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जीवन संगीत

फिल्मों और नाटकों की प्रस्तुति में प्रसंग, वातावरण और चरित्र के अभिनय में निहित रस भाव की प्रभावी निष्पत्ति के लिए आमतौर पर संगीत का उपयोग किया जाता रहा है।

Lifeसांकेतिक फोटो।

एकता कानूनगो बक्षी

फिल्मों और नाटकों की प्रस्तुति में प्रसंग, वातावरण और चरित्र के अभिनय में निहित रस भाव की प्रभावी निष्पत्ति के लिए आमतौर पर संगीत का उपयोग किया जाता रहा है। अच्छा और प्रभावी संगीत संवादों और शब्दों का भी बेहतर विकल्प बन जाने की क्षमता रखता है। इसीलिए करुणा से भरे दृश्य में सारंगी के दुख भरे स्वर सुन कर दर्शकों की आंखें भीगने लगती हैं, दिल भर आता है। दृश्य के पार्श्व में पक्षियों के कलरव और कोयल की कूक से वातावरण में प्रकृति का सौंदर्य जीवंत हो उठता है।

आमतौर पर संगीत दृश्य में हमेशा शब्दों से पहले आता है और अंत में फिर से कोई प्रभावी धुन उस दृश्य को पूरा कर देती है। मसलन, फिल्मों के लड़ाई वाले दृश्यों में भले खलनायक खूनम-खून दिखाई दे रहा हो, लेकिन जब तक साथ में ‘ढिशुम-ढिशुम’ की आवाज नहीं आती, तलवारों की धातु टकराने की टंकार या मोटर बाइक या कार के टायरों की रगड़ या ब्रेक लगने की आवाजें नहीं सुनाई देतीं, तब तक उन दृश्यों का असली आनंद ही नहीं आता। हमारा मन यह मानने को ही तैयार नहीं होता कि कोई अच्छा एक्शन दृश्य हुआ है।

वहीं जब हीरो या हीरोइन दृश्य में दाखिल होते हैं तो पृष्ठभूमि में कोई संगीत जरूर बजता है। वास्तव में यह सब हास्यास्पद, अविश्वसनीय कहा जाएगा, लेकिन यह इस माध्यम की वह अनिवार्यता है, जिससे कला जीवंत हो उठती है। सोचने वाली बात यह है कि वास्तविक जीवन में किसी घटना या प्रसंग के घटते समय कोई बैंड या संगीतकार वहां उपस्थित नहीं होता। कोई पार्श्व संगीत नहीं चल रहा होता, फिर भी जीवन के सारे रस अपनी पूरी ताकत से वहां रिस रहे होते हैं, भावनाएं और भाव साकार हो रहे होते हैं। सच तो यह है कि हमारा मन ही दुनिया का वह सबसे प्रतिभाशाली असली संगीतकार है जो दृश्य-दर-दृश्य उपयुक्त भावपूर्ण स्वर लहरियां पैदा कर जीवन में पार्श्व संगीत बजाता रहता है। यहां तक कि हमारी खामोशी में भी पार्श्व संगीत चलता रहता है। कोई न कोई राग, सुर, ताल हमारे जीवन को आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा रहा होता है।

हो सकता है हममें से कुछ लोगों को खामोशी ज्यादा रास आती हो, पर क्या खामोशी का अपना संगीत नहीं है? प्रकृति तो लगातार कोई न कोई गीत गुनगुनाती रहती है। बंद दरवाजों और खिड़कियों से भी पार निकल पक्षियों की चहचहाहट, पवन की ‘शु-शा’ हमारे अकेलेपन में हमारे साथी बन जाते हैं। फिर उस दिल का क्या… जो हमारे भीतर हर पल अलग-अलग धुन में बजता रहता है और उसे सही सुर में बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी से हम जूझते रहते हैं।

रेडियो में उद्घोषक के रूप में काम करते हुए जो एक बात हमेशा हमें याद रखनी होती है, वह है कार्यक्रम के दौरान कभी भी ध्वनि का ‘निर्वात’, दूसरे शब्दों में कहें तो ‘पॉज’ नहीं आना चाहिए। जब उद्घोषक बोल नहीं रहा होता है या एक कार्यक्रम के बाद दूसरे कार्यक्रम के शुरू होने में कुछ समय शेष होता है तो उस ‘निर्वात’ को भी किसी मनमोहक धुन से भर दिया जाता है, जिसे रेडियो की भाषा मे ‘फिलर’ कहते हैं।

एक दिन मेरे एक कार्यक्रम में एक श्रोता ने मुझे अलग से फोन करके कहा कि ‘आज आपका कार्यक्रम, गाने, स्क्रिप्ट सब बहुत अच्छे हैं, पर आज आपकी मधुर आवाज नहीं सुनाई दे रही, जिसका हमें इंतजार रहता है।’ दरअसल, कई बार हम कुछ जरूरी काम करना भूल जाते हैं। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया। इस बार मैं अपनी आवाज के साथ पहले अपने ‘भीतर के संगीत’ को बजाना शायद भूल गई थी। अपने मन के संगीत के भीतरी स्विच को जैसे ही आॅन किया, फिर से प्रसारण में जादू होने लगा।

अपने भीतर के संगीत को कभी कम नहीं होने देना चाहिए, न उसे किसी तरह की दूसरों की अपेक्षाओं के चलते संशोधित करने की जरूरत है। यही भीतर का संगीत हमें परिभाषित करता है। ‘फिंगर प्रिंट’ की तरह हम सब की धुन अलग हो सकती है। देशज, मनमौजी, नौसिखिए… जैसा भी संगीत निकलता हो, उसे पोषित करते रहना चाहिए, खूब जोर से बजने देना चाहिए और फिर देखें यह ‘पार्श्व संगीत’ किस तरह हमें और हमारे आसपास के लोगों को चकित करता रहेगा। जीवन में रस घोलता रहेगा।

जोश और आक्रोश से भरा भीतर का संगीत कभी-कभी जब बाहर फूट पड़ता है, तब वह आंदोलन की आवाज बन जाता है। सुधार और परिवर्तन का डंका बजा देता है। एक स्वर में निकले स्वर किसी जनगीत की तरह लोगों में जोश भरने लगते हैं। अस्सी साल के दादा कचौड़ी बेचते हैं, खुद ही बनाते हैं, सुबह से दोपहर तक ठेला लगा कर खड़े रहते हैं। ऐसे कई लोग संघर्ष कर अपना जीवनयापन कर रहे है। कोई खास तरह का भोजन या काढ़ा नहीं लेते ये लोग ताकत के लिए।

इनके काम में जीवन का राग है, पार्श्व में सक्रियता और लगन का पार्श्वसंगीत खुशियां भरता है। अब जरा सुनिएगा उन आवाजों को, जो राह चलते सुनाई देती हैं, जिन पर इस तरह कभी ध्यान ही नहीं गया हमारा… आलू की कचौड़ी… दाल की कचौड़ी… चाय गरमा गरम… मीठे खट्टे बेर… कबाड़ी वाला… भांडे-बर्तन वाली..! अक्सर हम सुनते हैं इन्हें अलग-अलग सुरताल में पूरा जोर लगाते हुए निकलते हैं हमारे घरों के सामने से। यह मन की गहराइयों से निकला सक्रियता, संघर्ष और जुनून का गीत-संगीत है।

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