैं। जैसे लंबे समय तक व्यायाम न करने से शरीर थका और बीमार पड़ जाता है, बस उसी तरह चिंतन-मनन अपनी भीतरी व्यवस्था और भीतर के दोस्त का ध्यान न रखने पर मानसिक और शारीरिक, दोनों ही कष्टों को झेलना पड़ जाता है।

कह सकते हैं कि सबसे जरूरी और पक्की दोस्ती हमारी खुद से खुद की होती है। खुद को स्वीकारना, जीवन में अच्छे बदलाव लाने के लिए खुद की मदद करना, सकारात्मक ऊर्जा देकर खुद को स्वस्थ रखना, खुद को उपहार देना, रोमांचक अनुभव से खुद को चकित कर देना। इस तरह अपना खयाल रखने जैसा सब कुछ हमें निरंतर करते रहना चाहिए। इससे हमारे भीतर मौजूद सबसे गहरे दोस्त ‘मन मस्तिष्क’ को खुश और प्रसन्न रखा जा सकता है। दोस्तों की खुशी में ही अपनी खुशी निहित होती है।

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