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बदलते मौसम में

मौसम प्रकृति की खूबसूरत रचनाओं में से एक है। हर मौसम की अपनी अलग तस्वीर होती है, खुशबू होती है और खासियत होती है।

सांकेतिक फोटो।

अम्ब्रेश रंजन कुमार

मौसम प्रकृति की खूबसूरत रचनाओं में से एक है। हर मौसम की अपनी अलग तस्वीर होती है, खुशबू होती है और खासियत होती है। आम बोलचाल में हम कह जाते हैं कि बहुत सर्दी है, गर्मी है या अत्यधिक बारिश ने बेहाल कर रखा है, लेकिन यह सच है कि हम हर मौसम का खूब आनंद लेते हैं। हम सभी मौसम बदलने की प्रक्रिया को अहसास कर पाते हैं। हर एक मौसम अपने साथ हमारे लिए विशेष सौगात लेकर आता है। अलग-अलग मौसम में हम अलग-अलग हवाओं का अनुभव करते हैं। ये हवाएं हमें मौसम परिवर्तन का संकेत देने लगती हैं। कभी रास्ते में चलते-चलते जैसे ही हवा हमें छूकर गुरजती है, हम उसी वक्त मौसम बदलने की आहट को महसूस करने लगते हैं।

हमारे त्योहार भी इन्हीं मौसमों से जुड़े होते हैं। हिंदी माह के मुताबिक होली फागुन माह में मनाया जाता है और उस समय फगुआ बयार चलती है। इससे पहले ही हमें फागुन में बहती हवाएं होली के आगमन का अहसास करा जाती हैं। इसी प्रकार अप्रैल माह के बाद मई और जून में देश में गर्मी का मौसम होता है। धीरे-धीरे हवा गर्म होने लगती हैं और यह ग्रीष्म ऋतु के आने का संकेत देने लगती हैं। अब आमतौर पर गर्मी का मौसम बहुत लोगों को नहीं भाता है, पर गौर करें तो यह मौसम अपने आप में बहुत ही खू़बसूरत होने के साथ-साथ ढेरों खूबियों से भरा है। सच यह है कि क्या बड़े क्या बच्चे, सभी इस मौसम का आनंद उठाते हैं।

इससे संबंधित अपने अनुभव की ही बात करूं तो पिछले दिनों भरी दुपहरी में घर के काम से बाहर जाना हुआ। दोपहिया वाहन पर दिन के चार-पांच घंटे सफर करते-करते पूरी गर्मी का अहसास हो रहा था। सड़क किनारे गन्ने के जूस की दुकानें, रेहड़ियों पर तरबूज, दुकानों में फ्रिज में पानी और ठंडे पेयों की ठंडी बोतलें और अन्य शीतल पेय से सजे फुटपाथ आदि पूरी तरह से गर्मी को महसूस करा रहे थे। धूप में तपने के बाद थोड़ा रुक कर कुछ शीतल पेय पीना अलग ही आनंद देता है।

यह आनंद दूसरे मौसम में हमें नहीं मिलेगा। गर्मी के इस मंजर को देख बचपन के दिन याद आए। उन दिनों अक्सर गर्मी के मौसम में सुबह और शाम घर से बाहर निकलने का काफी वक्त मिल जाता था, क्योंकि गर्मी में दिन बड़े हुआ करते हैं तो सुबह जल्दी उठ कर खेलने के लिए या व्यायाम करने मैदान भी चला जाता था और मैदान से लौट कर इतना समय तो मिल जाता था कि स्कूल के लिए तैयार होने का पर्याप्त समय मिल सके।

अप्रैल माह बीतने के साथ स्कूल जाने की बाध्यता भी समाप्त हो जाती थी, क्योंकि स्कूलों में लंबी छुट्टियां तो गर्मी के मौसम में ही होती हैं। हम इन्हीं छुट्टियों में नाना-नानी जैसे रिश्तेदारों के घर जाया करते थे। बचपन में अपने सगे-संबंधियों के घर जाते वक्त भी सड़कों के किनारे तरबूज, कटे खीरे, ककड़ियां, आइसक्रीम या अन्य शीतल पेय पदार्थ आदि से सजे मिलते थे। बचपन का वही मंजर इन दिनों भी अक्सर बरकरार मिलता है।

गर्मी के दिनों की शामें काफी खूबसूरत होती हैं। एक तो इस पहर दिन की गर्मी के बाद सुकून पहुंचाने वाली ठंडक होती है, वहीं सांझ का पहर लंबा होता है तो इसमें बच्चों को अपने मन का काम करने का काफी समय मिल जाता है। लेकिन इस मौसम में दोपहर कैसा होता है, यह भी देखना जरूरी है। गर्मी की दुपहरी गर्मी वाली तो होती ही है, मगर बचपन में खासकर गांव में हम दोपहर का भी आनंद उठा लेते थे। गांव हरे-भरे होते हैं, पेड़ हमें गर्मी के दिनों में भी अपनी छांव से ठंडक पहुंचाते हैं और यह मौसम की गर्माहट हो महसूस नहीं होने देते।

यह आम का मौसम भी होता है। पेड़ों पर फल रहे आम को देख कर मन बाग-बाग हो जाता है, फिर इस मौसम में सुबह, शाम या दोपहर कोई भी पहर हो, आम के पेड़ के पास जाते ही मन प्रफुल्लित हो जाता है। स्कूल में बच्चों की किताबें भी इसी मौसम में बदलती हैं। कोयल की कूक भी हमें इसी मौसम में ज्यादा सुनाई देती है। गर्मी का मौसम बच्चों के लिए तो न जाने कितनी उमंगे अपने साथ लेकर आता है। उनके साथ बड़े भी इसका आनंद उठाने से नहीं चूकते। बच्चों को छुट्टियों में अलग-अलग जगह घुमाने के बहाने, उन्हें भी सगे-संबंधियों से मिलाने का अवसर मिल जाता है।

इस मौसम में प्रकृति की सुंदरता का अनुभव करने के साथ-साथ गर्मी के फलों को खाने का स्वाद और हरे-भरे वातावरण के बीच ठंडी हवाओं का चलना बहुत ही आनंदायी होता है। ऐसे में शर्त यह होती है कि हम अपने आसपास के वातावरण को हरा-भरा रखें। पेड़ों को अपना मित्र बनाएं। ऐसा करना हमें और आने वाली पीढ़ियों के हित में कारगर होगा। प्रकृति से हमें जो भी मौसम मिले हैं, खूबसूरत हैं। हम उनका आनंद उनके नैसर्गिक रूप में ही उठा सकते हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ कर हम अपना ही नुकसान करते आए हैं। अगर यही प्रवाह आगे भी जारी रहता है तो आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के वास्तविक रूप के आनंद से वंचित रहेंगी।

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