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‘दुनिया मेरे आगे में’ में अनीता मिश्रा का लेख : वर्चस्व की हीनता

कुछ समय पहले पेप्सिको की अध्यक्ष इंदिरा नूयी ने कहा था- ‘हमारे साथ भी पुरुषों के समांतर बर्ताव किया जाए...! हमें हंसी में भी ‘स्वीटी’ या ‘हनी’ जैसे संबोधनों से न बुलाया जाए।’

Author नई दिल्ली | June 8, 2016 12:05 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

उस दिन रात के करीब दस बज मेरी एक मित्र का फोन आया। उसने कहा कि तुम्हारे घर के आसपास हूं, क्या इस वक्त मैं तुम्हारे घर चाय पीने आऊं! कानपुर जैसी जगह में मैं वक्त देख कर थोड़ी हैरान थी। उसने बताया कि पास में ही एक घटना हो गई थी, जिसकी रिपोर्ट के लिए वह दफ्तर की ओर से इस तरफ आई थी। हालांकि ऐसी घटनाओं के मामले में आमतौर पर पुरुषों को ही भेजा जाता है। साधारण से जरा भी मुश्किल काम होने पर सीनियर या अफसरों की ओर से हमसे अक्सर कह दिया जाता है कि ‘बेबी, तुमसे नहीं होगा।’ इसलिए मैंने यह चुनौती स्वीकार की। हालांकि दफ्तर में मैं वह सारे काम कर चुकी हूं और ज्यादा बेहतर कर सकती हूं, जिन्हें पुरुषों के हिस्से माना जाता है। लेकिन हालत यह है कि हर अगली बार मुझे खुद को साबित करना पड़ता है। जबकि पुरुष साथियों के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है।

यह कोई नया संदर्भ नहीं है। लेकिन आज का भी सच है। कुछ समय पहले पेप्सिको की अध्यक्ष इंदिरा नूयी ने कहा था- ‘हमारे साथ भी पुरुषों के समांतर बर्ताव किया जाए…! हमें हंसी में भी ‘स्वीटी’ या ‘हनी’ जैसे संबोधनों से न बुलाया जाए।’ यानी दुनिया की ताकतवर महिलाओं में शुमार इंदिरा नूयी जैसी शख्सियत भी जब भाषा में बराबरी के बर्ताव का सवाल उठाती हैं तो साफ है कि जड़ें किसी खास पिछड़े देश या इलाके तक सिमटी हुई नहीं हैं। सच यह है कि देश चाहे कोई भी हो, कामकाजी स्त्रियों के लिए कामयाबी का रास्ता कभी आसान नहीं रहा है।

दरअसल, अपने समकक्ष महिला कर्मचारी को ऐसे शब्दों के संबोधित करना उसी सामाजिक कंडीशनिंग का हिस्सा है, जिसमें कामों का बंटवारा कर दिया गया और उसी के हिसाब से ‘क्षमता’ का आकलन किया जाने लगा। यह मान लिया गया कि खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, घर की साफ सफाई वगैरह सारे काम स्त्रियों के हैं और घर से बाहर बड़ी कही जाने वाली जिम्मेदारियों वाले काम या कंपनी आदि चलाना स्त्रियां बहुत अच्छी तरह नहीं कर सकती हैं। लेकिन जब महिलाओं ने खुद को उन सब कामों में बेहतर साबित करना शुरू किया, जिन्हें अब तक पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था तो इसे सामाजिक रूप से स्वीकार कर पाना मुश्किल होने लगा। यह हताशा और कुंठा पुरुषों की भाषा में घुली और इसके बाद स्त्रियों को कमतरी का अहसास दिलाने के लिए ऐसे शब्द और मजाक गढ़े जाने लगे।

मैं खुद भी जिस तरह के व्यवसाय में दखल रखती हूं, उसमें आमतौर पर पुरुषों का वर्चस्व रहा है। बहुत दुख होता है जब महिलाओं के व्यक्तित्व का आकलन उनके काम और उनकी क्षमता के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि उनके बारे में कई तरह की अफवाहें फैला कर उन्हें कमतर साबित करने की कोशिश की जाती है। सड़क पर कोई लड़की गाड़ी चला रही हो तो उन्हें देख कर भी ऐसे कुंठाएं फूट पड़ती हैं कि ‘लड़की चला रही है, बगल से खुद ही बच कर निकलो।’ उनका ऐसे मजाक बनाया जाता है, मानो स्त्रियों को यातायात के नियमों की समझ कम होती है। ऐसी टिप्पणियों में यथार्थ के बजाय कुछ छिन जाने की हताशा ज्यादा होती है।

जाहिर है, पुरुषों के वर्चस्व वाली जगहों पर जब स्त्रियों के कदम पड़ते हैं तो उन्हें लोगों की हैरानी और वर्चस्व की कुंठा से उपजी तमाम बातों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि अगर दफ्तर में महिला बॉस है तो बहुत सारे पुरुष कर्मचारियों को सिर्फ उनके महिला होने की वजह से समस्या आने लगती है। पुरुषों की शासक मानसिकता यह स्वीकार नहीं कर पाती है कि एक उससे ज्यादा सक्षम स्त्री के मातहत उसे काम करना पड़ेगा। कई बार सहकर्मी होने के बावजूद वे अपनी हीनताबोध से उपजी कुंठाओं को वे कई तरह की अफवाहें फैला कर निकालते हैं। कभी उस महिला के काम करने के तरीके को लेकर या कभी-कभी पहनावे और निजी जीवन को लेकर। ऐसे मामले आम हैं जिनमें अगर कोई स्त्री अपनी काबिलियत के बूते कोई ऊंची जगह हासिल करती है तो अपनी अयोग्यता की वजह से पीछे रह गए पुरुष उनके बारे में निम्नतर बातें फैला कर अपनी कुंठाओं को शांत करते हैं।

दरअसल, कमतर आंके जाने के इस अहसास का सामना काम करने वाली हर स्त्री ने कभी न कभी किया होता है। लेकिन अगर एक सशक्त स्थिति में पहुंच गई स्त्री ऐसे हालात का सामना करती है, ऐसे बर्ताव का दंश महसूस करती है तो वाकई अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है। लेकिन यह भी सच है कि अब वर्चस्व के गुमान में रहने वाले पुरुषों की हताश प्रतिक्रियाएं और कुंठाएं सक्षम स्त्रियों का रास्ता रोक पाने में नाकाम साबित हो रही हैं। यही आज की स्त्री की ताकत है।

 

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