डोर भरोसे की

मानव जीवन में भरोसे का होना बहुत जरूरी है।

सांकेतिक फोटो।

कुंदन कुमार

मानव जीवन में भरोसे का होना बहुत जरूरी है। भरोसा रिश्तों को जोड़ कर रखता, उन्हें प्रगाढ़ बनाता और स्थायित्व देता है। स्वावलंबी बनने के लिए हमें औरों पर नहीं, बल्कि खुद पर भरोसा करना चाहिए। बचपन से हमें यही सिखाया गया है। कई दफा अपने आस-पड़ोस में लोगों को कहते सुना है कि आसमान में उड़ने वाली चिड़िया अपने पंखों पर भरोसा करके ही जमीन से नीले आसमान तक का सफर तय करती है। शेर अपनी शक्ति की बदौलत ही ‘जंगल का राजा’ कहलाता है। हिरण अगर अपने पैरों पर भरोसा न करे तो उसका जंगल में रहना दुश्वार हो जाएगा। यानी खुद पर भरोसा करके ही प्राणी विफलता को मात देकर सफलता का उच्चतम प्रतिमान स्थापित कर सकता है। जीवन के हर इम्तिहान में हम खुद पर भरोसा करके ही सफलता का परचम लहरा पाते हैं। खुद पर अगर हमें भरोसा न हो तो हम अपने जीवन में कोई भी कार्य विश्वासपूर्वक नहीं कर सकते और अविश्वास के साथ किए गए कार्य की सफलता कम होती है।

निस्संदेह खुद पर भरोसा करना सर्वोत्तम है, पर मानवीय रिश्तों की बुनियाद सिर्फ खुद पर नहीं, एक-दूसरे के भरोसे पर टिकी होती है। दो लोगों के रिश्तों में प्रेम का रंग गाढ़ा तभी होता है, जब एक-दूसरे पर विश्वास और भरोसा हो। अक्सर निजी जिदंगी में देखने को मिलता है कि प्रेमी-प्रेमिकाओं की जोड़ियां सामाजिक बंदिशों और पारिवारिक दबावों के विरुद्ध बगावत का बिगुल फंूक, एक-दूजे के साथ अपनी अलग दुनिया बसा लेती हैं, जो नफरतों के महल से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए कर पाते हैं, क्योंकि उन्हें एक-दूसरे पर भरोसा और विश्वास होता है।

भारतीय समाज में पति-पत्नी का रिश्ता काफी पवित्र माना गया है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि शादी का बंधन सिर्फ एक जन्म का नहीं, सात जन्मों का होता है। मुसलिम समुदाय में शादी के वक्त खुदा को साक्षी मान कयामत तक साथ निभाने का वादा किया जाता है। पर सभी समुदायों में तलाक जैसी समस्या ने अपनी गहरी पैठ बना ली है, जो दंपति के बीच कमजोर होते भरोसे की डोर को परिलक्षित करती है। आखिर तलाक की तह में क्या है? रिश्तों में बिलगाव की ऐसी समस्या क्यों उत्पन्न होती है? जन्म-जन्मांतर तक साथ न छोड़ने का वादा करने वाले लोग एक ही झटके में सारी कसमें-वादों से मुंह मोड़ एक-दूसरे को जीवन के रेगिस्तान में तड़पने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।

रिश्तों के इस बिलगाव का महत्त्वपूर्ण कारण है भरोसे के पुल का भरभरा कर टूट जाना। बहुत उम्मीद और भरोसे से मां-बाप अपने संतानों की परवरिस अपने खून-पसीने का सौदा करके करते हैं। खुद फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं, लेकिन बच्चों के लिए ब्रांडेड कपड़े खरीदते हैं, ताकि उनकी शानो-शौकत में कोई कमी न आए। मां-बाप भूखे रह कर भी अपने बच्चों को कभी भूखे पेट सोने नहीं देते। सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों वे इतना त्याग करते हैं? क्योंकि उनको यह भरोसा होता है कि जब वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर होंगे, तब उनकी संतान उनके बुढ़ापे की लाठी बन कर उन्हें सहारा देगी और इसी भरोसे पर वे अपनी संतानों की परवरिस करते हैं। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देकर इस लायक बनाते हैं कि भविष्य में उन्हें किसी के आगे जीविकोपार्जन के लिए हाथ न पसारना पड़े। अपनी संतानों पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले माता-पिता के भरोसे का भ्रम तब टूटता है, जब वे न चाहते हुए भी अपने जीवन की अंतिम अवस्था में वे या तो किसी वृद्धाश्रम में आश्रय लेने को मजबूर होते हैं या फिर उनका बुढ़ापा अपनों से बिछुड़ कर अकेलेपन के दंश में गुजरता है।

दरअसल, यह मान लेना ही सबसे बड़ी गलतफलमी है कि मनुष्य हमेशा एक-सा रहता है। सच्चाई इसके उलट है। उसमें सतत परिवर्तन होता रहता है। हमें प्रकृति के नियमों के अनुसार खुद को बदलना भी चाहिए। पर बदलाव सकारात्मक हो, इसका खयाल जरूर रखना चाहिए। किसी के भरोसे का कत्ल कर देना बदलाव का परिचायक कदापि नहीं हो सकता।

हम जीवन भर जिस विश्वास के भरोसे अपने रिश्तों को संजो कर रखते हैं, उसे टूटने में महज कुछ क्षण लगते हैं और एक बार भरोसा टूट जाने के बाद हम आसानी से किसी दूसरे व्यक्ति पर भरोसा नहीं कर पाते हैं। रिश्तों में जब अविश्वास पैदा हो जाए तो हम अपनों को भी पराया समझने लगते हैं, जिसके चलते अपनों से बिलगाव पैदा हो जाता है। भरोसा परिवार, समाज या किसी संस्थान को एकता के सूत्र में बांध कर रखता है। एकता के सामने कोई आफत टिक नहीं पाती है। एकता विकास का परिचायक है। जीवन में आफत के जंजाल से बचने के लिए समाज और परिवार में एकता जरूरी है। एकता के लिए रिश्तों में ईमानदारी जरूरी है। विश्वास और भरोसे पर खरा उतर कर, रिश्तों के बिखराव को बचा कर सुकून से जिया जा सकता है।

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