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दुनिया मेरे आगे: मनौती और मंशा

ऐसा माना जाता है कि कोई काम करने से पहले अगर मनौती मानी जाए तो सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। बहुत सारे लोग इस मान्यता में विश्वास करते हुए देखे जाते हैं।

प्रतीकात्मक चित्र

ऐसा माना जाता है कि कोई काम करने से पहले अगर मनौती मानी जाए तो सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। बहुत सारे लोग इस मान्यता में विश्वास करते हुए देखे जाते हैं। अमीर और गरीब, डॉक्टर-मरीज, राजनीतिक दलों के नेता, खिलाड़ी और यहां तक कि चोर और जेबकतरे भी अपना मनचाहा पूरा करने के लिए मनौती मानने वालों में शामिल हैं। ऐसे में अक्सर यह होता है कि एक व्यक्ति की मनौती से दूसरे व्यक्ति की मनौती का टकराव हो आता है। यह ‘हितों का टकराव’ कई बार अजीबोगरीब और दिलचस्प स्थिति उत्पन्न कर देता है। मसलन, कोई धनी व्यक्ति यह अपेक्षा लेकर मंदिर जाता है कि उसका धंधा खूब चले और उसे खूब लाभ हो और दूसरी ओर एक जेबकतरा अपना काम आगे बढ़ने की मन्नत के साथ मंदिर जाता है। ऐसे में अगर उस धनी व्यक्ति की जेब कट जाती है तो यह सवाल खड़ा हो जाता है कि किसकी मनौती पूरी हुई!

फिर डॉक्टर, दवा की दुकान और मरीज का सवाल आए तो वहां कौन-सा नियम लागू होगा। यहां किसकी मनौती पूरी होगी? अगर डॉक्टर और दवा की दुकान वालों की अपना काम बढ़िया चलने की मनौती पूरी हो तो बेचारे मरीज गए काम से! और अगर मरीजों के ठीक होने की मनौती मानी जाए तो डॉक्टर और दवा दुकान वालों का धंधा चौपट! इसी तरह, चोर और पुलिस की मनौती का भी टकराव होगा। चोर चोरी करके भाग जाए तो उसकी पौ-बारह और पकड़ा जाए तो पुलिस की चांदी। जहां तक नेताओं का सवाल है, किस-किसकी मनौती मानी जाए! एक सीट पर जीतना तो एक को ही है। तो जो जीता उसी की मनौती मानी गई और जो हारे वे बेचारे रह गए। लाभ के टकराव में भी लाभ एक को ही होना है और दूसरे को हाथ मलते रह जाना है।

विक्टोरियन उपन्यासकार टॉमस हार्डी का एक मशहूर दुखांत उपन्यास है ‘ज्यूड दी ऑबस्क्योर’। उसमें एक पात्र इतना ‘अभागा’ था कि उसका हर काम बिगड़ जाता था और हर प्रयास निराशा में बदल जाता था। उसकी यही मान्यता बन गई थी कि उसका जन्म असफल होते रहने के लिए ही हुआ है। इसीलिए वह कहता है- ‘मैं कभी सफल हो ही नहीं सकता। अगर मैं किसानी करूं तो वर्षा नहीं होगी और मैं कफन बेचने लगूं तो लोग शायद मरना ही बंद कर देंगे।’ ऐसी थकी-हारी मानसिकता वाले लोगों के लिए अगर कोई आशा की किरण है तो वह है ईश्वर के सामने मनौती मानना। क्या पता किस दिन नकारात्मक सोच सकारात्मकता में बदल जाए! कौन जाने कब दिन फिर जाएं!

कुछ मामले इतने करीबी और नाजुक होते हैं कि तय कर पाना मुश्किल होता है कि किसकी जरूरत ज्यादा थी और किसे फायदा मिला। अब एक स्थान के लिए जब दो सौ या तीन सौ या और अधिक लोग आवेदन करेंगे तो चयन तो एक का ही होगा और शेष निराश होंगे। उनमें से बहुत सारे उम्मीदवारों ने मनौती मानी होगी। हजारों-लाखों लोग मंदिर में जाते हैं और मनौती मानते हैं। अब कितने लोगों की मनौती पूरी हो? जो पहले आया उसकी या किस-किसकी और कैसे! अगर ऐसा नहीं है तो यही कहा जाता है कि मौके की बात है। ईश्वर तो सबको बराबर नजर देखता है। लेकिन कुछ लोगों की वजह से दूसरों को मौका ही नहीं मिल पाता। इसके बावजूद मनौती का चलन चलता रहता है। वह खत्म नहीं होता।

सच यह है कि अगर एक की भी मनौती पूरी हो जाती है तो वही इच्छा रखने वाले बहुत सारे अन्य लोगों को निराश होना ही पड़ता है। हितों का टकराव कहें या चाहने वालों की बहुतायत, लेकिन हकीकत यही है कि मनौती मानना और मंजूर होना या नहीं हो पाना जीवन का अभिन्न अंग है। लोगों का विश्वास इतना अटूट और आस्था इतनी गहरी होती है कि वे मनौती मानते ही रहते हैं। मनौती पूरी न होने पर वे यह सोच कर खुद को दिलासा देते हैं कि शायद उन्हीं के प्रयास में कोई कमी रह गई होगी। मसलन, सीधे हाथ की बजाए उल्टे हाथ में पूजा की थाली पकड़ रखी होगी, जल्दबाजी में हाथ नहीं धोए होंगे या फिर पूरी एकाग्रता से मनौती नहीं मानी होगी। वे हमेशा दोष खुद में ढूंढते हैं, मनौती में नहीं।

दही-चीनी खाकर शुभ कार्य के लिए जाना, किसी खास मंदिर में दर्शन करना, किसी खास रास्ते से जाना, मांगने वालों को कुछ न कुछ देते हुए जाना, साक्षात्कार के लिए जाते समय बाएं या दाएं पैर को पहले बढ़ाना, सफेद या किसी अन्य रंग के ही कपड़े पहन कर जाना- इस तरह के सभी काम उस चेतावनी का हिस्सा हैं जो मनौती के साथ दी जाती है। नाकाम होने पर इन्हीं में से किसी चूक के सिर पर ठीकरा फोड़ा जाता है और उसे ही जिम्मेदार बताया जाता है। लेकिन मनौती और परंपरा महिमा के बीच इंसान का खुद पर भरोसा कहां गुम हो जाता है!

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