ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः समांतर संघर्ष

दरअसल, परंपरागत तौर पर हमारे यहां लगभग हर स्त्री के लिए किसी न किसी पुरुष को संरक्षक के रूप में देखा जाता है। वह संरक्षक कभी पिता होता है, तो कभी भाई, कभी पति या बेटा।

पिछले दिनों सोशल मीडिया के एक मंच पर ही कुछ उद्धरणों के संदर्भ से स्त्रीवाद पर काफी बहस हुई।

अनीता मिश्रा

इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यधारा के मीडिया के समांतर आज सोशल मीडिया भी कई अहम मुद्दों पर बहस का मंच हो गया है। कई बार बेलगाम और नकारात्मक टकरावों के तमाम आरोपों के बावजूद मेरे जैसे कुछ लोगों की रुचि के मुद्दे भी बातचीत होती है। पिछले दिनों सोशल मीडिया के एक मंच पर ही कुछ उद्धरणों के संदर्भ से स्त्रीवाद पर काफी बहस हुई।

मुझे नहीं पता कि इसमें शामिल महिलाओं के लिए सैद्धांतिक बहसों से इतर जमीन के उद्धरण कितने अहम हैं, लेकिन अपने आसपास नजर दौड़ाती हूं तो कई ऐसे उदाहरण दिख जाते हैं, जिन्हें शायद स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी तो नहीं पता, लेकिन अपने स्तर पर वे जिस तरह का सशक्त जीवन जीती हैं, वह कई बार सोचने पर मजबूर कर देता है। मसलन, मेरी एक मित्र की मां के जीवन से मुझे हमेशा हिम्मत और प्रेरणा मिली है। हम सब उन्हें स्नेह से ‘जिज्जी’ कहते थे। वे बहुत युवा थीं जब एक दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया था। मरने से पहले उनके पति लगभग दो माह कोमा में रहे, जिसकी वजह से घर की सारी जमापूंजी इलाज में खर्च हो गई। एक आम गृहिणी का जीवन बिताने वाली जिज्जी के सामने बड़ा संकट आ गया था। साथ में दो छोटी लड़कियां और कमाई का कोई जरिया नहीं।

इसके बावजूद उन्होंने घोर संकट वाले हालात में बहुत हिम्मत से काम लिया। घर बैठ कर आंसू नहीं बहाए, न मुसीबत में गायब हो जाने वाले रिश्तेदारों से सहायता की गुहार लगाई। उन्होंने खुद को संभाला और अपनी बेटियों की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया था। अभाव और मुश्किल जीवन के बावजूद उन्होंने बेटियों की शादी को प्राथमिक सवाल नहीं बनाया और ठान लिया था कि बेटियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। उनका यही सपना था कि हर लड़की के पास कोई ऐसा घर हो, जिसे वह अपना कह सके। जबकि हम लोग अपने आसपास की उस उम्र की स्त्रियों को सिर्फ शादी-ब्याह की बात करते देखते थे। शायद अपने जीवन से उन्होंने यही सीखा था कि लड़कियों के लिए जीवन में आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता सबसे अहम है। व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम होने पर जीवन में हर तरह के हालात से मोर्चा ले सकता है। उनकी सोच और मेहनत का नतीजा रहा कि दोनों लड़कियां स्नातक करने के कुछ समय बाद ही बैंक में नौकरी करने लगीं।

ऐसी स्थिति में उनकी बातों ने हम पर गहरा असर डाला और हमारे सोचने की दिशा भी बदली। उनसे हम लोग दोस्तों की तरह अपने दिल की बातें कर सकते थे। उन्होंने स्त्रीवाद पर केंद्रित कोई किताब तो नहीं पढ़ी थी, लेकिन हम उनमें उस तरह की आजादखयाली पाते जिसे आजकल लोग स्त्रीवादी चिंतन कहते हैं। उनका चिंतन अपने अनुभवों से आया था, जीवन की अथाह कठिनाइयों की भट्टी की आंच में तप कर उन्होंने यह दृष्टि हासिल की थी। उनके विषम हालात ने उन्हें सिखाया था कि औरत अपने हक की लड़ाई अपने पैसे से ही लड़ सकती है।

कोई इसे किसी एक व्यक्ति का मामला मान सकता है, लेकिन अक्सर अपने आसपास मौजूद सामाजिक ढांचे के बारे में भी सोचती हूं कि एक अकेली स्त्री का अपनी जिंदगी के बारे में निर्णय लेते हुए अपनी शर्तों पर टिके रहना समाज को कितना नागवार गुजरता होगा। किसी विवाहित महिला की युवावस्था में किन्हीं वजहों से मौत हो जाती है, तो आमतौर पर उसके पति रहे पुरुष की दूसरी शादी कर दी जाती है। बच्चों को नए सिरे से तालमेल बिठाना पड़ता है। अकेले पुरुष को अपने आसपास के सभी लोगों से सहानुभूति मिलती है और उसके नए जीवन को लेकर सभी सहमत होते हैं। किसी के प्रति उसकी कोई खास जवाबदेही नहीं होती। लेकिन इसी स्थिति में किसी अकेली रह गई विधवा कही जाने वाली स्त्री के लिए तमाम तरह के निर्देश मिलते हैं। उसके अनचाहे भी आसपास का हर व्यक्ति अपने आपको उसका संरक्षक समझने लगता है। उसे बताया जाता है कि उसे किस तरह का जीवन जीना चाहिए। आर्थिक संकट के साथ तमाम सामाजिक संकट भी उसे घेरे रहते हैं। तमाम रस्मों-रिवाजों में उसे अशुभ मानने से लेकर लोगों के तमाम कदाचार भी कई बार बर्दाश्त करने पड़ जाते हैं।

दरअसल, परंपरागत तौर पर हमारे यहां लगभग हर स्त्री के लिए किसी न किसी पुरुष को संरक्षक के रूप में देखा जाता है। वह संरक्षक कभी पिता होता है, तो कभी भाई, कभी पति या बेटा। ऐसे में एक अकेली स्त्री को संरक्षकविहीन मानकर समाज मनमाना व्यवहार करना अपना हक समझने लगता है। इस तरह के समाज में अगर कोई स्त्री हिम्मत के साथ अपने अकेलेपन को स्वीकार करके अडिग खड़ी रहे तो वह सबको अखरने लगती है। ऐसा नहीं कि सिर्फ पुरुष उसका विरोध करते हैं। तमाम स्त्रियां भी इसे ठीक नहीं मानती हैं। दरअसल, पितृसत्ता एक मानसिकता है। इसका शिकार सदियों के सामाजिक प्रशिक्षण की वजह से स्त्रियां भी हो जाती हैं। लेकिन समाज की इस बुनावट में कई वैसी स्त्रियां हौसला देती हैं, जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बावजूद बिना स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी पढ़े अपनी और अपनी बेटियों की जिंदगी को एक मायने दिया।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगेः भय का समाज
2 दुनिया मेरे आगे: जमीन के तारे
3 दुनिया मेरे आगे: वक्त काटने के बजाय
IPL 2020: LIVE
X