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दुनिया मेरे आगेः बावरा मानुष मन

मनुष्य का मन बावरा होता है। उसके पास प्रकृति की दी गई अनेक खूबियां हैं, लेकिन वह अपनी तुलना पशु और पक्षियों से करता है।

Author August 2, 2018 3:12 AM
मनुष्य का एक अर्थ उसका लोभी होना भी है, जिसे हम बावरा मन कहते हैं।

मनुष्य का मन बावरा होता है। उसके पास प्रकृति की दी गई अनेक खूबियां हैं, लेकिन वह अपनी तुलना पशु और पक्षियों से करता है। अगर वह बलशाली है तो अपनी तुलना घोड़े के बल से करता है। वह कहता है कि देखो उसमें घोड़े-सी ताकत है। वह हवा में उड़ने की ताकत रखता है। उसने हवाई जहाज भी बना लिया है, लेकिन आज भी आसमान पर उड़ते पंछी से वह तुलना करता है। अपने मोटापे के लिए कभी हाथी का उदाहरण देता है तो कम बुद्धि के लिए गधे की बानगी देता है। वफादारी के लिए उसके पास कुत्ते के अलावा कोई दूसरी मिसाल नहीं तो स्वार्थ के तराजू में वह लोमड़ी से तुलना करता दिखता है। राजा के रूप में शेर मनुष्य समाज का आदर्श है।

वह हर काम कर सकता है जो मुमकिन नहीं है, लेकिन वह पशु-पक्षियों में ही अपनी दुनिया देखता है। इसके उलट कई बार मैं सोचता हूं कि क्या कभी ये पशु-पक्षी भी मनुष्य होने का गुमान पाल लेते होंगे! पक्का तो कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन लगता है कि वे अपने आप में खुश हैं। वे अपनी तुलना मनुष्य से शायद ही कभी करते होंगे। यह मनुष्य का बावरा मन है जो अपनी खुशी और आनंद के क्षणों पर भी खुशी नहीं मना पाता। पानी की चार बूंदें क्या टपकी, हवाओं ने जरा शोर मचाया तो जंगल में मोर-मोरनी मगन हो उठते हैं। लेकिन मनुष्य बारिश के दिनों में सर्दी की कामना करता है और सर्दी आ जाने पर उसका मन तपती धूप में पसीना-पसीना हो जाने का करता है। इसी को मनुष्य का बावरा मन कहते हैं।

मनुष्य को जो मिलता है, उससे वह खुश नहीं होता है और जो नहीं मिलता, उसे पाने के लिए अथक प्रयास करता है। इस बावरे मन की एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि उसे लगता है कि उसे छोड़ कर सारा संसार आनंद में है। इसी आनंद की तलाश में वह भटकता रहता है। भौतिक सुविधाओं को पा लेने के बाद भी वह आनंदित नहीं होता है, बल्कि चाहता है कि उसे इससे अलग कुछ मिले। जीवन का सत्य यही है कि मनुष्य का बावरा मन पहले भौतिक सुविधाओं को जुटाने में लग जाता है, लेकिन जब सुविधाएं मिल जाती हैं तो उसका मन बैरागी हो जाता है। लेकिन कई बार कबीर के मार्ग में चलने के बाद भी कई बार उसे वह पाने की चाहत होती है जो उसे मिला नहीं।

मनुष्य के मन का यही बावरापन उसके दुखों का कारण भी है तो उसे कामयाब भी यही बनाता है। एक चींटी के उद्यम से वह जीवन जीना सीख लेता है। जिंदगी की भागदौड़ में निराश मनुष्य के लिए चींटी का बार-बार मेहनत कर अन्न का एक-एक दाना समेट कर ले जाना साहस पैदा करता है। वह मकड़ी के जाले को देख कर सफलता की तरफ बढ़ता है। वह इस बात की बारीकी से जांच करता है कि कैसे बार-बार असफल हो जाने के बाद भी मकड़ी जाल बुनना नहीं छोड़ती है। उससे वह सीख कर कामयाबी के लिए नई कोशिश करता है। उसका मन गाने को करता है तो उसे कोयल की मीठी कूक सुहाती है, लेकिन गुस्से में वह कौवे की तरह कांव-कांव करना नहीं छोड़ता है। उसके जीवन में सफलता और विफलता का मानक हमेशा से खरगोश और कछुए की कहानी रही है। वह खरगोश की तरह तेजी से हर कुछ पाना चाहता है।

जो है, उससे ज्यादा पा लेने की अपनी चाहत में वह स्वतंत्र पशु-पक्षियों की तरह बन जाना चाहता है। लेकिन यह सब कुछ संभव नहीं होता है। तब बावरा मन उनसे सीखने की कोशिश करता है। पंचतंत्र की कहानियां उसका मार्गदर्शन करती हैं तो जंगल में पशु-पक्षियों के बीच पले-बढ़े ‘मोगली’ को देख कर उसे सुखद अनुभव होता है। मनुष्य के बच्चे को पशु-पक्षी बच्चों की तरह प्यार करें, यह उसके लिए सबक होता है। यही कारण है कि वह घर में सुविधा से पशु-पक्षियों को पालता है।

हालांकि मन इतना भी बावरा नहीं होता है कि मनुष्य अपने लाभ-हानि को भूल जाए। वह कुत्तों को इसलिए घर में पालता है कि वह उसकी सुरक्षा करे तो मनोरंजन के लिए तोते को घर में रख लेता है। यह स्वार्थ ही उसे पशु-पक्षियों से अलग करता है। पशु-पक्षियों में भी स्वार्थ होता होगा, लेकिन वह मनुष्य के बावरे मन की तरह दोहरा नहीं होता है। जान जोखिम में पाकर मनुष्य पशु-पक्षियों को मारने में देर नहीं करता है, लेकिन पशु-पक्षी मनुष्य की जान लेने के पहले खुद अपनी जान बचा कर भागने की कोशिश करते हैं। उन्हें मालूम है कि शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा और उन्हें बंधक बना लेगा। मनुष्य चाहे कितना भी उड़ान भरे, पशु-पक्षियों की तरह बन जाने की कितनी कोशिश करे, वह नहीं बन सकता, क्योंकि मनुष्य का एक अर्थ उसका लोभी होना भी है, जिसे हम बावरा मन कहते हैं।

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