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आदतों का सफर

पुरानी कहावत है कि इंसान आदतों पर जीने वाला जीव यानी ‘क्रीचर आॅव हैबिट’ है। हम जो कुछ करते हैं, देर-सबेर या तो वह किसी नई आदत का कारण बन जाता है या पहले से बनी किसी आदत का नतीजा होता है।

सांकेतिक फोटो।

चैतन्य नागर

पुरानी कहावत है कि इंसान आदतों पर जीने वाला जीव यानी ‘क्रीचर आॅव हैबिट’ है। हम जो कुछ करते हैं, देर-सबेर या तो वह किसी नई आदत का कारण बन जाता है या पहले से बनी किसी आदत का नतीजा होता है। दुष्यंत कुमार तो माशूका को भी एक आदत मान कर अपने एक शेर में कह देते हैं- ‘एक आदत-सी बन गई है तू, और आदत कभी नहीं जाती’।

कई आदतों से तो हम परिचित होते हैं, जबकि कई ऐसी भी होती हैं जो मन के अचेतन, अंधेरे कोने में कहीं छिपी रहती हैं। आदतें अक्सर जीवन को यांत्रिक, बोझिल और उबाऊ बना देती हैं। कई अजीबोगरीब आदतें हम पाल लेते हैं। जैसे सोते-बैठते हमेशा एक तकिये को अपने साथ रखना, बाहर जाते हुए हाथ में छाता जैसा कोई भी सामान टांग लेना, नाखून चबाना, एक ही बात को कई बार दोहराना, पुरानी किताबों या पेट्रोल को बार-बार सूंघना, दिन में कई बार हाथ धोते रहना, किसी शब्द या वाक्य को अपना तकियाकलाम बना लेना वगैरह। ये उतनी नुकसानदेह नहीं। पर आदतें जब व्यसन का रूप ले लेती हैं, तो उनसे मुक्ति और कठिन हो जाती है। सेहत चौपट होती है अलग से।

नौकरी करने की आदत इतनी गहरी होती है कि सेवानिवृत्ति के बाद जीवन में उतरे खालीपन का सामना करना मुश्किल हो जाता है। कोई काम न मिलने और अचानक ‘अनुपयोगी’ हो जाने के तनाव से कई लोग सेवानिवृत्ति के बाद जल्दी ही दुनिया से विदा ले लेते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद जल्दी ही होने वाली मृत्यु को लेकर कई गंभीर शोध भी हुए हैं।

आदतें जल्दी छूटतीं क्यों नहीं? एक वजह तो यह है कि हम उन्हें छोड़ने के बारे में बड़े ही चयनात्मक होते हैं। सुख देने वाली आदतों को बचाए रखना चाहते हैं और जो दुख देती हैं, उनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। आदतों के संबंध में एक और खास बात है कि हम अक्सर उन्हें छोटी उम्र में ही जाने-अनजाने में पाल लेते हैं। धीरे-धीरे वे हमारे मन की गहरी परतों में जड़ें जमा लेती हैं और जब तक हमें उनके खतरे का आभास होता है, तब तक वे मजबूत हो चुकी होती हैं और उनसे निजात पाना कठिन हो जाता है। नशे की आदत अक्सर इसी श्रेणी में आती है।

अमेरिकी लेखक फॉस्टर वॉलेस ने आदतों का गहरा अध्ययन किया है। वे कहते हैं कि हम अक्सर अनगिनत अचेतन आदतों के साथ ही अपना जीवन बिताते हैं और उनके बारे में हमें पता भी नहीं होता। हम जो भी सोचते और करते हैं, फैसले करते हैं, कपड़े पहनते हैं, क्या, कब और कितना खाते हैं, हमारा जागना और सोना, हमारे साथी-संगी सभी हमारी चेतन-अचेतन आदतों की ओर ही इशारा करते हैं।

वॉलेस का कहना है कि कुछ आदतें सरल और कुछ जटिल होती हैं, पर वे यह भी मानते हैं कि आदतों की ऊर्जा बड़ी लचीली होती है। वे उतनी अपरिवर्तनीय नहीं होतीं, जितनी दिखती हैं। कोई शराबी नशे के दुष्परिणामों के बारे में सोचे-समझे तो शराब छोड़ भी सकता है। टूटे हुए परिवार फिर से जुड़ जाते हैं, स्कूल में ही पढ़ाई छोड़ देने वाला बच्चा नई आदतें डाल कर एक सफल कारोबारी या संगीतकार भी बन सकता है। वॉलेस कहते हैं कि आदतों के बदलने या छोड़ने में इच्छाशक्ति की उतनी अधिक भूमिका नहीं होती, जैसा कि अक्सर लोग सोचते हैं। आदतों की समूची प्रक्रिया को उनके तौर-तरीके और ढांचे को समझ कर ही उन्हें त्यागा जा सकता है।

आदतें निर्मित होने की एक निश्चित यात्रा होती है और ठीक वैसे ही उनको त्यागने की। नशे की आदतों से हजारों घर और जिंदगियां बर्बाद होती हैं और उन्हें समझने और खत्म करने के लिए मित्रों और परिवार के लोगों के स्नेहपूर्ण व्यवहार और पेशेवर सहायता, दोनों की जरूरत पड़ सकती है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि धूम्रपान जैसी आदत न छूटे तो कोशिश करें और पूरे होशोहवास के साथ सिगरेट पिएं।

सिगरेट की डिब्बी को निकालें, उसे खोलें, सिगरेट निकालें, उसे देखें, होठों से लगाएं, लाइटर जलाएं, सिगरेट जलाएं, धुएं को भीतर लें, महसूस करें, धुएं को बाहर आते समय देखें और महसूस करें। एक-एक हरकत को बारीकी से देखें और महसूस करें। मोबाइल और इंटरनेट की आदत पड़ गई हो तो इस पर भी यही तरीका लागू करें। दरअसल, खत्म होने से पहले हर आदत की अभिव्यक्ति का धीमा होना जरूरी है। इसके पीछे वजह यह है कि हर आदत के पीछे अतीत की बहुत बड़ी ताकत होती है और जो काम आदतन किए जाते हैं, वे बहुत जल्दी में किए जाते हैं, अक्सर बेहोशी में भी।

गौरतलब है कि हम रोज जो कुछ भी करते और सोचते हैं, उसका नब्बे फीसद हमारी आदतों का हिस्सा होता है। शायर अख्तर नजमी इसे बखूबी बयां करते हैं- ‘जिक्र वही आठों पहर, वही कथा दिन रात’। कहते हैं, आदतें एक आरामदायक बिस्तर की तरह होती हैं। उनमें घुस जाना आसान है, पर उनसे बाहर निकलना बहुत मुश्किल! पर इसे आखिरी सत्य नहीं मानना चाहिए। संकल्प, समझ, सजगता और धैर्य की ताकत के सामने कोई भी आदत लंबे समय तक नहीं चल सकती। जल्दी ही लड़खड़ा कर गिर जाती है और फिर से उठ नहीं पाती।

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