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दुनिया मेरे आगेः बिन पानी सब सून

कई सालों बाद बरसात के मौसम में गांव जाने का मौका मिला। विद्यालयी पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली जाना पड़ा। फिर दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वही नौकरी करने लगा

आज जरूरत है कि अपने परंपरागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि भविष्य में पानी की समस्या से बचा जा सके।

कई सालों बाद बरसात के मौसम में गांव जाने का मौका मिला। विद्यालयी पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली जाना पड़ा। फिर दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वही नौकरी करने लगा। इस तरह धीरे-धीरे गांव जाना कम होता गया। लेकिन अबकी बार गांव पहुंचते ही तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश शुरू होते ही नहाने का मन किया और फिर नहाते-नहाते न जाने कब मैं पास के तालाब की ओर चल पड़ा। दरअसल, बचपन में जब कभी बारिश आती थी तो हम सभी बच्चों की टोली खूब मस्ती करती थी। बारिश के लिए हम सभी बच्चों के पास अलग-अलग तरह के खेल होते थे, जैसे एक-दूसरे को कीचड़ लगाना, पानी में हाथ मार कर छप-छप करना और तालाब में जाकर एक-दूसरे को पकड़ना आदि। जब सभी बच्चे खेल कर थक जाते तो नहाने के लिए पास के तालाब में जाते थे। इस तरह बारिश, खेल और तालाब का एक अटूट रिश्ता था।

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उस समय तालाब और तालाब के किनारे पर बना बड़ा-सा कुआं आसपास के लोगों के लिए पानी का मुख्य स्रोत हुआ करता था। आसपास रहने वाले लोग सुबह-शाम दिन में दो बार पशुओं को पानी पिलाने के लिए तालाब ले जाते थे। महिलाएं दिन भर कुएं पर समूह बना कर कपड़े धोती थीं और घरेलू कार्यों के लिए मटकों में पानी भर कर ले जाती थी। पुरुष सुबह-शाम को कुआं पर नहाने के लिए जाते थे। इस तरह पूरा दिन कुआं और तालाब पर लोगों की आवाजाही रहती थी। बरसात की दिनों में तालाब पूरा भर जाता था, जिसका पानी साल भर के कार्यों के लिए पर्याप्त हो जाता था। तालाब में मछली पालन किया जाता था और साफ-सफाई का विशेष खयाल रखा जाता था। जब कभी गरमी में तालाब का पानी सूख जाता, तब गांव के लोग बरसात आने से पहले मिट्टी निकाल कर तालाब को ओर ज्यादा गहरा करते थे, ताकि बरसात के बाद तालाब में ज्यादा पानी इकट्ठा हो सके। तालाब की मिट्टी का विशेष महत्त्व होता था। उसका उपयोग घरेलू कामों में किया जाता था, जैसे मिट्टी से चूल्हा या अंगीठी बनाना, घर के आंगन और दीवार की सजावट करना आदि।

लेकिन इस बार जब मैं तालाब पर पहुंचा तो देखा कि तालाब के आसपास कोई भी बच्चा नहीं खेल रहा था, बल्कि तालाब गंदगी और गंदे पानी का कुंड बन चुका है। गंदगी के ढेर के कारण कुआं तक पहुंचना मुश्किल था। दरअसल, गांव में समय के साथ विकास के रूप में बदलाव आया। कच्चे मकान धीरे-धीरे पक्के मकानों में बदलने लगे और लोग घरों में पानी का टैंक बनवाने लगे। फिर गांव में बाहर से पानी के टैंकर आने लगे। जिन घरों में टैंक बने, उन्होंने कुआं और तालाब से पानी लाना बंद कर दिया और केवल पशुओं को तालाब पर पानी पिलाने के लिए वे ले जाने लगे। फिर सरकार की तरफ से ‘रेनिवेल परियोजना’ आई, जिसके तहत सरकार ने यमुना नदी से पानी लाकर गांव के सभी घर में पानी के कनेक्शन कर दिए।

इसके रेनिवेल परियोजना के माध्यम से लोगों को घरेलू कार्यों के लिए घर में ही पर्याप्त पानी मिलने लगा और वे वहीं पशुओं को भी पानी पिलाने लगे। इस तरह धीरे-धीरे गांव के लोगों ने तालाब और कुआं पर जाना छोड़ दिया। जो तालाब और कुआं गांव के लिए पानी का मुख्य स्रोत हुआ करता था, अब उसका अधिक महत्त्व नहीं रहा। अब घरों से गंदा पानी नालियों के माध्यम से तालाब में जाने लगा और तालाब गंदे पानी का कुंड बन गया। यों मेरे गांव में छह बड़े तालाब और दस कुएं थे। पूरे गांव की जीविका इन पर ही निर्भर रहती थी। लेकिन समय के साथ आए बदलाव के कारण अधिकतर कुएं मिट चुके हैं और तालाब गंदगी का जमाव बन चुके हैं। कुछ समय पहले तक गांव के लोग कुआं और टैंक का पानी पीते थे। लेकिन अब अधिकतर घरों में पानी के कैंपर आने लगे है। दिन भर गांव में कैंपर की गाड़ियां घूमती रहती हैं। कुछ घरों में खाना भी कैंपर के पानी से बनने लगा है।

लेकिन पिछले कुछ समय से गांव में पानी की किल्लत बढ़ने लगी है, क्योंकि अब रेनिवेल परियोजना के तहत लोगों को सीमित मात्रा में पानी मिलता है। इसलिए लोग घरेलू कार्यों के टैंकरों और पीने के पानी के लिए कैंपर पर आश्रित हो गए। मैंने एक किताब में पढ़ा था कि वर्तमान समय में पानी की किल्लत वही सबसे ज्यादा वहीं पर है, जहां पर पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में धीरे-धीरे वहां परंपरागत संसाधन खत्म होते जा रहे हैं और पानी की किल्लत बढ़ती ही जा रही है। इसलिए आज जरूरत है कि अपने परंपरागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि भविष्य में पानी की समस्या से बचा जा सके।

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