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दुनिया मेरे आगेः अंतस को उघाड़ता है एकांत

बुद्ध अपने शिष्यों से कहते हैं कि वे जंगल में विचरण करते हुए गैंडे के सींग की तरह अकेले रहें। यह बात उन्होंने 'खग्गविसान सुत्त' में कही है। वे कहते हैं- ‘प्रत्येक जीव जंतु के प्रति हिंसा का त्याग करते हुए, किसी की भी हानि की कामना न करते हुए, अकेले चलो फिरो, वैसे ही जैसे किसी गैंडे का सींग।’

Author Published on: July 3, 2020 1:49 AM
अंग्रेजी का एक शब्द है- ‘आइसोनोफिलिया’। इसका अर्थ है अकेलेपन, एकांत से गहरा प्रेम।

चैतन्य नागर

एकांत ढूंढ़ने के कई सकारात्मक कारण हैं। एकांत की चाह किसी घायल मन की आह भर नहीं। जो जीवन के कांटों से बिंध कर घायल हो चुका है, एकांत सिर्फ उसके लिए शरण मात्र नहीं। यह उस इंसान की ख्वाहिश भर नहीं, जिसे इस संसार में ‘फेंक दिया गया’ हो और वह इस ‘फेंक दिए जाने’ की स्थिति से भयभीत होकर एकांत ढूंढ़ रहा हो, जैसा कि अस्तित्ववादी कहा करते हैं। महामारी और उसकी वजह से हुई पूर्णबंदी ने इंसान को अकेलेपन के साथ जीने और उसके अर्थ समझने का मौका दिया है। हम जो एकांत में होते हैं, वही वास्तव में होते हैं। एकांत हमारी चेतना की अंतर्वस्तु को पूरी तरह उघाड़ कर रख देता है।

अंग्रेजी का एक शब्द है- ‘आइसोनोफिलिया’। इसका अर्थ है अकेलेपन, एकांत से गहरा प्रेम। पर इस शब्द को गौर से समझें तो इसमें अलगाव की एक परछाई भी दिखती है। एकांत प्रेमी हमेशा ही अलगाव की अभेद्य दीवारों के पीछे छिपाना चाह रहा हो, यह जरूरी नहीं। एकांत की अपनी एक विशेष सुरभि है और जो भीड़ के अशिष्ट प्रपंचों में फंस चुका हो, ऐसा मन कभी इसका सौंदर्य नहीं देख सकता। एकांत और अकेलेपन में थोड़ा फर्क समझना जरूरी है। एकांतजीवी में कोई द्वेष या मनोमालिन्य नहीं होता। वह किसी व्यक्ति और परिस्थिति से तंग आकर एकांत की शरण में नहीं जाता। न ही आततायी नियति के विषैले बाणों से घायल होकर वह एकांत की खोज करता है। अंग्रेजी कवि लार्ड बायरन ऐसे एकांत की बात करते हैं। वे पथविहीन जंगलों के आनंद और समुद्री तटों के सुख की बात करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं कि वे इंसान से कम प्रेम करते हैं; बस प्रकृति से ज्यादा प्रेम करते हैं।

बुद्ध अपने शिष्यों से कहते हैं कि वे जंगल में विचरण करते हुए गैंडे के सींग की तरह अकेले रहें। यह बात उन्होंने ‘खग्गविसान सुत्त’ में कही है। वे कहते हैं- ‘प्रत्येक जीव जंतु के प्रति हिंसा का त्याग करते हुए, किसी की भी हानि की कामना न करते हुए, अकेले चलो फिरो, वैसे ही जैसे किसी गैंडे का सींग।’ हक्सले ‘एकांत के धर्म’ या ‘रिलिजन ऑफ सोलिट्युड’ की बात करते हैं। वे कहते हैं जो मन जितना ही अधिक शक्तिशाली और मौलिक होगा, एकांत के धर्म की तरफ उसका उतना ही अधिक झुकाव होगा; धर्म के क्षेत्र में एकांत अंधविश्वासों, मतों और धर्मांधता के शोर से दूर ले जाने वाला होता है। इसके अलावा एकांत धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में भी नई अंतर्दृष्टियों को जन्म देता है। ज्यां पॉल सार्त्र इस बारे में बड़ी ही खूबसूरत बात कहते हैं। उनका कहना है- ‘ईश्वर एक अनुपस्थिति है। ईश्वर है इंसान का एकांत।’

क्या एकांत लोग इसलिए पसंद करते हैं कि वे किसी को मित्र बनाने में असमर्थ हैं? क्या वे सामाजिक होने की अपनी असमर्थता को छिपाने के लिए एकांत को महिमामंडित करते हैं? वास्तव में एकांत एक दुधारी तलवार की तरह है। अरस्तू के मुताबिक, ‘एकांत में सुख पाने वाला या तो पशु होगा या कोई देवता।’ अल्बेयर कैमू इस संबंध में कहते हैं- ‘अपने साथ समय बिताने से घबराना या डरना नहीं चाहिए। चाहे समय मिले या न मिले, कोशिश कीजिए और कुछ समय ‘चुरा’ लीजिए और इस समय को सिर्फ खुद के लिए सहेज कर रखिए। निजता और एकांत चुनिए। यह आपको असामाजिक नहीं बनाता और न ही आपको दुनिया से अलग-थलग कर देता है। पर यह तो जरूरी है कि आप सांस ले सकें, आप सिर्फ आप ‘हो’ सकें।’

लोग क्या कहेंगे, इसका डर भी हमें अक्सर एकांत में रहने से रोकता है। यह बड़ी अजीब बात है, क्योंकि जब आप वास्तव में अपने साथ या अकेले होते हैं, तभी इस दुनिया और कुदरत के साथ अपने गहरे संबंध का अहसास होता है। इस संसार को और अधिक गहराई, और अधिक समानुभूति के साथ प्रेम करके ही हम अपने दुखदायी अकेलेपन से बाहर हो सकते हैं। विडंबना यह है कि संबंधित होने इस अनुभव के लिए हमें एकांत की बहुत अधिक आवश्यकता पड़ती है। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम एकांत का मखौल उड़ाते हैं, उसे दार्शनिक की सनक और कवि का पागलपन कह सकते हैं। एकांत का भय हमारी चेतना में बड़ी गहराई में पैठा हुआ है। गेब्रियल मार्खेज अपनी किताब ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलिट्युड’ में कहते हैं- ‘वह वास्तव में मृत्यु से होकर गुजर चुका था। पर वह वापस लौट आया क्योंकि उसका एकांत असहनीय था।’

एकांत की जो छवि हमने अपने मन में बनाई है, वह बड़ी ही भयानक है। वास्तव में एकांत ऐसा नहीं। दिनकर ने अंग्रेजी के महान लेखक डीएच लॉरेंस की एक कविता का अनुवाद किया है जो एकांत के बारे में ही है- ‘अकेलापन तो जीवन का/ चरम आनंद है जो है नि:संग/ सोचो तो, वही स्वच्छंद है/ अकेला होने पर जगते हैं विचार/ ऊपर आती है उठ कर/ अंधकार से नीली झंकार/ जो है अकेला/ करता है अपना छोटा-मोटा काम/ या लेता हुआ आराम/ झांक कर देखता है आगे की राह को पहुंच से बाहर की दुनिया अथाह को/ तत्त्वों के केंद्र-बिंदु से होकर एकतान/ बिना किसी बाधा के करता है ध्यान/ विषम के बीच छिपे सम का/ अपने उद्गम का।’

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