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दुनिया मेरे आगे: सर्द संवेदनाएं

आजकल मौसम का क्या रंग है, यह तो सभी जानते हैं, लेकिन इसी के बीच हम सबका जीवन चलता रहता है। हम मनुष्यों का और हमारे अलावा जीव-जगत में मौजूद सभी पशु-पक्षियों आदि का।

Birdसांकेतिक फोटो।

इसी बीच के एक दिन सवेरे बहुत ठंड थी। जो परिंदे सुबह-सुबह आकर खिड़की परह दस्तक देते हैं, तरह-तरह की आवाजों में पुकारते हैं, वे क्या कहते हैं! मुझे तो यही लगता है कि वे हमको न केवल नींद से जगाते हैं, बल्कि अपनी संगीत से भरी आवाज में कहते हैं- ‘खाना दो, खाना दो’! सुबह की ठंड में वे भी कहीं छिपे हुए थे।

खैर, आसपास घूमती खोजती नजरों के साथ मैं चाय बनाने के लिए फ्रिज से दूध लेने आई तो पता चला कि दूध खत्म है। इतनी सुबह सामान घर पहुंचाने वाली दुकान भी नहीं खुली होगी। तो क्या किया जाए। साथी की तबियत ठीक नहीं थी, तो उनसे भी नहीं कह सकती थी। ऐसे में टोपी, स्वेटर, शॉल आदि से खुद को पूरी तरह से ढक कर बाहर निकली। ठंडी हवा माथे में टोपी के बावजूद शूल की तरह से चुभ रही थी। चारों ओर कोहरे की हल्की सफेद परतें लहरा रही थीं। सड़क पर इक्का-दुक्का साइकिल सवार को छोड़ दें, कोई दिखाई नहीं दे रहा था। हां, थोड़ी ही दूरी पर धड़धड़ाते हुए गुजरती मेट्रो की आवाज जरूर सुनाई दे रही थी।

प्रकृति के इस जीवंत चित्र के बीच पेड़ हवा से लहरा रहे थे, लेकिन उनके पत्ते कुछ गीले दिखाई दे रहे थे। हम मनुष्य तो ऐसे मौसम में बचने-बचाने के तमाम इंतजाम कर लेते हैं, लेकिन पता नहीं वे पेड़ इतनी सर्दी से कैसे निपट रहे होंगे। फिर लगा कि प्रकृति की गुत्थी समझना इतना आसान नहीं है। उसने जरूर इन्हें भी हर मौसम से लड़ने की ताकत या तरीके मुहैया कराए होंगे। तभी रास्ते में दो गायें खड़ी दिखाई पड़ीं। वे ठंड से बुरी तरह कांप रही थीं। उनसे कुछ दूर चार कुत्ते बार-बार अपने पेट में मुंह छिपाने की कोशिश करते हुए गरमी प्राप्त करने की कोशिश करते थरथरा रहे थे। इन बेचारों का तो कोई घर नहीं।

अब पुराना जमाना भी नहीं रहा कि किसी हलवाई की भट्ठी के आसपास की गरमी से वे कुछ राहत पा सकें। बचपन में जब ऐसी ही सुबहों के बावजूद जब स्कूल के निकलती थी, तो रास्ते में बहुत से कुत्ते हलवाइयों की भट्टियों के इर्द-गिर्द सोते दिख जाते थे। तब भी ध्यान जाता था कि पशु-पक्षी भी ठंड से बचने के लिए कैसे अपने ठौर खोज लेते हैं।

उस ध्यान जाने का ही नतीजा है कि आज भी जब ऐसे दृश्य देखती हूं तो उस समय के दृश्य से इसको जोड़ पाती हूं। लेकिन अब तेज रफ्तार से आसपास बहुत कुछ बदल रहा है, इस पर भी नजर जाती है। अब तो न भट्ठियां हैं, न चूल्हे, ये क्या करें, कैसे बचें। सड़क के ये कुत्ते किसी के पालतू भी नहीं! कौन इनकी चिंता करे। फिर जो गायें सड़क पर खड़ी कांप रही हैं, उन्हें क्यों किसी ने इस तरह से सड़क पर छोड़ दिया।

वे किसी न किसी की तो पालतू होंगी! कोई तो इन्हें पालने वाला होगा! वे जब दूध देती होंगी, तब उस परिवार के बहुत से लोगों ने इनका दूध पिया होगा। दही, छाछ, पनीर, मक्खन- इनसे बनने वाले तमाम व्यंजन खाए होंगे। तो क्या अब वे गायें दूध नहीं देतीं, इसलिए अब घर में इनका कोई स्वागत नहीं? न इनके भोजन की चिंता। बेचारी जैसे-तैसे सड़क का कूड़ा खाकर पेट भरती होंगी।

कई बार ऐसा लगता है कि सारे रिश्ते ही इस जगत में स्वार्थ के हैं। कोई कह सकता है कि इस शहर में तो बहुत से मनुष्यों के पास भी सर्दी में रात बिताने के लिए छत और सर्दी से बचने के लिए कपड़े नहीं… भोजन नहीं… ये गाय और कुत्तों की चिंता कर रही हैं। जब भी इस तर्क को सुनती हूं तो दुनिया भर में फैले मनुष्यतावादी विचार का अहसास होता है। संसार में जो कुछ है, वह मनुष्य के लिए है। खेत, खलिहान, जमीन, नदियां, दवाएं मनोरंजन सब कुछ। मनुष्य के अलावा जो भी जीवन है, वह बस मनुष्य के इस्तेमाल और फायदे के लिए।

इसका कारण अक्सर बताया जाता है कि चूंकि मनुष्य सबसे अधिक ताकतवर है, विकसित है, इसलिए वह धरती पर मिलने वाली हर चीज का ‘स्वामी’ है। कुल मिला कर यह ‘स्वामी’ बनने का भाव ही है, जो हमें दूसरों के जीवन के अधिकार को छीनने के लिए प्रेरित करता है। वैसे बातें हम सब बड़ी भारी मानवीयता, अहिंसा की करते हैं, मगर अपने से इतर हर एक को अपना गुलाम समझते हैं।

मनुष्यवादी इस राजनीति और विचार ने हमें शायद नृशंस भी बनाया है। गाय जब तक दूध दे, तब तक हम उसके स्वामी, वह हमारी संपत्ति। जैसे ही वह दूध देना बंद करे, बूढ़ी हो जाए, तो उसे घर से हांक कर बाहर कर दो। कसाई को बेच दो। मरे-जिए हमसे क्या मतलब! बस हम जिएं, हम बने रहें! शायद यही मनुष्यता की परिभाषा हो गई है! लेकिन इस सबके बीच सोचती हूं कि वे कौन-सी संवेदनाएं रहीं, जिनकी वजह से हम बाकी जीवों से खास यानी मनुष्य के रूप खुद को जान और स्वीकार कर पाए थे!

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