ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: शब्दों की संवेदना

अब सारे अक्षरों में से जीवन के वे रंग गायब हो गए लगते हैं। कुछ खास फॉन्ट में लिखे हुए इन अक्षरों से मन-मस्तिष्क को समझना नामुमकिन है। कितने ही संदेश बड़े एकरूप-से हो गए हैं, अग्रेषित होने लगे हैं! किसी ने कुछ भेजा है, तो वह उस व्यक्ति के मन की वही भावना होगी ही, ऐसा नहीं कह सकते। हर कोई, हर किसी को ‘गुड मॉर्निंग’ कहे जा रहा है। भले ही ‘मॉर्निंग’ में ‘गुड’ जैसा कुछ हो न हो। किसका समय कैसा होता है, यह किसको मालूम! अक्षर अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रहे तो 'इमोजी' का सहारा लिया जा रहा है। इमोजी से भी बात आधी-अधूरी लगे तो स्टिकरों का सहारा लिया जा रहा है।

Face bookसोशल मीडिया। सांकेतिक फोटो।

स्वरांगी साने

‘आप लिखें, खुदा बांचे’ से लेकर ‘अक्षर मोतियों जैसे हैं’! कितनी सारी कहावतें हैं, जो अपने अर्थ ही खो चुकी हैं, क्योंकि अब लिखे अक्षर किसी न किसी यंत्र, तकनीक से निकल कर आते हैं। इसलिए वे उतने ही यांत्रिक और तकनीकी हो गए हैं। अक्षर देख कर अब किसी के मन को नहीं पढ़ सकते हैं। हो सकता है कि पहले किसी के गंदे अक्षरों को पढ़ना कठिन हो जाता रहा हो, लेकिन तब मन पढ़ना सरल होता था। ‘लिफाफा देख कर मजमून’ इसीलिए पढ़ लिया जाता था कि गुलाबी खत प्यार का और लाल स्याही में लिखा मातम का, यह देखते ही समझ आ जाता था।

अब सारे अक्षरों में से जीवन के वे रंग गायब हो गए लगते हैं। कुछ खास फॉन्ट में लिखे हुए इन अक्षरों से मन-मस्तिष्क को समझना नामुमकिन है। कितने ही संदेश बड़े एकरूप-से हो गए हैं, अग्रेषित होने लगे हैं! किसी ने कुछ भेजा है, तो वह उस व्यक्ति के मन की वही भावना होगी ही, ऐसा नहीं कह सकते। हर कोई, हर किसी को ‘गुड मॉर्निंग’ कहे जा रहा है। भले ही ‘मॉर्निंग’ में ‘गुड’ जैसा कुछ हो न हो। किसका समय कैसा होता है, यह किसको मालूम! अक्षर अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रहे तो ‘इमोजी’ का सहारा लिया जा रहा है। इमोजी से भी बात आधी-अधूरी लगे तो स्टिकरों का सहारा लिया जा रहा है।

अक्षरों को संकेत के बैसाखियों की जरूरत पड़ रही है लेकिन तब भी बात पूरी नहीं हो पा रही। अक्षर लड़खड़ा रहे हैं तो भाव कैसे सीधे पहुंच पाएंगे। छोटे-छोटे संदेश कई बार बड़ी-बड़ी गलतफहमियां पैदा कर रहे हैं और ‘करेला तब और नीम चढ़ा’ हो रहा है, जब किसी संक्षिप्त शब्दावली में बात कही जा रही हो। कई बार ऐसे शब्दों का विस्तार किसी के लिए समझना मुश्किल भी हो जाता है। लेकिन जिनके लिए बातचीत का यह स्वरूप हो गया है, वे इसे लेकर सहज हो गए हैं। लेकिन इन सबसे जो मुख्य बात निकल कर आ रही है वह है- ‘की-बोर्ड से दूर रहो!’

