world environment day 2018 environment of memories - दुनिया मेरे आगे: स्मृतियों का पर्यावरण - Jansatta
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दुनिया मेरे आगे: स्मृतियों का पर्यावरण

आज पर्यावरण को लेकर संपूर्ण विश्व चिंतित है। यह चिंता हमारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन के पर्यावरण को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी भी है।

Author June 5, 2018 3:15 AM
हमारे बचपन का पर्यावरण आज की तरह पीलिया का शिकार नहीं था।

ओम नागर

आज पर्यावरण को लेकर संपूर्ण विश्व चिंतित है। यह चिंता हमारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन के पर्यावरण को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी भी है। लेकिन कभी जब उजाड़ हो रही धरती और दुनिया को देखते हैं तो हमें महसूस होता है कि हमारी स्मृतियों का पर्यावरण तो कभी इतना दमघोंटू नहीं था। आज जो भी शख्स अधेड़ उम्र की दहलीज को पार कर खड़ा है, उसकी स्मृति में हर एक गांव-शहर से थोड़ी दूरी पर घने वन होने के निशान मिलते हैं। हमारी वे स्मृतियां कितनी हरी-भरी थीं। हमसे दो-तीन दशक उम्र में बड़े लोगों का पर्यावरण आज के जितना दूषित नहीं था। हम सबकी स्मृतियों के इस उड़ान भरते पर्यावरण के पंख किसने उखाड़े हैं, हम सब जानते हैं। बस अपना चेहरा आईने में नहीं देखते हैं।

कभी वे भी दिन रहे कि दूर से जरा-सा दिखने वाले गांव की मौजूदगी का पता ही घने होते जाते पेड़ों के झुंडों से लगता था और शहर का सपाट वीरानी से। सब जगह सब था। स्वच्छ हवा थी सांस लेने के लिए। छांव थी दो घड़ी सुस्ताने के लिए। जल भी था, जहां जितना होना था- धरती में और धरती की सतह पर। ये सब था तो जिंदगी तमाम जरूरी-गैरजरूरी साधनों के अभावों के बावजूद खुशनुमा थी। यानी वे गुजरे हुए दिन कठिन थे और जीवन सरल। अब प्रकृति का दोहन कर दिन तो सरल और श्रमविहीन बना लिए गए, लेकिन जीवन बहुत कठिन हो चला है। आज हालात ये हैं कि भारत सहित दुनिया के कई देशों के जंगलों में लगी आग पर काबू पाने का कोई उपाय तरक्की की राह पर हांपते आदमी को नहीं सूझ रहा।

अभी मैंने जीवन के सैंतीस बसंत ही पार किए हैं, लेकिन मेरी आंखों के सामने शुरू हुई मेरी अपनी ही दुनिया की स्मृतियों की हरी टहनियां लंबे समय तक स्थायी पतझड़ से दूर रहीं। बचपन के दिनों में धरती का जल बहुत उथला था। इतना कि भरे बैसाख में कुएं की सीढ़ियां उतर कर कई बार हलक तर करते रहे। गांव के आसपास इतने पेड़ तो थे ही कि गरमी इनकी शीतल छांव में आराम से कट जाती थी। लेकिन अब है कि छांव ढूंढ़े से नहीं मिलती। ऐसे में वक्त हमें हमारी शुद्ध पर्यावरणीय स्मृतियों में न केवल ले जाता है, बल्कि हमारे भीतर मसानी ज्ञान भी जगाता है। मन ही मन सोचते हैं- ‘खूब पेड़ बचे होते और खूब पेड़ लगाए होते।’ इस दो पांव वाले मनुष्य नामक जीव का यही संकट है कि वह सोचता तो है, लेकिन सोचे हुए को संपूर्ण करने के प्रति गंभीर होना तो दूर, उस दिशा में दो कदम आगे बढ़ाता हुआ भी नहीं दिखता।

हमारे बचपन का पर्यावरण आज की तरह पीलिया का शिकार नहीं था। न प्रकृति दमे की मरीज हुई थी। आसपास पेड़ खूब थे। सांझ को गांव का आकाश नीड़ में लौटते पंछियों से भरा रहता था। पहली बारिश में पेड़ जब अपना पहला स्नान करते तो लगता कि नीले नभ और काली-भूरी धरती के बीच में प्रकृति ने हरी कच्च कनातें तान दी हों। गरमी की तपती दोपहरें केरियों से नेकर की जेबें भरते गुजर जातीं। आषाढ़ के बदरा पके हुए जामुनों की बदौलत जीभ का रंग भी जामुनी कर देते। इस बदरंग होती दुनिया का कोई भी रंग हो, वह पेड़-पौधों से ही बना-संवरा है। आज का वक्त तो रंगों के जबर्दस्त घालमेल का है। जहां कुछ ही रंगों की माया-काया दिख रही है।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की चौखट पर संभलते हुए अपना पहला-पहला कदम रखने वाले नौनिहालों की स्मृतियों का पर्यावरण कितना सूना, बेरंग और विरल होगा, इसकी तो कल्पना करना अब इतना मुश्किल भी नहीं। इस दौर में धरती पर सब ओर चल रहे विकास के पीले पंजों ने हमारे पर्यावरण का गला दबाने और सांसें उखाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। धरती पर चारों ओर कंक्रीट के वन हैं। नीले आकाश के मुंह पर धुएं की कालिख पुती है। ओजोन का मुंह सुरसा के मुंह की तरह निरंतर बढ़ रहा है। सरकारों के उगाए सारे जंगल सिर्फ विभागीय फाइलों में हरित हैं। यह समय रोहिणी नक्षत्र की धूप की तरह है, जिसकी आग में जीवन परी के सुनहरे-पंखों से सपने झुलस रहे हैं।

वे दिन अब अधिक दूर भी नहीं, जब आगामी पीढ़ियों के पास स्मृतियां तो होंगी, लेकिन उन स्मृतियों से हमारे पर्यावरण का हरा रंग गायब होगा। मुझे अपनी कविता की ये पंक्तियां याद हैं- ‘जहां नहीं पानी की/ एक बूंद/ वहां एक तालाब था कभी/ जहां नहीं दिख रही/ मुट्ठी भर रेत/ वहां बहती थी एक नदी/ जहां नहीं बचा है/ एक भी पेड़/ वहां जंगल था घना/ जहां खड़ी दिख रही है/ बहुमंजिला इमारत/ वहां दबा पड़ा है एक तालाब/ नदी की रेत/ जंगल वाला पेड़।’

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