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दुनिया मेरे आगेः गुम मासूमियत

आजकल तो ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर मोबाइल का प्रयोग बहुत बढ़ गया है और माहौल में आशंकाएं घूम रही हैं कि पढ़ाई के परदे के पीछे कहीं यह प्रयोग पढ़ाई की जगह रुसवाई तो नहीं करवा रहा।

Author Published on: August 1, 2020 2:04 AM
पिछले कई महीने से फैली महामारी के बीच बच्चों के बीच इंटरनेट प्रयोग के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।

संतोष उत्सुक

उस दिन उस बच्ची का जन्मदिन था। उसके तीन बरस पूरे होने के मौके पर घर पर पूजा रखी गई थी और जान-पहचान वालों को खाने पर भी बुलाया गया था। यह न्यूजीलैंड में बसे एक भारतीय परिवार का आयोजन था। पूजा संपन्न होने पर सभी ने खाना खाया फिर केक काटने का कार्यक्रम होना था। बच्ची के पिता ने उसे गोद में उठाया और कहने लगे कि चलो बेटे, केक काटते हैं। बच्ची के हाथ में उसका सबसे प्रिय खिलौना और साथी यानी मोबाइल था। उसकी मां और पिता ने अनगिनत कोशिशें कीं, लेकिन बच्ची ने केक की तरफ ढंग से देखा तक नहीं। घर में आए मेहमानों में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक-दो अन्य महिलाओं ने भी कोशिश की, लेकिन मोबाइल ने बच्ची को और बच्ची ने मोबाइल को नहीं छोड़ा। आखिरकार उसके पिता ने उसका हाथ पकड़ कर ही केक काट दिया।

केक खाने में भी बच्ची को ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। चंडीगढ़ में रह रही मेरे संपर्क की ही एक अन्य दस महीने की बच्ची भी जब से पैदा हुई घर पर ही है। उसकी मां और पिता घर से काम करते हैं। धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बड़ी तेजी से इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स और मोबाइल इस बच्ची की जिंदगी में जगह बना रहे हैं। पिछले एक महीने से उसे एसी और टीवी चलाने वाले बटन का ज्ञान हो गया है। उसने टीवी चैनल पर प्रसारित हो रहे गाने पर बड़े शौक से हल्का-फुल्का नृत्य करना सीख लिया है। उससे मोबाइल पर बात की जाए या सीधे-सीधे, वह मोबाइल पकड़ने दौड़ती है और न मिले तो गुरार्ती है।

पिछले कई महीने से फैली महामारी के बीच बच्चों के बीच इंटरनेट प्रयोग के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। नौकरी करने वाले जिन युवा दंपतियों के साथ उनके अभिभावक नहीं रहते, वे व्यस्त रहने के कारण नहीं, वास्तव में अपने जीवन के समय नियंत्रण में नाकाम हो जाने के कारण ही मोबाइल बच्चे के हवाले कर देते हैं। वे न चाहते हुए भी ऐसा करते हैं। उनके सामने जीवनयापन के लिए धन अर्जन करना प्राथमिकता होती है। लेकिन बड़े होते बच्चों की आंखें, अंगुलियां और दिमाग किन अंधेरी गलियों में संतुष्टि का उजाला ढूंढ़ते हुए जख्मी होने लगती हैं, उन्हें पता तो होता है, लेकिन वे शायद महसूस नहीं करना चाहते। स्थिति यह हो गई है कि अधिकतर परिवारों के बच्चे दिनोंदिन कम होते जा रहे मेहमानों से बातचीत तो क्या औपचारिक नमस्ते भी नहीं करते। उनके हाथ में कुछ खाने को हो तो वे उसे खाते रहते हैं, सामने टीवी चल रहा हो तो उसमें गुम रहते हैं। दुख और हैरानी की बात है कि असलियत में अभिभावकों के हाथ से स्थिति निकल चुकी होती है।

आजकल तो ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर मोबाइल का प्रयोग बहुत बढ़ गया है और माहौल में आशंकाएं घूम रही हैं कि पढ़ाई के परदे के पीछे कहीं यह प्रयोग पढ़ाई की जगह रुसवाई तो नहीं करवा रहा। पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे मोबाइल की अन्य गतिविधियों में भी संलिप्त हो रहे हैं। नेत्र चिकित्सकों के अनुसार आंखों पर बुरा प्रभाव तो पड़ ही रहा है, ऑनलाइन पढ़ाई के साथ-साथ इंटरनेट का बढ़ता प्रयोग भी कुप्रभाव डालेगा। सबसे अहम सवाल तो यह है कि सबके पास लैपटॉप या फिर स्मार्टफोन नहीं है। फिर मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर पढ़ना ज्यादा घातक है। इसी कारण बच्चों को चश्मे लगने शुरू हो चुके हैं। इस सबसे बच्चों की नींद, खेलने का समय और अन्य गतिविधियों पर फर्क पड़ रहा है। यह स्पष्ट है कि हमारे देश में बच्चों द्वारा इंटरनेट प्रयोग पर अभिभावकों की अनुशासित रोक ज्यादा नहीं है।

सवाल यह है कि बचपन की सीमा कितने बरस तक मानी जाए। बचपन को बाल्यावस्था भी कहा जाता है। यह अवधि शैशवास्था, प्रारंभिक बचपन और मध्य बचपन से लेकर किशोरावस्था तक चलती है। बाकी काम बाद में किए जाते हैं, लेकिन पैदा होते ही सबसे पहले मोबाइल से एक नहीं, अनेक तस्वीरें खींची जाती हैं। यानी उस नन्हीं जान का मोबाइल से पहला परिचय तभी करवा दिया जाता है।

ऑनलाइन पढ़ाई को अपनी उपलब्धि मानने के चक्कर में स्कूल अगर यह समझ रहे होंगे कि बच्चे की कक्षा और उम्र क्या है, तो अच्छा है, नहीं तो यह प्रयोग निरर्थक, और एक स्तर पर नुकसानदायक साबित होगा। फिर वही वाजिब सवाल हमारे सामने आ जाएगा कि स्कूली पढ़ाई शुरू करने की वास्तविक उम्र क्या है और अब जबकि एक महामारी ने मानवीय जीवन की प्राथमिकताएं बदल दी हैं तो क्या बच्चों को पहले उनकी सेहत, व्यवहार और मानवीय मूल्यों जैसे विषयों में दीक्षित करना ज्यादा जरूरी नहीं है! अब तो बच्चे पैदाइशी कंप्यूटर अभ्यस्त, नर्तक या गायक भी हैं। अगर परीक्षा में पास करवाने वाली पढ़ाई कुछ महीने के लिए स्थगित हो गई तो क्या बुरा हो जाने वाला है! यह जरूर होगा कि जिस बचपन को हम दुनिया में होश संभालते ही प्रतियोगी जीवन की मारकाट, ईर्ष्या-द्वेष जैसे संस्कार देना शुरू कर देते हैं, कुछ अंतराल के लिए सुखी रहेगा। जरूरत इस बात की है कि बचपन को अच्छा बचपन बनाने में योगदान दिया जाए, ताकि बच्चों की जिंदगी में कुछ मासूमियत उगने लगे।

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