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दुनिया मेरे आगे: तर्क का हिसाब

कुछ समय पहले एक स्कूल में मैं शिक्षकों से ही बातचीत कर रही थी। काफी देर बात होने के बाद उन्होंने कहा कि कुछ देर यहां के बच्चों से भी चर्चा करें तो उन्हें अच्छा लगेगा।

Author June 28, 2018 3:30 AM
सीधी और सरल बात यह है कि इस एक अंक के अंतर पर बच्चों का ध्यान क्यों नहीं जा पाया या वे इस पर गौर क्यों नहीं कर पाए कि आधा और आधा का जोड़ एक होगा।

प्रेरणा मालवीया

कुछ समय पहले एक स्कूल में मैं शिक्षकों से ही बातचीत कर रही थी। काफी देर बात होने के बाद उन्होंने कहा कि कुछ देर यहां के बच्चों से भी चर्चा करें तो उन्हें अच्छा लगेगा। आगे उन्होंने कहा कि हमारे यहां के ज्यादातर बच्चे किताब पढ़ लेते हैं और गणित में चार अंकों के जोड़-घटाव के सवाल भी हल कर लेते हैं। मेरे लिए बच्चों से मिलने का प्रस्ताव खुशी की बात थी। मैं कक्षा तीन में गई और बच्चों को अपना नाम बताया। उसके बाद बातचीत शुरू हुई। उस दौरान उन्होंने मुझसे भी कई सवाल किए। इस बीच कक्षा की दीवार पर टंगी महात्मा गांधी की तस्वीर ने मेरा ध्यान खींचा।

मैंने बच्चों से पूछा कि ये कौन हैं? कुछ बच्चों ने सही जवाब दिया और कुछ खामोश रहे। महात्मा गांधी के बारे में कुछ और बातों के बाद जब मैंने पूछा कि अगर उनका जन्म 1869 में हुआ था और मृत्यु 1948 में तो वे कितने वर्ष जीवित रहे तो बच्चे कुछ देर सोचते रहे। फिर कॉपी-पेन निकालने लगे। मैंने उन्हें यों ही बताने के लिए कहा तब एक बच्चे ने कहा दो सौ साल। फिर किसी ने तीन सौ साल बताया तो किसी ने ढाई सौ साल। मैंने बच्चों से पूछा कि क्या कभी कोई इंसान इतने साल जिंदा रह सकता है, तब इस पर बच्चों ने कहा ये तो नहीं होता है। एक बच्चे ने कहा कि अगर आपने कॉपी में हिसाब करने दिया होता तो हम सही बताते। इसके बाद उस कक्षा के शिक्षक आए और उन्होंने कुछ बच्चों को हिंदी की किताब का पाठ करवाया और गणित के सवाल दिए। बच्चों ने किताब का पाठ अच्छे से किया और गणित के सवाल तुरंत हल कर दिए।

इस घटना ने पढ़ने-पढ़ाने की कई परतों को उधेड़ा। मेरा उद्देश्य यहां उस प्रक्रिया के बारे में बात करना है, जिसके कारण बच्चों की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया आई। दरअसल, हमारे यहां पढ़ाने का तरीका ऐसा होता है कि जो वास्तव में होना चाहिए वह पीछे रह जाता है या छूट जाता है। अगर किसी का जन्म लगभग अठारहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ है और उसकी मृत्यु उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में हुई है तो वह लगभग सौ साल के आसपास ही जीवित रहा। मगर विषयों को इतने यांत्रिक तरीके से पढ़ाया जाता है कि बच्चे बस उसको रट कर याद भर कर लेते हैं। मसलन, बच्चों को नौ में से तीन कम करने को कहा जाए तो वे गणना करके छह बताएंगे। लेकिन फिर उसी समय नौ में से चार कम करने को कहा जाए तो बच्चे फिर से गणना करना शुरू कर देते हैं। जबकि पहले उत्तर में बस एक और कम करना था, सही उत्तर आ जाता। इसी तरह, मैंने आधा और आधा का जोड़ पूछा तो बच्चे शांत रहे।

सीधी और सरल बात यह है कि इस एक अंक के अंतर पर बच्चों का ध्यान क्यों नहीं जा पाया या वे इस पर गौर क्यों नहीं कर पाए कि आधा और आधा का जोड़ एक होगा। इसी तरह से हिंदी में गाय के निबंध के दस वाक्य के अलावा नया ग्यारहवां वाक्य अभी तक क्यों नहीं आया! सामाजिक विज्ञान की कक्षा में हम ग्रहण के बारे में तमाम जानकारी पढ़ तो लेते हैं, मगर जब ग्रहण का वक्त आता है तो हम अपने घर में पानी के बर्तनों में तुलसी के पत्र डालते हैं हानिकारक किरणों के दुष्परिणाम से बचने के लिए। यहां सोचने वाली बात यह है कि अगर हानिकारक किरणों का प्रभाव पड़ता होगा तो वह हमारे घरों से ज्यादा बाहर खुले में नदी, तालाब, कुएं, पोखर, बावड़ी आदि पर पड़ेगा, क्योंकि किरणें उनके सीधे संपर्क में आएगी। लेकिन धारणाएं हमारे दिमाग में इस कदर बैठी होती हैं कि हम विज्ञान के तथ्यों पर गौर नहीं करते।

सवाल यह है कि हम कक्षा में बच्चों को अनुमान लगाने, तर्क और कल्पना करने, सोचने-विचार करने के कितने अवसर देते हैं! ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हम कितने यांत्रिक तरीके से पढ़ना-लिखना सीखते हैं। इसी कारण गणित की बहुत छोटी-सी बात के लिए बच्चे को फिर से पूरी कवायद करनी पड़ती है। यह प्रक्रिया सालों से चली आ रही है। हम भी ऐसे ही पढ़े हैं और जब बच्चों को पढ़ाने की बारी आती है तो उन्हें भी ऐसे ही पढ़ाते हैं। शिक्षण विधियों में प्रशिक्षण भी इसी तरह से पूरे हो जाते हैं। मगर आगे चलकर इसके परिणाम क्या होते हैं, यह शायद बहुत कम लोग सोच पाते हैं। हममें से बहुत से लोग विशेष परिस्थितियों में ठीक से निर्णय नहीं ले पाते हैं। तर्क की बुनियाद पर नहीं सोच पाते या सही अनुमान नहीं लगा पाते हैं। तब हमारी यह मुश्किल किसी और रूप में देखी जाती है। जबकि मुश्किल विषयों को पढ़ाने के तरीकों से उपजी है।

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