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दुनिया मेरे आगे: असुरक्षा का जाल

हाल ही में दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में भीड़ भरे बाजार में एक महिला से छेड़छाड़ का जब उसके पति और दूसरे लोगों ने विरोध किया तो महिला को चाकुओं से गोद कर मार दिया गया।

देश भर में ऐसे हालात आम हैं, जिनमें महिलाएं अश्लीलता, अभद्रता और नतीजतन हत्या, तेजाबी हमला आदि हिंसक व्यवहार का कोप झेल रही हैं।

हाल ही में दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में भीड़ भरे बाजार में एक महिला से छेड़छाड़ का जब उसके पति और दूसरे लोगों ने विरोध किया तो महिला को चाकुओं से गोद कर मार दिया गया। इस तरह एक हंसता-खेलता गरीब परिवार दो गुंडों के अश्लील, अभद्र व्यवहार और हिंसक हमले के कारण बुरी तरह बिखर गया। गुंडों के बारे में पता चला कि वे कुछ दिन पहले ही जेल से सजा पूरी कर छूटे थे। अब फिर वे पुलिस की कैद में हैं। लेकिन बदमाशों को उनके अपराध के लिए त्वरित और समयबद्ध दंड मिल पाएगा, इसमें संदेह है।

करीब साढ़े चार साल पहले 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के ही वसंत विहार में बलात्कार और हत्या के बाद अपराधियों को मिली सजा अपने अंजाम तक आज भी नहीं पहुंच सकी है। उस घटना के विरोध में देश-विदेश में पंद्रह-बीस दिनों तक सरकार विरोधी जैसा जनांदोलन हुआ था, उसकी परिणति आखिर क्या हुई! अगर देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं की सुरक्षा इस तरह करेगी और पीड़ित-असुरक्षित होने पर उन्हें ऐसा न्याय दिलवाएगी, तो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे सरकारी अभियान की सार्थकता समाज में कैसे सिद्ध होगी! देश के दूसरे राज्यों में हालात अलग नहीं हैं। लोग अमेरिकी बंदूक संस्कृति के विरोध में देश-विदेश में मार्च निकालते हैं, लेकिन अपराध रोकने के लिए सिर्फ बंदूक के लाइसेंस बंद करने से काम नहीं चलने वाला। अपराध नियंत्रण और उन्मूलन के लिए इसके वास्तविक चरित्र की पहचान कर उसे खत्म करना होगा।

देश भर में ऐसे हालात आम हैं, जिनमें महिलाएं अश्लीलता, अभद्रता और नतीजतन हत्या, तेजाबी हमला आदि हिंसक व्यवहार का कोप झेल रही हैं। लगभग हर रोज ही महानगरों से लेकर सुदूर गांवों तक में अनेक महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हो रहा है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध की जिन घटनाओं के अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं या भाग जाते हैं, उनके लिए तो कह सकते हैं कि न्यायिक धारणाएं या दंड निर्धारित नहीं हो सकते। लेकिन हैरानी की बात है कि तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें महिलाओं के हत्यारे या बलात्कारी पकड़े जाने के बाद भी निचली अदालतों से लेकर उच्च और सर्वोच्च अदालतों में मात्र विधि विवेचना का माध्यम बने रहते हैं। वर्षों बीत जाने और आरोप सिद्ध हो जाने के बाद भी इन्हें इनके किए का उचित दंड नहीं मिल पाता।

खासतौर पर जिन मामलों में सरेआम हत्या हुई और उसके गवाह वहां मौजूद तमाम लोग होते हैं, उनमें भी सजा तय होने में लंबा वक्त लग जाता है। विडंबना यह है कि अपराधियों के निशाने पर आई किसी महिला की त्रासद हत्या की घटना पर हमें गुस्सा आता है, लेकिन हत्यारों को सख्त सजा में देरी पर हमें गुस्सा नहीं आता है। देर से न्याय मिलने और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के चलते बड़ी संख्या में अपराधी देश की जेलों में भरे पड़े हैं और जिस प्रकार जेलों में बंद विचाराधीन आरोपियों और अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में हमारे जेल तंत्र और उसके शासन-प्रशासन की कार्यपालक शक्तियां, सुविधाएं और दोषियों को दंड सुनिश्चित करने का त्वरित प्रशासनिक ढांचा तैयार नहीं हो पा रहा।

अगर यह मान भी लिया जाए कि कुछ अपराधों में गलत साक्ष्यों और अनुचित पुलिस निरीक्षण के कारण निर्दोष लोगों को सजा के तौर पर जेलों में रखा गया है और उन पर कानूनी कार्रवाई शीघ्रता से होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसे में निर्दोष लोगों को दंड मिलने पर कानून खुद ही सवालों के घेरे में आ जाएगा। लेकिन जिन आपराधिक घटनाओं के प्रत्यक्ष साक्षी घटनाओं का स्पष्ट विवरण दे चुके होते हैं और साथ ही चश्मदीदों के विवरणों से मिलते-जुलते वैज्ञानिक-प्रामाणिक साक्ष्य भी एकत्र किए जा चुके होते हैं, उन पर न्याय में देरी होने से लोगों में न्याय-व्यवस्था के प्रति भरोसा कमजोर होता है।

लोकतांत्रिक विधि व्यवस्था के साथ-साथ सामान्य प्राकृतिक मानवीय जीवन को हानि पहुंचाने वाले जो भी अपराध, अवैध कार्य और लोक विरोधी कर्म होंगे, उनके लिए त्वरित दंड की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन हम देखते आए हैं कि न महिलाओं के खिलाफ बर्बर अपराध के चर्चित मामलों में दोषियों को कोई समयोचित कानूनी दंड मिल पाता है और न ही देश के बड़े राजनीतिक अपराधियों को उनके शासन-कर्म संबंधी अपराधों के लिए कड़ा दंड मिलता है।

यह एक विचित्र विडंबना है कि कई बड़े और क्रूर अपराधियों को कठोर कारावास या मृत्युदंड देने के बजाय उन्हें जेल में सामान्य जीवन जीने और बीमार पड़ने पर बेहतर इलाज की सुख-सुविधाएं मिल जाती हैं। ऐसे अपराधियों द्वारा अनेक तरह से पीड़ित हुए लोग और उनकी भावी पीढ़ी बिना किसी गलती के ही अपने जीवन में सजा की तरह जिंदगी काटते हैं और जीवन भर घुट-घुट कर जीते रहते हैं।

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