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दुनिया मेरे आगेः सीखने की समझ

कुछ समय पहले भोपाल में एक नाटक के मंचन के दौरान तोत्तोचान को देखने और उस पर फिर से गौर करने का मौका मिला।
Author April 21, 2017 04:00 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रेरणा मालवीया

कुछ समय पहले भोपाल में एक नाटक के मंचन के दौरान तोत्तोचान को देखने और उस पर फिर से गौर करने का मौका मिला। शिक्षा के क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से काम करने का एक लाभ यह हुआ है कि इस किताब से एक पुराना और गहरा परिचय-सा हो गया है। इसके कुछ अंशों को लेकर कार्यशालाओं में शिक्षकों के समूह के साथ कई बार बातचीत भी की है। इस कारण इसके मंचन को लेकर मन में एक शंका थी कि अपेक्षाओं की कसौटी पर वह कितना कामयाब साबित होगा। वहां मौजूद लोगों में से कितने लोग नाटक की विषय वस्तु से परिचित होंगे! मगर उस दिन वहां पहुंचे बहुत सारे लोगों के चेहरों पर तोत्तोचान के आईने में वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था से नाराजगी साफ दिखाई दी दे रही थी।

यह मेरे लिए राहत की बात थी। घर लौट कर मैंने एक बार फिर से तोत्तोचान को पढ़ा और आज के संदर्भों में उसे देखने की कोशिश की। तोत्तोचान को अपने पहले स्कूल से सिर्फ इसलिए निकाल दिया जाता है कि वह खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर से गुजरने वाले साजिंदों को आवाज देती थी और अपनी टेबल का ढक्कन बार-बार खोलती थी। उसके इस व्यवहार से कक्षा में अन्य बच्चे प्रभावित हो रहे थे। हम सबने गौर किया होगा कि हमारे घरों में भी बच्चे दिन भर में ऐसा कई दफा करते हैं और इस तरह के उदाहरण बहुत आम हैं। दरअसल, यह बच्चों के स्वभाव में शामिल है। ऐसा पहली बार कब हुआ होगा, जब किसी बच्चे ने ऐसा व्यवहार किया होगा! जब भी बच्चे कोई नई चीज देखते हैं तो उसके संपर्क में ज्यादा रहने की कोशिश करते हैं। उसे नजदीक से देखना, उलट-पलट कर समझना चाहते हैं।

मगर हम शिक्षकों और अभिभावकों के पास इतना धैर्य नहीं होता है। बच्चों का ऐसा व्यवहार अनुशासनहीनता के दायरे में मान लिया जाता है। दरअसल, हममें से ज्यादातर लोग उन्हीं बातों का ध्यान रखते हैं जो अधिकतर सुखद हों। यह एक मानवीय स्वभाव भी है। तोत्तोचान के बाल-मन को समझने के बजाय उसे स्कूल से ही निकाल दिया गया था। वह भी उस कक्षा में, जब उसने स्कूल की दहलीज पर कदम ही रखा था! लेकिन हमारे यहां बहुत सारे बच्चों से स्कूल छिन जाने की वजहें कई होती हैं। उसमें शिक्षण-पद्धति और समाज की व्यवस्था से संचालित शिक्षकों की सोच-समझ और बच्चों के प्रति पूर्वाग्रह से भरा व्यवहार भी शामिल है। आखिर क्यों हम बच्चों से उनका बचपन छीन लेते हैं और समय से पहले उन्हें बड़ा बना देते हैं। इन हालात में बढ़ते बच्चे जब अपने समाज की व्यवस्था या परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक नहीं चलते हैं तो लोगों के गुस्से का शिकार बनते हैं। दूसरे स्कूल की सकारात्मक प्रक्रिया ने तोत्तोचान को तो स्कूल में ठहरने में मदद की। मगर उसके बारे में किताब में दर्ज बातें आज भी हमें शिक्षा की दुनिया और उसमें बच्चों के बारे में बहुत कुछ देखने-समझने में मदद करती हैं।

ध्यान रखने की बात है कि सीखना किसी भी हाल में डर और भय के बीच संभव नहीं है। सीखना वास्तव में तब सहज और आसान होता है, जब बच्चा उस प्रक्रिया में सीधे शामिल हो। यह बात सिर्फ स्कूल में नहीं, बल्कि सीखने के मामले में हर जगह लागू होती है। हमारे तमाम सरकारी दस्तावेज और एनसीएफ इसी बात की वकालत करते हैं कि विषय-वस्तु बच्चों के जीवन से जुड़ी हो। बच्चों के वास्तविक जीवन और आसपास की घटनाओं से भी विषयों की अवधारणा समझाया जाए तो वे जल्दी सीखते हैं। बच्चों को उनकी बात कहने के मौके दिए जाएं। इसके लिए सायास अवसर निर्मित किए जाएं। हर बच्चे को कक्षा में समान अवसर मिले। स्कूल की पढ़ाई बच्चों के अनुभव संसार से जुड़ी हो।

फर्क बस इतना है कि हर बच्चे के सीखने की अपनी गति और अपने तरीके होते हैं। लेकिन उन्हें सिखाने के तरीके आमतौर पर सीमित होते हैं। यही वजह है कि कोई बच्चा जल्दी सीख जाता है और कोई थोड़ा समय लेता है। शिक्षण की पद्धति यह हो कि सीखने के मामले में बच्चों के बीच कोई होड़ नहीं हो, एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतिद्वंद्विता नहीं हो। बच्चों पर किसी तरह की पहचान नहीं थोप दी जाए कि फलां होशियार बच्चा है और फलां कमजोर बच्चा। मगर हमारी समस्या यह है कि बिना किसी संकोच के हम सरेआम बच्चों को इस तरह की पहचान में बांधते रहते हैं। बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर इसका कितना गहरा और नकारात्मक असर होता है, हम इसका अंदाजा भी नहीं लगा पाते। इसके नतीजे हमारे सामने हैं। परीक्षाओं के समय या रिजल्ट के बाद अवसाद में आकर बच्चों द्वारा अपनी जिंदगी तक खत्म कर लेने की घटनाएं आज एक जटिल त्रासदी बन चुकी हैं। विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर गया भी है। लेकिन सब जानते हुए भी इस दिशा में हम अब तक कुछ ठोस नहीं कर सके हैं।

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  1. P
    pinkesh rao
    Apr 21, 2017 at 11:51 pm
    concept
    (0)(0)
    Reply
    1. P
      pinkesh rao
      Apr 21, 2017 at 11:49 pm
      I also read tottochan and i think this concepy change the entire education system , but it hard to applicable, in present situation of India .................................................................................
      (0)(0)
      Reply