मखौल का मानस

मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं। वे अपनी उम्र की प्रौढ़ावस्था में पहुंच चुके हैं और अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं।

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सांकेतिक फोटो।

योगेंद्र माथुर

मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं। वे अपनी उम्र की प्रौढ़ावस्था में पहुंच चुके हैं और अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं। लेकिन वे एक बुरी आदत का शिकार हैं। उनकी वह आदत यह है कि वे जब-तब दूसरों का मखौल उड़ाते हैं। कभी किसी की सूरत को लेकर तो कभी सीरत को लेकर या फिर किसी के रहन-सहन को लेकर। हर एक व्यक्ति जो उनके संपर्क में आता है, उनके ‘मजाक’ का पात्र बनता है। दूसरों का मजाक बनाने में उन्हें आनंद का अनुभव होता है। महज मेरे ये रिश्तेदार ही नहीं, ऐसे कई व्यक्ति हैं, जिनके स्वभाव में यह बुरी आदत शुमार है। किसी के रूप-रंग या शारीरिक विकृति या फिर अपंगता को लेकर उसे कलूटा, चपटा, लूला, लंगड़ा, काना, नकटा या गंजा आदि कहना और किसी की स्वभावगत विशेषताओं के कारण उसे लल्लू, ढब्बू, छम्मक-छल्लो, तीखी छुरी, चतुर लोमड़ी और स्याना कौआ जैसी उपाधि से विभूषित कर उनका मखौल उड़ाने में ऐसे लोग खुद को बड़ा ही आनंदित और गौरवान्वित महसूस करते हैं। ऐसा करते वक्त उन्हें इस बात का शायद यह ध्यान नहीं होता कि वे खुद क्या और कैसे हैं?

इस तरह के लोग किसी की शारीरिक खामी या विकृति पर कटाक्ष करते वक्त यह बात नहीं सोचते हैं कि उनका पल दो पल का यह मजाक संबंधित व्यक्ति के मर्म को कहां तक आहत कर रहा है! जो लोग जो प्राकृतिक वजहों से हुई या रही शारीरिक विसंगति को विस्मृत कर अपनी प्रबल जिजीविषा के तहत सुनहरी मंजिल पाने की असीम आकांक्षा में जिंदगी के संघर्ष में संलग्न हैं, अपने ऊपर किए गए कटाक्ष से कितनी वेदना महसूस करते हैं, इस बात के सोचने और समझने की उनका मखौल बनाने वाले लोगों को फुर्सत नहीं होती।

दूसरों का मखौल उड़ा कर कथित रूप से ‘मजा’ लेने वाले ऐसे लोगों के संबंध में गंभीरता से विचार किया जाए तो समझ में आता है कि वैसे लोग या तो श्रेष्ठता की मिथ्या भाव के शिकार होते हैं, जो स्वयं को जरूरत से ज्यादा अक्लमंद या होशियार मानते हैं और अपने आपको अति सुंदर या सर्वगुण संपन्न समझते हैं या फिर वैसे लोग होते हैं जो किसी कुंठा से ग्रस्त होते हैं और ईर्ष्यावश दूसरों का उपहास कर अपने अहं की तुष्टि करते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल इस तरह के अशिक्षित लोगों के भीतर पाई जाती है, बल्कि शिक्षित तबके में भी इस तरह के लोग बहुतायत में पाए जाते हैं, जो अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंरा, नाते-रिश्तेदारी संबधों को ताक पर रख कर अच्छा और सभ्य आचरण करने के बजाय दूसरों का मखौल उड़ाने जैसी ओछी हरकतें करते हैं और अपनी दूषित मानसिकता का परिचय देते हैं।

अक्सर एक बात यह भी देखी जाती है कि किसी का मखौल बनाने के इस दौरान वहां मौजूद कई अन्य लोग भी इस तरह के घृणित मजाक का विरोध करने के बजाय खिलखिलाकर हंसते हैं और उपहास उड़ाने वाले का हौसला अफजाई करते हैं। इनमें से कई लोग ऐसा केवल इस भय से करते हैं कि कहीं वे भी इस तरह की ‘दुर्घटना’ का शिकार न हो जाएं। ऐसी टिप्पणियों के जरिए किसी का उपहास उड़ाना निश्चित रूप से अमानवीय और असभ्यता है, लेकिन ऐसी हरकतों के प्रति समाज की सहज प्रतिक्रिया ऐसी व्यवहार और इससे उपजी जटिलता को और ज्यादा जटिल बनाते हैं। ऐसे सामाजिक व्यवहार व्यक्ति और समाज के स्वरूप को संवेदनहीन और असभ्य बनाते हैं, जिसका खमियाजा देर-सबेर सबको भुगतना पड़ता है।

दरअसल, ऐसे करते समय ऐसे लोग यह नहीं सोचते कि उस समय भले ही वे बच निकले, कभी वे भी ऐसी कुत्सित हरकत का शिकार बन सकते हैं। होना तो यह चाहिए कि अपना निजी स्वार्थ त्याग कर ‘भद्दे मजाक’ का विरोध किया जाए, इसके संदर्भों की व्याख्या करके ऐसा करने वाले व्यक्ति को दुत्कारा जाए, ताकि वह दुबारा इस तरह की टिप्पणी या हरकत नहीं करे। दूसरों की जिंदगी का मखौल बनाने वाले ऐसे लोगों को भी चाहिए कि दूसरों पर छींटाकशी करने से पहले वे खुद अपने गिरेबां में झांक कर देख लें और इस तरह की तुच्छ हरकत करने के बजाय अपना ध्यान रचनात्मक कार्यों में लगाएं। अन्यथा ऐसे असभ्य आचरण के चलते हर कोई उनसे दूरी बनाने लगेगा और एक दिन उनकी अपनी ही जिंदगी किसी ‘मजाक’ से कम नहीं रह जाएगी।

यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि इस तरह के बर्ताव के जरिए जिन लोगों का मजाक उड़ाया जाता है, उनमें से कई लोग अपनी मेहनत और प्रतिभा के बूते समाज और देश-दुनिया में ऐसी जगह बना लेते हैं, जहां तक पहुंचना किसी विवेकवान और संवेदनशील व्यक्ति के लिए ही संभव हो सकता है। यों भी किसी अभाव, कमी या प्राकृतिक खासियत को केंद्र में रख कर अगर किसी का मजाक बनाया जाता है, तो इसका मतलब यही होता है कि मजाक बनाने वाले के भीतर विवेक, संवेदशीलता और सभ्यता की कमी है। जाहिर है, इन कमियों से लैस व्यक्ति शायद किसी कुंठा और हीनताबोध का शिकार होता है और दूसरों का मजाक उड़ा कर अपने अहं की तुष्टि करना चाहता है। जबकि यह किसी भी भी संवेदनशील और विवेकवान मनुष्य के लिए स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

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