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दुनिया मेरे आगेः फर्क क्या है

कोई कहीं से पूरा नहीं चला जाता। जहां से आए, वहां अपना कुछ छूट गया और उनका कुछ साथ लिपट लेता है

Author September 9, 2016 2:25 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर

 निधि सक्सेना

कोई कहीं से पूरा नहीं चला जाता। जहां से आए, वहां अपना कुछ छूट गया और उनका कुछ साथ लिपट लेता है। नहीं, सामान नहीं! अमेरिका में रहते हुए भारत की याद बेतरह सताती थी, सो अमेरिका में भारत खोजते थे। चाव तो आता था कि घर भी विदेशियों संग बांटें, लेकिन दो दिन में पता चल जाता है कि घर वही मुफीद है, जहां लौटने पर अपनी-सी चप्पलें मिलें! अनजानी और औचक तो पूरी दुनिया है। घर ढूंढ़ने के सिलसिले में एक वेबसाइट काम आई जो अमेरिका में दक्षिण एशियाइयों की लाल बुझक्कड़ वाली पोटली है। बाकी लोक भी हमें ऐसे ही देखता है कि हम दक्षिण एशियाई हैं। ज्यादा भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में बांटो, तो मुस्कराते हुए पूछते हैं- ‘फर्क क्या है? हमें तो एक से ही लगते हो!’ इस साइट की बाबत पता चला कि यहां ‘अपनी बिरादरी’ में ठौर मिल जाता है। पाकिस्तानी, हिंदुस्तानी, श्रीलंकाई, बांग्लादेशी दरवाजों के पते लिखे थे, लेकिन दस्तक पर कोई दरवाजा खुलता नहीं था। दर-दर भटकते एक घर खुला, जहां जूते दरवाजे के किनारे खोल कर अंदर घुसना था। वहां तमन्ना रहती थी। वह बांग्लादेश से है और डॉक्टर है। मैंने उसे बताया कि जहां हूं, वहां ठीक से नहीं हूं और आज कहो तो आज ही बोरिया ले आऊं। मैं तमन्ना के लगभग पीछे पड़ गई कि मुझे उसी के संग रहना है और आज ही से।

अमेरिका पहुंचने के हफ्तों बाद यह पहली मर्तबा हो रहा था। मेरे सारे कपड़े एक साथ अटैची से आजाद थे। मैं अपना बिखरा सामान और खाली अटैची देख निहाल थी। मेरे पास तमाम अमेरिकी शूं-शां के बाद लौटने के लिए एक घर था! अब अमेरिका और भारत के बीच एक दरवाजे भर का फासला था। घंटी बजाने पर तमन्ना दरवाजा खोलती और मैं अपने देश लौट आती, जहां गर्म मसाले, देसी घी, पापड़, सेवइयां, चीवड़ा, अचार, दूध वाली चाय, यहां तक कि पकौड़ियों की खुशबू भी आती थी। दूसरी ओर, मैं बस कुछ जींस-टॉप लेकर विदेश आ गई थी, लेकिन तमन्ना अपने संग कुछ बांग्लादेश भर कर लाई थी। उसी में से मैंने अपना भारत पा लिया। अब तमन्ना के लाए स्वदेश से हम दोनों गुजारा करते। कभी-कभी तमन्ना नाराज भी होती कि ‘काश तुममें अक्ल होती! अपने संग कुछ भारत लाई होती तो चाय के दो कप हर रोज और बन जाते। पकौड़ों पर चाट मसाला पड़ जाता और पापड़ की सब्जी बना पाते।’

एक बार दोस्तों की एक महफिल जमी। जेरेको ताइवान से, लारा दुबई, एड्रिआना पैरागुए, जैक अमेरिका से। बहरहाल, आठ-नौ देशों के लोग, न जाने क्या धुन चढ़ी कि एक के बाद एक अपने-अपने देश का संगीत सुनवाया जाने लगा। मिस्सी अदीवा को मैं नहीं जानती थी। उसने अपना गाना शुरू किया- ‘आपे जाहिर आपे बांटी आपे लुक लुक बेंदा है…!’ अरे… ये तो नुसरत हैं! बुल्लेशाह! ‘क्या बात करते हो यारों, बेहद रमजा दसदा मेरा ढोलण माही…’ सुनते हुए तो मेरी रातें गर्द हुई हैं। ओह! मैं अदीवा से लिपट जाना चाहती थी। पर ऐसा प्यार जताते मुझे अटकन होती है। मन मेरा लिपट लिया था।

यह मेरा संगीत है। ‘विकीपीडिया’ को क्या मालूम, कौन जी हलकान करता है किसके पीछे। ‘गूगल’ का दिल नहीं है जो समझे कि ये कव्वाली हिंदुस्तानी कैसे न हुई और पाकिस्तानी क्यों हुई! अदीवा की मुस्कान मेरी बेचैनी पर सहमत थी। आखिर एक जमाने में उसने लता के गीत गुनगुनाए थे। बात दो कदम बढ़ी कि पता चला अदीवा की मां बनारस से हैं। मैं जब पहली दफा घर में दाखिल हुई तो वे समोसे तल रही थीं। समोसों और हरी चटनी के साथ बनारस! ड्राइंग रूम की बड़ी खिड़की से पीठ करके बैठ जाओ तो भारत में हो। उनके मां-पिताजी बनारसी थे, लेकिन खुद कभी फुर्सत न हो पाई। पर ख्वाब हैं। कोई मंसूबे बांध दे तो देख लें वे गलियां जहां से बचपन भर गुजरी। बनारस के रिक्शे, गलियों, घाटों, पुलों और इंसानों की तस्वीर कहानियों से खींच रही थी। मैंने उन्हें चाची बोला, क्योंकि वहां बैठे परिवार के कुछ बच्चे चाची ही कह रहे थे। मेरे मेंटर लिएंडर का सवाल कान के पर्दे पर मृदंग बजाता- ‘फर्क क्या है?’

आर्ट-एशिया में घूमते तो हमें क्या, सैकड़ों लोगों को भी नहीं लगता था कि फर्क है! जब भी समोसे खाने का मन होता तो ‘चटनीज’ में घुस जाते। दिल्ली, असम, केरल के खाने में फर्क होगा, लेकिन जनाब लाहौर के रसोइए अमेरिका में ठीक वैसा ही समोसा छानते हैं, जैसा दिल्ली में मेरी गली के किनारे वाली दुकान पर तला जाता है। गंगादीन की दुकान, जिस पर बड़ा-बड़ा लिखा है- ‘इंडियन एंड पाकिस्तानी फूड!’ इन सबने क्या कुफ्र फैलाया है कि अपने नामों के नीचे लिख रखा है- इंडिया, पाकिस्तान फूड- साथ-साथ! यहां भारतीय, पाकिस्तानी, श्रीलंकाई, बांग्लादेशी बहुतायत में मिल जाते। उन्हीं का बाजार, वही खरीदार। हर दुकान पर दो नाम तो साथ-साथ जरूर ही हैं- भारत, पाकिस्तान। ये सब दुकानें हमें यों बुलातीं जैसे हम ‘एलिस’ हों। यकीनन, हमारा ‘वंडरलैंड’ इन्हीं दुकानों के पीछे था!

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