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सुविधा की संस्कृति

मंगलसूत्र में सात मोती होते हैं और इसको किसी स्त्री द्वारा निकालने का बिल्कुल वही अर्थ है, जो ईसाई धर्म में विवाहित स्त्री या पुरुष के अपने हाथ में पहनी अंगुली से अंगूठी निकालने से लिया जाता है।

Author नई दिल्ली | Published on: April 14, 2016 2:39 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

हमें निजामुद्दीन से भुसावल जाने वाली गोंडवाना एक्सप्रेस में बैठे करीब दो-तीन घंटे हो चुके थे। हमारी बातचीत विवाह के बाद स्त्री के पास कुछ चिह्नों के रूप में छूट गई सांस्कृतिक वस्तुओं पर चल रही थी। स्त्री की मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और पैरों में बिछिया उसके विवाहित होने के प्रमाण माने जाते हैं। पुरुष ऐसे किसी भी ‘चिह्न-शास्त्र’ से मुक्त है। वह जब तक खुद न बताए, कोई नहीं जान सकता वह शादीशुदा है। विजिता इन प्रतीकों को छोड़ने के पक्ष में अपनी बात कह रही थी कि तभी बगल से एक अंग्रेजी बोलने वाला युवक हमारी चर्चा में शामिल होने की बात कहता हुआ आया। हम भी बात आगे बढ़ाना चाहते थे और उनके आने के बाद हम उन्हें सुनना चाहते थे। अमेरिका की माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में काम करने वाले उस सज्जन ने सबसे पहले अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उनकी आपत्ति हमारे अज्ञान को लेकर थी। हम यह भी नहीं जानते थे कि मंगलसूत्र में सात मोती होते हैं और इसको किसी स्त्री द्वारा निकालने का बिल्कुल वही अर्थ है, जो ईसाई धर्म में विवाहित स्त्री या पुरुष के अपने हाथ में पहनी अंगुली से अंगूठी निकालने से लिया जाता है। हम लोग अपनी स्मृतियों में पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले ऐसे किसी मंगलसूत्र को तलाश रहे थे, तभी उनके द्वारा एक और सवाल हमारी तरफ दाग दिया गया कि हम लोग अपनी संस्कृति को नहीं बचाएंगे तो उसे कौन बचाएगा!

वे इस उपक्रम में सिलसिलेवार तरीके से विवाह संस्कार पर अपनी राय देने लगे। उनके मुताबिक लकड़ी का वह पीढ़ा, जिसमें कोई भी कील नहीं लगती, दो आत्माओं का मिलन स्थल है। अग्नि कुछ और नहीं, दोनों आत्माओं के ध्यान को भटकाने के बचाने वाली युक्ति के रूप में इस्तेमाल की जाती है। मंडप एक खास आकृति में ही बनाया जाता है, जिसका अर्थ स्त्री-पुरुष की देह की आकृति से लिया जाता है। वे सब हमें इसलिए भी बता पा रहे थे, क्योंकि उन्होने देविदत्त पटनायक की हाल-फिलहाल कोई किताब नहीं पढ़ी थी, बल्कि उन पौराणिक विद्वानों से यह ज्ञान अर्जित किया है। और उनका मानना था कि चूंकि वे एक ‘ब्राह्मण’ परिवार से संबद्ध हैं, इसलिए इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध थी! उन्होंने अपनी संस्कृति बचाने ले लिए क्या किया, यह किसी त्रासद कहानी से कम नहीं है। वे बताना तो नहीं चाह रहे थे, पर शायद हम लोगों को संस्कृति के रक्षक के रूप में देखने का लोभ पाकर वह रह न पाए होंगे। वे जिस परिवार से थे, उसमें किसी पंजाबी युवती से विवाह करके अपने संस्कारों को कैसे बचा पाते? उनके होने वाले बच्चे किस धर्म में दीक्षित होते? क्या वे उन्हें अपनी पारिवारिक विरासत को ठीक-ठाक हस्तांतरित कर पाते? शायद नहीं। इसलिए वे अपने प्रेम को अपनी जाति की शुद्धता और संस्कृति के नाम पर वहीं छोड़ देते हैं। उससे शादी नहीं करते। पढ़ना-लिखना उन्हें बेहतर इंसान नहीं बना पाया। वे बस एक भगोड़े प्रेमी बन कर रह गए।

बहरहाल, अपने हिस्से की बातें कह कर अपनी सीट पर चले गए थे और शायद झांसी के बाद कहीं उतर गए होंगे। मेरा दिमाग घूमने लगा था। अपनी किताब में विलियम ली पार्कर बताते हैं कि औपनिवेशिक सत्ता के लिए रेलगाड़ियां किस तरह शैक्षिक संस्था के समान थीं। वे ‘नागरिक’ गढ़ने के लिए उनका एक औजार थीं। आज इस तरह यह रेल हमें एक संस्कृति में ढालने के लिए उपयोग में लाई जा रही थी। यह उन अर्थों से कहीं आगे के अर्थ होंगे। लेकिन अपनी पूरी बातचीत के दरमियान वे इतना पढ़-लिख कर भी नहीं बता पाए कि संस्कृति से वे क्या समझते हैं!

वे जो बता पाए, उसमें स्त्री को कहां तक स्वतंत्रता दी जाए, उसका निर्णय करने वाले की भूमिका में पुरुष आज इक्कीसवीं सदी में भी उपस्थित है। एक मित्र मीनाक्षी अगर इस बात पर अपना विरोध दर्ज न करातीं, तब वे अपनी बात से पीछे नहीं हटते। उन्होंने जब उस लड़की से प्यार किया होगा, तब क्यों यह सब नहीं सोचा। आज वे हमारे सामने उसे छोड़ने की बात को लेकर किसी पछतावे से भरा महसूस नहीं कर रहे। उनके लिए शायद यही उनकी संस्कृति की रक्षा थी, जिसमें कोई मिलावट नहीं थी। दूसरी तरफ हम थे, और अंतरजातीय विवाह करने वाले तमाम लोग थे, जो मिलावटी थे। हम पढ़े-लिखे थे, पर हम शायद अपनी संस्कृति पर बात कर रहे थे, उस पर सवाल उठा रहे थे, इसीलिए वे हमसे बात करना चाह रहे थे। वे हमें अहसास करवाना चाहते थे कि हम पढ़-लिख कर अपनी संस्कृति से कट गए हैं। लेकिन जिस पढ़ाई ने उन्हें प्यार करना नहीं सिखाया, हम उस संस्कृति को बचा कर क्या करेंगे? हम ऐसे ही ठीक हैं!

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