कंक्रीट के जंगलों में मुरझाए पौधे

देश में कोई महानगर ऐसा नहीं, जहां हजारों आधे-अधूरे फ्लैट भरी किसी बदनसीब की तरह सूनी आंखों से आसमान की तरफ टिकटिकी लगाए न दिखें।

सांकेतिक फोटो।

देश में कोई महानगर ऐसा नहीं, जहां हजारों आधे-अधूरे फ्लैट भरी किसी बदनसीब की तरह सूनी आंखों से आसमान की तरफ टिकटिकी लगाए न दिखें। बरसों से अकाल झेल रहे धूल-धूसरित खेतों में जीवित कंकाल की तरह भटकते मवेशियों जैसे लगते हैं कंक्रीट के जंगलों के ये मुरझाए पौधे। रियल एस्टेट के गुब्बारे की हवा निकल जाने के बाद शहरों की उपनगरीय कॉलोनियों की पहचान बन चुके इन मकबरों में मध्य और निम्न-मध्य वर्ग के उन लाखों गृहस्थों के सपने दफ्न हैं, जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई निजी घर के सपने पर लुटा दी।

उधर चंद सालों में अरबों रुपयों की रियल एस्टेट कंपनियां खड़ी कर देने वाले तमाम धनकुबेरों में से बहुतों के दो नंबर की गैस से भरे रंगीन गुब्बारे नोटबंदी के तीर से बिंध कर फटे तो उन्हें खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा। कइयों को जेल की हवा भी खानी पड़ गई। दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जनसंख्या के सिर पर छत मुहैया कराने का काम केवल रिहायशी कॉलोनियों में बहुमंजिली इमारतें बनाने वालों तक ही सीमित नहीं था। अनेक महानगरों में स्थानीय निकायों और प्राधिकरणों के प्रयत्न से भी आए दिन नए-नए उपनगर बनाए गए। इन उपनगरों में प्राधिकरणों का काम खेती वाली या खाली पड़ी जमीन का अधिग्रहण करके वहां रिहायशी भूखंड काटने और सड़क, बिजली, पानी की व्यवस्था करने तक सीमित रखा गया।

इसके पीछे शायद एक प्रशंसनीय सोच यह थी कि जो नागरिक बजाय एकरसता के नमूने लगते फ्लैट में रहने के, अपनी पसंद, अपनी सुविधा के अनुसार बनाए रिहायशी मकानों में रहने का सपना देख रहे थे, उन्हें भी निजी मकान बनाने का अवसर मिल सके। लेकिन ‘अपने मन कुछ और है करता के कुछ और’। निजी भूखंडों के मालिक बन चुके नागरिकों के सपने महानगरों में जमीन के बेतहाशा बढ़ते हुए दामों के जाल में उलझ गए। जमीन का दाम बढ़ जाने पर अपनी संपत्ति को कई गुने दाम पर बेच कर रातोंरात नहीं तो कुछ सालों में ही अमीर बन जाने के प्रलोभन के आगे निजी मकान में रहने का शौक हवा हो गया।

भूखंड आबंटित करने वाले प्राधिकरणों को अपनी योजना का यह बिगड़ता स्वरूप कैसे पसंद आता! उन्होंने ‘तुम डाल डाल, हम पात पात’ वाली नीति अपनाई और नियमों में सुधार करके एक निश्चित अवधि के अंदर इन भूखंडों पर मकान खड़ा करने की शर्त लागू कर दी। दो एक सालों में मकान नहीं बनाया तो जमीन का आबंटन खारिज। लेकिन जिनकी मंशा सरकारी कीमतों पर मिली जमीन को बाजार मूल्य पर बेच कर मुनाफा कमाने की थी, उन्होंने इन नियमों की भी काट खोज निकाली। देखते-देखते भवन निर्माण, नगर विकास और वास्तुकला की किताबों में आधुनिक भारत के मुद्रा-मनीषियों ने एक नया अध्याय जोड़ दिया, जिसका शीर्षक था ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ यानी पूर्णता प्रमाणपत्र वाला मकान।

भारतीय वास्तुकला की इस नवीनतम शैली में बने मकान नाप-तोल कर इतने बड़े ही बनाए जाते हैं कि भूखंड के आकार के तीस-चालीस प्रतिशत कानूनन निर्धारित हिस्से से अधिक जमीन न घेरें। उनकी नींव की गहराई पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल करती नई पीढ़ी के दिलोदिमाग में भारतीय संस्कारों की गहराई से अधिक नहीं होती। उनकी आयु साहित्य, संगीत, कला जगत से लेकर सिर के बाल कटाने की शैलियों तक में लगातार हो रहे नए प्रयोगों से ज्यादा लंबी नहीं होती।

जिस तरह लिजलिजे अश्लील दृश्यों से भरी फिल्मी पटकथाएं और भद्दी से भद्दी गालियों से पटे गीत और संवाद फिल्माते हुए आज के ख्यातिप्राप्त फिल्म निर्देशक बस एक लक्ष्य को ध्यान में रखते हैं कि किसी तरह सेंसर बोर्ड की कैंची से उसे बचा ले जाएं, उसी तरह इन ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ वाले मकानों में एक र्इंट की दीवारें खड़ी करते हुए, कबाड़ी से खरीद कर लाए सड़े-गले खिड़की और दरवाजों पर नया पेंट पोत कर लगाते हुए मकान मालिक के सामने बस एक ही लक्ष्य रहता है- किसी तरह से प्राधिकरण के वास्तुविद विभाग से ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ हासिल हो जाए। समझदार भवन निर्माता ऐसे मकान को बनाने का ठेका ठेकेदार को इस शर्त पर देता है कि ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ दिलाने के बाद ही उसकी जिम्मेदारी पूरी होगी। उसकी समझदारी चिड़िया की आंख यानी ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ पर निगाह गड़ाए रखने में होती है और ठेकेदार की समझदारी इससे आंकी जाती है कि मकान बनाने में सामग्री, मजदूर और उस परम आवश्यक प्रमाणपत्र के लिए ‘खर्चा पानी’ का आकलन वह कितनी कुशलता और बारीकी से कर सकता है।

महानगरों की यह आधुनिकतम भवन निर्माण शैली एक नए भारत की तरफ इंगित करती है, जिसमें आम चुनावों का सफल समापन गणतंत्र का, बोर्ड परीक्षाओं का सफल समापन सोद्देश्य और संपूर्ण शिक्षा का, तारीख पर तारीख देते जाने को सुचारु न्यायतंत्र का और येन-केन हासिल कर ली गई टीआरपी को सफल टीवी चैनल पत्रकारिता का ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ माना जाने लगा है। जिन लाखों अधूरे छूट गए रिहायशी फ्लैटों के जिक्र से बात शुरू हुई थी, बस वही अफसोस में बचे हुए लोग हैं, जिनके हिस्से में ‘कम्पलीशन सर्टिफिकेट’ नहीं लिखा था।

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