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दुनिया मेरे आगे: इंसाफ की मंजिल

विडंबना यह है कि महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाओं का क्रम लगातार बढ़ ही रहा है। मुझे इस पर हैरानी इसलिए होती है कि साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के प्रयास भी कई स्तरों पर चल रहे हैं।

महिलाओं पर अत्याचार।

भावना मासीवाल
बीस मार्च को शायद आने वाले दिनों में भारत की महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक दिन माना जाएगा। दरअसल, इस दिन का इंतजार महिलाएं पिछले सात सालों से करती आ रही थीं। इस दौरान न जाने कितनी लड़कियां यौन हिंसा में जिंदा जला दी गई तो कितनी दूसरे तरीकों से मार डाली गईं। न्याय में हो रही देरी से अपराधियों के हौसले बुलंद होते गए। मगर निर्भया के दोषियों को आखिर फांसी दे दी गई। कानूनी प्रक्रिया के हर स्तर को पूरा करने के बाद उन्हें उनके जघन्य अपराध की सजा मिली।

अब उम्मीद की जानी चाहिए कि बलात्कार के अपराधियों की यह सजा उन अपराधियों के हौसलों को कम करेगी, जिनकी नजर में महिलाएं इंसान नहीं होती हैं। इस फैसले का असर इस रूप में भी सामने आएगा कि इस अपराध की पीड़ित जो महिलाएं निराशा के भंवर में अपने दिन गुजारती हैं, उनके भीतर न्याय की उम्मीद फिर से जगेगी। ऐसे में निर्भया के दोषियों के फांसी के दिन यानी बीस मार्च को कुछ महिलाओं की ओर से ‘बलात्कार रोकथाम दिवस’ का दर्जा देने की मांग सामने आई है तो उसका आधार है। प्रतीक रूप में अगर यह दिवस स्थापित होता है तो इसके जरिए बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और उसके पीछे के सामाजिक कारणों को समझने के साथ ही न्यायिक प्रक्रिया को दुरुस्त करने की दिशा में ठोस कदम आगे की ओर बढ़ सकेंगे।

मैंने ऐसे मामलों के अध्ययन के दौरान अक्सर पाया है कि बलात्कार की घटनाओं के बाद समाज और कई बार खुद अपना परिवार भी पीड़िता को अकेला छोड़ देता है। ऐसा व्यवहार कई बार पीड़ित महिलाओं को आत्महत्या तक के रास्ते पर धकेल देता है। ऐसे में जरूरी है कि इस मनोस्थिति से गुजर रही महिलाओं के साथ संवेदनशील रवैया अपनाया जाए और उन्हें फिर जिंदगी से प्यार करना सिखाया जाए। साथ ही महिलाओं की सुरक्षा और उनके सुरक्षित जीने के अधिकार को भी संरक्षित किया जाए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बलात्कार की घटनाओं के मामले में भारत विश्व के शीर्ष पांच देशों में स्थान रखता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2018 में ‘महिलाओं के खिलाफ अपराध’ की श्रेणी में 3,78,277 मामले दर्ज किए गए जो 2017 के 3,59,849 दर्ज अपराध के मामलों से काफी अधिक थे।

विडंबना यह है कि महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाओं का क्रम लगातार बढ़ ही रहा है। मुझे इस पर हैरानी इसलिए होती है कि साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के प्रयास भी कई स्तरों पर चल रहे हैं। फिर भी महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मानसिकता में कमी नहीं आ रही है। सवाल है कि हमारी कोशिशों में नुक्स आखिर कहां है?

मुझे लगता है कि इसका सबसे प्रमुख कारण हमारी कमजोर न्यायिक प्रक्रिया और न्याय में देरी है। कानूनी दांवपेच के जरिए अपराधी अपने मानवाधिकार, परिवार आदि की दुहाई देकर अपने पक्ष को मजबूत करके अपराध से मुक्त होने का कानूनी खेल-खेलते हैं और कभी-कभी सफल भी हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में पीड़ित पक्ष फिर से पीड़ित बना दिया जाता है और यह सब होता है हमारी ढुलमुल न्यायिक प्रणाली की वजह से।

यौन हिंसा और बलात्कार की वीभत्सता इतनी अधिक और क्रूर होती है कि एक संवेदनशील मनुष्य अपने मनुष्य होने पर शर्मशार हो जाए। ऐसे में इन अपराधियों द्वारा मानवाधिकार की बात करना मानवाधिकार का उल्लंघन करने जैसा लगने लगता है। ‘स्टेटिक्स आन रेप इन इंडिया एंड सम वेल-नोन केसेज’ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामलों में 2017 के अंत तक न्यायिक प्रक्रिया में 1,28,000 मुकदमे अब तक लंबित थे।

ऐसे में सात सालों से लंबित निर्भया केस के दोषियों को फांसी की सजा देने के निर्णय के बाद तीन बार उस निर्णय को रुकवाना और अपराधियों का अपने मानवाधिकार का हवाला देना, सच को जानने के बाद भी उनके परिवार की महिलाओं का उनका साथ देना और उनकी ढाल बनना अपराध की मानसिकता को बढ़ावा देता है।

अपराध को बढ़ाने में जहां न्यायिक प्रक्रिया का अधिक लचीला होना कारण है तो वहीं बलात्कार के अपराधियों के प्रति समाज और परिवार का संयोगात्मक और सहयोगात्मक व्यवहार भी अपराध की मनोवृत्ति को बढ़ाने में सहयोग करता है। सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को घर में बंद करके, समय और समाज का डर दिखा कर, उनके कपड़ों पर आरोप लगा कर उन्हें ही डराने और उन्हें असुरक्षा का कारण बताने का प्रयास परिवार और समाज करता रहा है। लेकिन समाज कभी अपने भीतर के वहशीपन को नहीं पहचानता, बेटों या लड़कों को सभ्य और इंसान बनाने की कोशिश नहीं करता, जो ऐसे अपराधों की जड़ है।

बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराध करने के बाद उसे छिपाने और बचाने की कोशिश में अनगिनत लड़कियों के साथ होते बलात्कार का मूकदर्शक बन कर ऐसे अपराध को और बढ़ावा देता है। ऐसे में जरूरी है कि परिवार, समाज, न्यायपालिका एक साथ मिल कर ऐसे अपराधों को रोकने के लिए सहयोगात्मक कदम बढ़ाए, ताकि, महिलाओं के लिए एक संवेदनशील, सुरक्षित और न्यायप्रिय समाज का निर्माण किया जा सके।

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