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दुनिया मेरे आगे: पैरोडी की कला

फिराक साहब की या बेगम अख्तर की नकल करके कक्षा में या महफिल में शराब और सिगरेट पीने मात्र से कोई फिराक या बेगम अख्तर नहीं बन सकता। उसके लिए वह हुनर होना जरूरी है जो फिराक और बेगम अख्तर की विशेषता थी और इसी वजह से लोग उनके ऐबों को भी खूबी की तरह स्वीकार करते थे।

पैरोडी लिखना एक कला है। इसमें सभी माहिर नहीं होते हैं।

नकल करने को आमतौर पर हमारे यहां नकारात्मक नजरिए से ही देखा जाता है। लेकिन इसी विधा में देखें तो पैरोडी करने को लोग जिज्ञासा-भाव से देखते हैं। दरअसल, यह नकल करने की कला का ही विकसित रूप है। पैरोडी उस रचना की जाती है जो लोकप्रिय तो हो ही, गुणवत्ता यानी स्तर के मान से भी अच्छी हो। हम सबको याद होगा कि मशहूर और लोकप्रिय लोगों की नकल करना कई लोगों का शगल रहा है, फिर वे नेता हों या अभिनेता या फिर खिलाड़ी। उनके जैसे कपड़े पहनना, बालों और दाढ़ी को संवारना और यहां तक कि उन्हीं की तरह उसी शैली में खांसना और सिगरेट पीना भी फैशन बनता गया।

इसी तरह अच्छी रचना की नकल में लिखना भी वही प्रक्रिया अपनाना है और उसी प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति है। पैरोडी स्तरीय भी होती है और खराब भी। इस शैली में लेखन अंग्रेजी साहित्य में भी होता रहा है। ‘क्लासिकल एज’ के कवि ड्राइडन ने अपनी एक रचना ‘मेकप्लोक्नो’ में शेडवेला नामक ऐसे कवि का उल्लेख किया हैं जो सिर्फ पैरोडी लिखने की कला में ही पारंगत था और उनके लिहाज से निकृष्टतम कवियों में श्रेष्ठ था। यानी स्तर तो अच्छे का भी होता है और बुरे का भी। महत्त्वपूर्ण यह है कि वह अपने दायरे और समूह में श्रेष्ठ हो। ड्रायडन ने उसकी आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक तारीफ में लिखा है कि वह भूल कर और गलती से भी मूर्खता छोड़ कर बुद्धिमत्ता की ओर रुख नहीं करता।

हिंदी और उर्दू में भी पैरोडी लेखन होता रहा है। दरअसल, पैरोडी में भी अपने नियम कायदे, अपना अनुशासन और अपना विधान होता है। अच्छी पैरोडी वही मानी जाती है जिसमें मूल पंक्ति या शेर में न्यूनतम परिवर्तन किया जाए। कहा जाता है कि केवल एक शब्द बदल कर ही अगर बात कही जाए तो वह श्रेष्ठ पैरोडी होती है।

मसलन, भोपाल के मशहूर शायर शेरी भोपाली का एक शेर है- ‘सौ बार मुस्कुराऊं गर मेरा बस चले।’ इसमें केवल एक शब्द निकल कर विख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी ने लिखा- ‘सौ बार मुस्कुराऊं गर मेरी बस चले।’ उन दिनों मध्य भारत में रोडवेज की जो बसें चलती थीं, वे या तो स्टार्ट ही नहीं हो पाती थीं और अगर स्टार्ट हो भी जाती थीं तो मुश्किल से ही चल पाती थीं। इसी स्थिति के मद्देनजर शरद जोशी ने मूल शेर में केवल मात्रा में तब्दीली करके प्रभावशाली छाप छोड़ी और उनका यह परिवर्तन पैरोडी का मानक माना जाने लगा।

मैंने कुछ और भी उदाहरण ढूंढ़े। उनमें से एक यह है। लखनऊ के मशहूर शायर थे कृष्णबिहारी नूर लखनवी। उनका एक शेर है- ‘जमीर कांप तो जाता है आप कुछ भी कहें, वो हो गुनाह के पहले कि हो गुनाह के बाद।’ इसकी भी पैरोडी की गई और कहा गया- ‘गुनाह कांप तो जाता है आप कुछ भी कहें, वो निकाह के पहले कि हो निकाह के बाद।’ पर इस पैरोडी में वह बात नहीं आ पाई। ऐसा लगता है कि पैरोडीकार ने एक उम्दा और स्तरीय शेर का गला घोंट दिया।

जाहिर है, सभी पैरोडी कारगर और सफल नहीं होती। कुछ ता बड़े रचनाकारों के साथ अपना भी नाम जोड़ देने की कोशिश में यह हरकत करते हैं। दूसरों की आभा की रोशनी में कोई कैसे मशहूर हो सकता है, जब उसमें वांछित काबलियत नहीं है। पर कुछ लोग हैं जिन्हें ‘बड़े लोगों’ को सोहबत में रहने का भी शौक होता है और उनकी नकल करने का भी। लोग उनकी बात पर क्या कहते और सोचते हैं, वे इसकी फिक्र नहीं करते। न तो कवि की सोहबत में रहने वाला व्यक्ति कवि के साथ रहने से कवि हो पाता है और न ही किसी खिलाड़ी के आसपास मंडराते रहने से कोई खिलाड़ी बनता है।

फिराक साहब की या बेगम अख्तर की नकल करके कक्षा में या महफिल में शराब और सिगरेट पीने मात्र से कोई फिराक या बेगम अख्तर नहीं बन सकता। उसके लिए वह हुनर होना जरूरी है जो फिराक और बेगम अख्तर की विशेषता थी और इसी वजह से लोग उनके ऐबों को भी खूबी की तरह स्वीकार करते थे।

नाक के सुर में गाना अगर मुकेश की खूबी थी तो गाते हुए आवाज का टूटना तलत महमूद की। पर लोगों ने दोनों को हाथों हाथ लिया। पर कोई और ऐसा करे तो उसे पहली ही नजर में अस्वीकार कर दिया जाए। मशहूर और स्थापित हो जाने के बाद ही हम सम्मान और तारीफ पाते हैं। मशहूर लोगों की नकल भर करने से हमको वह तारीफ और आदर कैसे मिल सकता है? अगर पैरोडी लिखी भी जाए तो यह किसी को अपमानित करने या किसी का मजाक उड़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। हास्य की बुनियाद ही सबके साथ और सबको साथ लेकर हंसने में है, किसी की खिल्ली उड़ाने या किसी के ऊपर कटाक्ष करने या हंसने में नहीं। अच्छी और सफल पैरोडी वही है कि जब जिस रचनाकार की पैरोडी की गई है, वह भी उसे सराहे और उस पर दाद देने को मजबूर हो।

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