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दुनिया मेरे आगेः संज्ञान सुरभि

संज्ञान शब्द की ताकत का मुझे अंदाजा नहीं था। जब हुआ तो हैरान रह गया। यानी एक बड़ी दुर्घटना, जो सहज ही भुला दी जाती, किसी अदालत द्वारा संज्ञान लेते ही जीवंत हो उठी।

Author August 14, 2018 4:32 AM
प्रतीकात्मक चित्र

नरेंद्र नागदेव

संज्ञान शब्द की ताकत का मुझे अंदाजा नहीं था। जब हुआ तो हैरान रह गया। यानी एक बड़ी दुर्घटना, जो सहज ही भुला दी जाती, किसी अदालत द्वारा संज्ञान लेते ही जीवंत हो उठी। कानून के रखवाले तुरंत हरकत में आ गए, उसे सही अंजाम तक पहुंचाने के लिए। वह अदृश्य से अचानक मूर्तिमान हो उठी। फिर समझ में आया कि अदालत ही क्यों, किसी भी सक्षम ‘अथॉरिटी’ के संज्ञान में आ जाना पर्याप्त है। वह राजनेता, अधिकारी कुछ भी हो सकता है। ताकतवर हो बस। जब तक संज्ञान में नहीं आए, तब तक सब जायज हैं- अपराध, पाप, दुर्घटना, सब कुछ। इसलिए कि तब तक उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता।

सुना है, ग्रेटर नोएडा की बहुमंजिला इमारतें धड़ल्ले से सरकारी जमीन पर बन रहीं थीं। वे कोई एक दिन में तो खड़ी हुई नहीं होंगी। विशालकाय थीं, सैकड़ों मजदूर लगे रहे होंगे, वह भी कई महीनों तक। कानून के वे तमाम संरक्षक, जिन पर जिम्मा रहा होगा ऐसी गैरकानूनी गतिविधियों को नियंत्रित करने का, वे रोज उन्हें बनते हुए देखते रहे होंगे। लेकिन वही बात है कि उनका संज्ञान नहीं लिया गया होगा तो वे उन्हें नजर आतीं कैसे? ठीक उसी तरह, जैसे हर शहर की गलियों में सैकड़ों गैरकानूनी इमारतें धड़ल्ले से बनती रहती हैं, क्योंकि उनका ‘संज्ञान’ नहीं लिया जाता। ‘संज्ञान’ नहीं लिए जाने में ही सब कुछ लाभप्रद होता है और सुविधाजनक भी। तंत्र में ही खोट हो तो कोई क्या करे? सारा काम निर्विघ्न संपन्न हो जाता है। बल्कि ऐसी पक्की गोटियां बैठा दी जाती हैं कि आगे भी कोई आंच नहीं आए। ग्रेटर नोएडा में भी किसी की क्या मजाल थी? वह तो इत्तिफाक से दो इमारतें गिर गर्इं, दस-बीस जिंदगियां कुर्बान हो गर्इं, तब कहीं जाकर उनका ‘संज्ञान’ लिया गया। उसके बाद उनके आसपास की और दस-बीस इमारतें जो तब तक ‘अदृश्य’ थीं, अनायास सबको नजर आने लगीं।

घटनाओं का घट जाना एक बात है, लेकिन उन पर कार्रवाई उनका ‘संज्ञान’ लिए जाने के बाद ही संभव है। एक युवा रिपोर्टर ने थाने में जाकर अधिकारी से शिकायत की कि घटना आपके ठीक सामने इसी सड़क पर हुई थी और वह भी दिन में और आप हैं कि पूछ रहे हैं कि कौन-सी घटना! अधिकारी अनुभवी थे। अपनी घनी मूंछों के पीछे से मुस्करा कर उन्होंने कहा कि देखो, घटना हुई, यह माना तभी जाएगा जब उसका ‘संज्ञान’ ले लिया गया हो। फिर रिपोर्टर को परेशान देख कर वे परम ज्ञानी की मुद्रा में आ गए और लगे हाथ उपदेश भी दे दिया कि भगवान कृष्ण तो अंतर्यामी थे! उन्हें क्या पता नहीं था कि कौरवों की सभा में क्या घट रहा है द्रौपदी के साथ? लेकिन ‘एक्शन’ तो उन्होंने भी तभी लिया, जब द्रौपदी ने मदद की गुहार लगा कर घटना उनके ‘संज्ञान’ में दी!

करीब पच्चीस साल पहले कॉरपोरेशन के दफ्तर में मेरी भी कुछ ऐसी ही ज्ञान वृद्धि अनायास ही हो गई थी। बतौर वास्तुशिल्पी एक घर डिजाइन किया था। मालिक कानून कायदे से चलने वाले बेहद सज्जन पुरुष थे। इसलिए जैसा नक्शा पास कराया था, वैसा ही निर्माण भी करवाया। जब उसके प्रमाण-पत्र के लिए नक्शा जमा करवाने गए तो संबद्ध अधिकारी ने उड़ती नजर से उन्हें देखा और रिश्वत या पैसे की बात कही। हमने निवेदन किया कि हमने जो नक्शा पास करवाया था, उसमें कुछ भी फेरबदल नहीं किया और गैरकानूनी काम कुछ भी नहीं। तब उन्होंने गहरी नजरों से ताकते हुए कहा कि क्यों नहीं किया… हमने आपको मना किया था क्या! इस पर शालीन मकान मालिक भी चिढ़ गए और उनसे पूछा कि ठीक है, फिर अब कर लूं क्या? इस पर अधिकारी महोदय ने आगाह किया कि अब कुछ नहीं कर सकते। कारण कि यह मामला अब हमारे ‘संज्ञान’ में आ गया है।

यों एक अच्छी बात यह हुई है इन दिनों कि कोई घटना-दुर्घटना होती है, तो उसके वीडियो तुरंत ही तमाम टीवी चैनलों पर प्रसारित होने लगते हैं। चौबीस घंटों में तो उसका शोरगुल इतना बढ़ जाता है कि संबद्ध महकमा उसका ‘संज्ञान’ लेने को बाध्य हो जाता है। नहीं होता तो कभी-कभार अदालत खुद भी ‘संज्ञान’ ले लेती है। यानी एक घटना जो अन्यथा अनदेखी रह जाती, तुरंत ही अपने मूल स्वरूप में दुनिया भर के सामने खुल जाती है और न्यायिक प्रक्रिया भी कम से कम शुरू तो हो ही जाती है। लेकिन यह भी कौन अच्छी स्थिति है कि घटनाएं खुलेआम घट जाने के बाद उन पर आरंभिक कार्रवाई शुरू करने के लिए भी उसे किसी सशक्त व्यवस्था अथवा अदालत के ‘संज्ञान’ में लाना पड़े! ग्रेटर नोएडा की जो इमारतें गिर गर्इं, वहां कार्रवाई उसी दिन शुरू हो जानी चाहिए थी, जब उस अवैध कार्य की नींव की खुदाई के लिए पहली कुदाल जमीन पर चली थी। लेकिन वह स्वर्णयुग आना फिलहाल सपना ही लगता है। भ्रष्टाचार और अदम्य लालच मनुष्य से जो न करवा ले, वह थोड़ा।

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