हालांकि इसका यह मतलब भी यह लिया जा सकता है कि की-बोर्ड से सामने आने वाले अक्षर बात तो कह देंगे, लेकिन बात का मर्म छिपा जाएंगे। मर्म तक पहुंचने के लिए की-बोर्ड से ‘अवे’ या दूर जाना होगा, तभी किसी मर्ज का मलहम भी मिल सकेगा। लेकिन आज जरूरतों का जैसा विस्तार हो गया है, निर्भरता जिस कदर बढ़ गई है, उसमें की-बोर्ड से कितना दूर रहा जाए! लेकिन इन दिनों किसी के अक्षर उसके अपने नहीं रहे। हर कोई कृत्रिम अक्षरों का सहारा ले रहा है। जैसा जीवन हो गया है, वैसे ही अक्षर हो गए हैं। फॉन्ट में छप कर आते अक्षर एक ही सांचे में ढले होते हैं। उनसे किसी का हाल पता नहीं चल सकता, उनसे किसी का मन समझा नहीं जा सकता।

लिखते-लिखते हाथों के कांप जाने पर अक्षरों में उतरती थर्राहट… या लिखते हुए अक्षरों का थिरक उठना…! कभी दिल की बात और अक्षरों की गति में तालमेल न होने पर जल्दबाजी में लिखे गए अक्षर, कभी सोच-समझ कर रुक-रुक कर गढ़ा-गढ़ा कर लिखे गए अक्षर… कभी स्याही खत्म होने पर स्याही के बदलने से रंग बदलते अक्षरङ्घ लिखते हुए आंखों की कोर से गीले हो गए अक्षर..! उन अक्षरों को सहेज कर रखने पर कतरा-कतरा बिखरे अक्षर और कभी जर्रा-जर्रा हो जाते अक्षर..! जब से सॉफ्ट कॉपी में आने लगे अपनी सारी संवेदनाओं को भोथरा कर गए। कब कितनी देर रुक कर लिखा गया… लिखते हुए मन में क्या-क्या खयाल आए… यह कुछ नहीं दिखता। सामने बहुत साफ-सुथरे अक्षर आते हैं… एक जैसे रौ में लिखे गए। बनावटी दुनिया अगर अक्षरों तक पहुंच गई है तब समझा जा सकता है, वह कितनी बनावटी हो गई है।

कंप्यूटर और लैपटॉप के अक्षर हार्ड डिस्क में सहेजे जा सकते हैं, लेकिन जिसके साथ ही ‘हार्ड’ जुड़ा हो, वह कोमल भावनाओं का मोल कैसे जानेगा! अगर आप किसी पुरानी शिक्षा पद्धति में जाएं या उसे समझने की कोशिश करें जो प्राचीन विरासत को सहेजने की बात करती है, तो उन स्थानों पर अभी भी हाथ से लिखे को महत्त्व दिया जाता है। वहां कहा जाता है कि पहले हाथ से लिखो, फिर भले ही उसे कंप्यूटर, लैपटॉप या सेलफोन पर उतार लेना, क्योंकि हाथ से लिखते हुए मन की भावनाएं अधिक मजबूती से आती हैं और वे ठोस रहती हैं। ठोस दोनों अर्थों में। एक तो पुख्ता और दूसरी लंबे समय तक बनी रहने वाली।

सोशल मीडिया के संदेशों को आप एक क्षण में ‘डिलीट आॅल’ कह कर मिटा सकते हैं, लेकिन हाथ से कागज के टुकड़े पर लिखा अक्षर पूरी दुनिया के कबाड़ में भी कहीं न कहीं अपने लिए जगह बचा सकता है। वह टुकड़ा जब किसी के हाथ लगता है तो लिखे अक्षर उस ऊष्मा का संचार भी कर जाते हैं, जो लिखने वाले ने लिखते हुए महसूस की थी। वे कागज पर उतरे अक्षर स्मृतियों का खजाना लेकर आते हैं। किस कागज पर लिखा गया… इतने भर से वो कहां, कैसे, किस सूरत-ए-हाल में लिखा गया होगा… सब यादों की छननी से छन-छन कर आने लगता है, जैसे किसी गहन अंधेरे कमरे में धूप का कतरा-कतरा छन-छन कर आता हो..!

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: अतीत की गलियां
2 दुनिया मेरे आगे: विचार की शक्ति
3 दुनिया मेरे आगे: हिंसा की परतें
ये पढ़ा क्या?
X