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दुनिया मेरे आगे: देखन में छोटे लगें

मोती की आभा वाले और सितारों के आकार के ये नन्हे-नन्हे फूल इतने क्षणभंगुर न होते तो फूलों से किसी देवी की मूर्ति का शृंगार करते समय शायद उन्हीं को कर्णफूल और नाक की कील के स्थान पर सजा दिया जाता। फूल के केंद्र से बाहर की ओर उभरते ताज यानी क्राउन की खूबसूरती दिव्य आभा को और बढ़ाती।

treeहरसिंगार के फूल। फाइल फोटो।

बिहारी सतसई (सतसैया) के दोहों (दोहरे) के विषय में जब पढ़ा कि वे छोटे होते हुए भी नाविक के तीर जैसे गंभीर घाव करते हैं तो मन में प्रश्न जगा कि नाविक यानी केवट का तीर-कमान से क्या लेना देना। फिर शब्दकोष की शरण में गया तो पता चला कि सही शब्द नाविक नहीं, नावक है, जिसका अर्थ है छोटे विषैले बाण। एक वेबसाइट पर एक प्रश्न के उत्तर में लिखा पढ़ा कि नावक एक फूंकनी या नली होती है, जिसमें आदिवासी बाण भर कर फूंकते हैं और ये छोटे विषाक्त बाण शिकार को गंभीर रूप से घायल कर देते हैं।

पर अब एक नया प्रश्न खड़ा हो गया। फूंक मारो तो उड़ जाए, ऐसा बाण कितना सूक्ष्म होगा और कितना गहरा होता होगा उसका असर। बिहारी सतसई को परे करके मन उन चीजों को कुरेदने में व्यस्त हो गया, जिनका स्वरूप सूक्ष्म हो, लेकिन प्रभाव व्यापक होता हो। इस सीधे-सादे प्रश्न के उत्तर में कोरोना विषाणु जैसे भयंकर वायरस का ध्यान भी आ सकता है, लेकिन फूलों के अनुरागी मेरे मन को अचानक उस नन्हे से फूल की मद्धिम सुगंध याद आ गई जो किताबों के पन्नों में दबा दिए जाने पर सूख तो जाता है, लेकिन जिसकी भीनी-भीनी खुशबू यादों में बसे किसी प्यारे से क्षण की तरह बहुत दिनों तक बनी रहती है।

हरसिंगार के फूलों की तरह उसे भी धरती पर बिछ जाना आता है। लेकिन धरती पर बिछ जाने के बाद हरसिंगार का अस्तित्व लगभग क्षणभंगुर होता है। बहुत जल्दी उसके फूल मुरझा जाते हैं और बची रह जाती है बस याद। लेकिन मैं जिसकी बात कर रहा हूं, वह नन्हा-मुन्ना फूल धरती के आगोश में आकर जब अपने अस्तित्व को मिटाता है तो उसका समर्पित अस्तित्व पूरा परिवेश सुवासित कर देता है। उसकी भीनी-भीनी सुगंध में मिठास बसी होती है। महुआ के फूलों जैसी मादकता नहीं होती है यह, फिर भी चींटे और चींटियों को आकर्षित करती है।

झरे हुए हरसिंगार के फूलों की पंखुड़ियों का श्वेत रंग उसकी पीली नारंगी डंडी के साथ मिल कर धरती पर अद्भुत रंगोली बना देता है। निष्ठुर होगा वह इंसान जो अनजाने में इस रंगोली पर पैर पड़ जाने पर पश्चाताप न करे। यों देखने के बाद जानबूझ कर कोई इस पर पैर रखने की कोशिश भी कैसे करेगा! लेकिन सतसैया के दोहरों जैसे छोटे इस दूसरे फूल का रंग हाथी दांत जैसा पीलापन लिए श्वेत होता है।

इसीलिए हरसिंगार की अपेक्षा कद में काफी बड़े अपने पेड़ की डालियों से अलग होकर जब वह नीचे धरती पर बिछ जाता है तो उसका फीका रंग किसी रंग-बिरंगी अल्पना या रंगोली की याद नहीं दिलाता। लेकिन सितारों से हर दिशा में फूटती किरणों की याद दिलाती उसकी आकृति एक उस गीत की याद दिला देती है जिसमें ओस की बूंदों से फूटती किरणों को देख कर इसके गीतकार कहते हैं- ‘पत्तों की गोद में आसमान से कूदे, अंगड़ाई लेकर, फिर करवट बदल कर, नाजुक से मोती हंस दें फिसल कर, खो न जाएं… ये तारे जमीन पर।’ तारों के सौंदर्य से जिन्हें सरोकार न हो और जो सोने चांदी की चमक में ही सौंदर्य देख पाते हों, उन्हें शायद ये ‘तारे जमीन पर’ न रिझाएं।

लेकिन उन्हें भी ये छोटे-छोटे फूल हीरा जड़ित कर्णफूल की नहीं, तो फीके श्वेत हाथीदांतिया रंग और सितारेनुमा आकृति के कारण मोतियों से बने कर्णफूल या नाक की कील की याद जरूर दिला सकते हैं। इन्हें देख कर पूरबी अंग की गायकी पसंद करने वालों को बेगम अख्तर और गिरिजा देवी जैसी शीर्षस्थ गायिकाओं की और कर्नाटक संगीत के प्रेमियों को एमएस सुब्बुलक्ष्मी की नाक में दमकती हीरे की कील भी याद आएगी।

मोती की आभा वाले और सितारों के आकार के ये नन्हे-नन्हे फूल इतने क्षणभंगुर न होते तो फूलों से किसी देवी की मूर्ति का शृंगार करते समय शायद उन्हीं को कर्णफूल और नाक की कील के स्थान पर सजा दिया जाता। फूल के केंद्र से बाहर की ओर उभरते ताज यानी क्राउन की खूबसूरती दिव्य आभा को और बढ़ाती।

रूप रंग और बास के इस अद्भुत संयोग के कारण प्रकृति प्रेमी मुगल बादशाहों के उद्यानों में इनकी उपस्थिति लगभग जरूरी होती थी। ऊंचाई पंद्रह मीटर तक होने के कारण आज छोटे निजी उद्यानों में इसका समाना कठिन है, लेकिन उत्तर भारत के पुराने उद्यानों में आज भी उनकी सुगंध अप्रैल मई से लेकर सितंबर तक फैली रहती है।

प्राचीन काल की तरह आज की उपभोक्ता संस्कृति में भी आयुर्वेद, हकीमी और पश्चिमी चिकित्सा पद्धतियों तक में इसके पेड़ की भूरी-काली खुरदुरी छाल को पीस कर मसूढ़ों को निरोग और दांतों को कांतिमय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

अगर अब तक भी आपके जेहन में चमकीली और गुदगुदी पत्तियों, खुरदुरी छाल और नन्हे श्वेत फूलों वाले इस सुंदर और उपयोगी पेड़ का नाम नहीं कौंधा है तो समय आ गया है यह बताने का कि चर्चा हो रही थी मौलश्री की, जिसे बकुल भी कहते हैं और जिसका वैज्ञानिक नाम है मामुस्पोस एलेंगी।

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