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दुनिया मेरे आगेः सूखती धरती

गांव का अपना तालाब हमारे बाबा मिट्टी से भरवा रहे हैं। वे अब यहां पर मकान बनवाएंगे और उसे किराए पर लगाएंगे। उन्हें इससे अच्छी आमदनी होगी। पोखर-तालाब से क्या होता है!

Author October 4, 2018 2:55 AM
पहले के जमाने में लोग खेतों में सिंचाई के लिए बोरिंग नहीं लगवाते थे। वे नहर, नदियों और तालाबों से पानी खींच कर खेत की सिंचाई कर लेते थे।

चंदन कुमार चौधरी

गांव का अपना तालाब हमारे बाबा मिट्टी से भरवा रहे हैं। वे अब यहां पर मकान बनवाएंगे और उसे किराए पर लगाएंगे। उन्हें इससे अच्छी आमदनी होगी। पोखर-तालाब से क्या होता है! जमीन परती-परांत यानी बिना फसल के खाली पड़ी हुई है। सड़क किनारे का तालाब है, इसलिए लोग मछली भी नहीं होने देते हैं। इस पर मकान रहेगा तो आमदनी अधिक होगी। बाबा जैसे न जाने कितने लोग हैं, जिन्होंने बीते पच्चीस-तीस सालों के दौरान गांव-समाज का अपना पोखर-तालाब भरवा दिया। वह इलाका जहां ‘पग-पग पोखर माछ मखान’ की कहावत मशहूर है, उसके जिला मुख्यालयों में ‘शुद्ध जल’ के नाम पर अब बोतलबंद पानी धड़ल्ले से बिक रहा है और लोगों ने अपने घरों में पानी साफ करने के लिए फिल्टर लगवा लिए हैं। गरमी के महीनों में तो चापाकल से काफी मशक्कत से पानी निकल पाता है।

हमारे यहां एक कहावत है, जिसका अर्थ होता है कि जो आदमी यशस्वी, प्रतापी और परोपकारी होगा, वह जलस्रोत यानी पोखर या तालाब खुदवाएगा। जब तालाब खुदवाया जाता था तो जश्न जैसा माहौल हो जाता था। गाजा-बाजा और धूमधाम के साथ तालाब खुदवाया जाता था। लेकिन अब ऐसा लगता है कि हम जलस्रोतों को समाप्त कर विनाश को बुलावा देने के काम में लगे हुए हैं। गांव में इस बार एक पड़ोसी को चापाकल गड़वाते समय काफी परेशान देखा था। कह रहे थे कि काफी महंगाई का जमाना आ गया है। ऊपर से चापाकल गड़वाने में खर्च भी ज्यादा आ रहा है। पुराने चापाकल से पानी के साथ बालू निकलने लगा तो मजबूरन नया लगवाना पड़ रहा है। कमला नदी के किनारे घर है। किसी दौर में सिर्फ साठ फुट पर ही पीने लायक पानी का स्तर मिल जाता था, लेकिन अब सवा सौ फुट से कम पर नहीं मिलता है। ऐसे में खर्च भी काफी बढ़ जाता है।

पहले के जमाने में लोग खेतों में सिंचाई के लिए बोरिंग नहीं लगवाते थे। वे नहर, नदियों और तालाबों से पानी खींच कर खेत की सिंचाई कर लेते थे। वैसे अच्छी-खासी बारिश और खेती होती थी हमारे इलाके में। बाद के दिनों में लोगों ने धरती का सीना चीर कर उसमें से बोरिंग से पानी निकालना शुरू कर दिया। लोगों का मानना है कि हाल के वर्षों में बारिश भी कम होने लगी है। इसके कारण गेहूं की पूरी फसल तो सिंचाई पर निर्भर है ही, धान की खेती के लिए भी बोरिंग से पानी निकालना पड़ता है। ऐसे में खेती एक महंगा सौदा होने लगी और इलाके के लोगों का इससे मोहभंग होना शुरू हो गया। अगर यह स्थिति कायम रही तो भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है।

एक समय था जब हमारे गांव में काफी संख्या में पोखर, तालाब, डबरा और कुआं था। गांव के बगल से नदी गुजरती है और उससे सिंचाई के लिए एक नहर निकाला गया था। लोग कुएं का मीठा पानी पीते थे और नदी में नहाते थे। हालांकि समय के साथ चापाकल और अब नलों ने इसका स्थान ले लिया है। यहां पानी की कोई कमी नहीं थी। ऐसा कहा जाता है कि जहां अधिक पानी हो, वहां प्रवासी या सैलानी पक्षी आते हैं। हमारे इलाके में भी सैलानी पक्षी आते थे। लेकिन अब ये बातें पुरानी होने के साथ-साथ बच्चों को कहानी सुनाने के काम आने लगी हैं। हमारी एक रिश्तेदार के गांव में 1990 के दशक तक तालाब के पानी से खाना बनाया जाता था। उस तालाब की साफ-सफाई पर गांव के लोग काफी ध्यान देते थे। पानी इतना साफ था कि कोई सवाल नहीं। पिताजी बताते हैं कि एक जमाने में कमला नदी का पानी बहुत साफ था और जब लोग भैंस चराने के लिए दूर खेतों में जाते थे तो नदी और तालाब का ही पानी पीते थे। कभी किसी को कोई बीमारी नहीं हुई। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है। लोग अब चापाकल का पानी पीते हैं। गंदगी और प्रदूषण के कारण पर्व-त्योहार पर भी नदी-तालाब में नहाने को तैयार नहीं होते।

दरअसल, हमने पानी की कीमत नहीं समझी और उसका दुरुपयोग किया है। शायद यह सब उसी का नतीजा है कि कभी सदानीरा क्षेत्र के रूप में मशहूर इस इलाके को भी पानी के बारे में सोचना पड़ रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि कभी बिल्कुल शुद्ध मानी जाने वाली गंगा अब हरिद्वार में ही काफी प्रदूषित हो चुकी है। आखिर इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? हम नदी को मां कहते हैं। लेकिन उसके प्रति हम कितने उदासीन हो गए हैं! याद रखना चाहिए कि हमें प्रकृति से उतना ही लेना है, जितने की हमें जरूरत है। नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा जब प्रकृति का कोष रिक्त हो जाएगा और उसके पास हमें देने के लिए कुछ नहीं बचेगा।

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