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हम ही आदि अनंत

क्या हम अनंत हैं या उससे जुड़े हुए हैं? यह प्रश्न उतना ही गंभीर और महत्त्वपूर्ण है जितना हमारा अस्तित्व।

हम ही आदि अनंत
सांकेतिक फोटो।

लोकेंद्रसिंह कोट

हम अगर अपनी वंश-बेल को ही देखें तो पता चलता है कि हम अनंत से ही आए हैं। हमें ज्यादा से ज्यादा परदादा के परदादा तक का नाम पता होगा, उसके पहले का नहीं, लेकिन हम आए तो उसी वंश-बेल से न! तो हमारे अंदर कितने लोगों के डीएनए होंगे, शायद अनंत। इस सृष्टि में देखा जाए तो सब कुछ अनंत से जुड़ा है। हर वस्तु, सजीव या निर्जीव, के भीतर परमाणु और उसके अंदर इलेक्ट्रान-प्रोटान-न्यूट्रान और उसके अंदर बोसान और उसके आगे के तत्त्व शामिल हैं। हम इस समय पृथ्वी के एक भूभाग पर भी हैं और इस ब्रह्मांड में भी हैं, जो कि अनंत है। एक बीज अपनी कितनी यात्रा करके फिर से अनंत बीजों को जन्म देने के लिए तैयार होता है। उसमें समाहित हैं अनंत फल और फूल।

अनंत को अंग्रेजी के आठ अंक को आड़ा करके अभिव्यक्त किया जाता है। अनंत दिवस को प्रत्येक वर्ष के आठवें माह की आठवीं तारीख को मनाया जाता है। यह प्रतीक है उन आठ ग्रहों का। आठ मिनट में ही सूर्य से रोशनी धरती तक पहुंचती है। कहा जाता है कि ईश्वर ने हमें अनंत देने के लिए इस धरती पर भेजा है, लेकिन हम छोटी-छोटी बातों में ही उलझे रह जाते हैं।

अनंत भी अपने आप में रहस्य है, जैसे हमारा जन्म और मृत्यु भी एक रहस्य है। जन्म के पहले हम कहां थे और मृत्यु के बाद हम कहां जाएंगे, ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अभी विज्ञान के पास भी नहीं है। अनंत शब्द सुपरिभाषित है, लेकिन दूसरी दृष्टि से देखें तो उतना ही अस्पष्ट और अपरिभाषित है। पर अध्यात्म में सब कुछ विश्लेषित है। इसलिए ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की कई व्याख्याएं हो सकती हैं। इसका एक अर्थ है, ऐसा सत्य जो सब में व्याप्त है और उसकी अभिव्यक्ति भी अनंत है। इसे ही आदिग्रंथ वेद में ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति’ कहा गया है। हर चीज ‘नेति नेति’ है, इसलिए वह अनंत है।

नेति यानी ‘न इति’- जिसका अंत नहीं है। दार्शनिक इमैन्युअल कांट के अनुसार, ‘अगर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के परिदृश्य को सही नहीं माना जाए, तब किसी भी घटना के पहले की समयावधि स्वाभाविक रूप से अनंत होगी और अगर ब्रह्मांड की उत्पत्ति के परिदृश्य को सही माना जाए तब ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले का समयांतराल अनंत होगा।’ यही कथन आर्यभट्टीय के तीसरे अध्याय काल-क्रिया-पाद का ग्यारहवां श्लोक भी कहता है- काल अनादि और अनंत है।

ऐसा कहा जाता है कि बुद्धि से अनंतता को न समझा और न ही अनुभव किया जा सकता है। इसके लिए ध्यान मार्ग ही श्रेष्ठ बताया गया है। अनंत होती है हमारी चेतना और उससे निकलने वाले विचार। किसी को नहीं पता कि कल क्या होगा, लेकिन अनंत में कहीं न कहीं समाहित है इसका उत्तर। इसलिए साधना के माध्यम से आगे होने वाली घटनाओं को कई लोग जान लेते हैं। अगर देखें तो अपना जीवन भी अनंत की तलाश में ही होता है। अनंत धन, अनंत सुख, अनंत वासना, क्योंकि एक वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति सुख दे देती है, लेकिन वह कुछ समय के लिए ही होता है, क्योंकि एक सीमा तक ही हम वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति में खुश रह पाते हैं। इसके बाद फिर नए की तलाश। यह तलाश कभी खत्म नहीं, अनंत होती है, इसलिए अनंत दुख, अनंत शिकायतें हमारे जीवन का अंग बन जाती हैं। विचार करने पर लगता है कि संयम, संतोष, तृप्ति, वैराग्य का अविर्भाव इसी अनंत को समेटने के लिए हुआ है।

स्वयं वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति हमेशा बदलती रहती है और जो खुद बदलती रहती है वह कैसे किसी को संयम, संतोष, तृप्ति, वैराग्य के भाव जगा सकती है। इसलिए जो अनंत का तत्त्व हमारे अंदर विद्यमान है, जिसे आत्मा, परमात्मा कहा जाता है उसी से साक्षात्कार करना हमें संयम, संतोष तृप्ति, वैराग्य के भाव ला सकता है, क्योंकि गीता में कहा गया है कि आत्मा आदि और अनंत है, वह किसी भी माध्यम से समाप्त नहीं हो सकती है और वह समय के बंधन में भी नहीं है।

आदि-अनंत का विस्तार ही हमारी चेतना का विस्तार है। अनंत से हमारा जन्म हुआ है और इसी अनंत में हमें समा जाना है, यही सृष्टि का भी अर्थ है। इसलिए देखिए न, हम कुछ भी पकड़ कर नहीं रख सकते। चाहे वह अच्छा मौसम हो, व्यवहार हो, मिजाज हो, अच्छे-खराब भाव हों, अच्छा-खराब स्वाद हो, सबको छोड़ना ही होता है। छोड़ना हमें आए या न आए, यह प्रकृति ज्यादा देर तक हमें कुछ भी रखने ही नहीं देती है। अनंत उपजता भी शून्य से है और विसर्जित भी शून्य में हो जाता है।

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First published on: 26-09-2022 at 07:24:41 am
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